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नरोदा पाटिया मामले में 16 सालों से मंदिर, मस्जिद में फरियाद करता शख़्स

दिन में पांच बार नमाज पढ़ने वाले और पांच बार दिन में मंदिर जाने वाले 56 वर्षीय अब्दुल मजीद शेख ईश्वर अल्लाह के पास एक ही दुआ मांगते हैं कि नरोदा पाटिया कांड के तमाम अभियुक्तों को सज़ा होनी चाहिए.

वो कालिका माता के मंदिर में जाकर भी यही प्रार्थना करते हैं. मस्जिद औऱ मंदिर में प्रार्थना करने के बाद वो बाकी समय वो अपनी किराने की दुकान चलाते हैं.

दुनिया से हार चुके अब्दुल इसलिए हर रोज अल्लाह और ईश्वर से प्रार्थना करने जाते हैं क्योंकि 2002 में अहमदाबाद के नरोदा पाटिया में हुए दंगों में उनकी गर्भवती पत्नी सहित उनके घर के आठ लोग मारे गए थे.

उनके बेटों को जला दिया गया था. हालांकि उनके बेटे की जान बच गई थी. उन दिनों में उन्होंने जो अनुभव किया है उसे वो भूल नहीं सकते.

वो मानते हैं कि ईश्वर और अल्लाह एक हैं और दोनों मिलकर न्याय करेंगे. न्याय यानी अभियुक्तों को सज़ा मिलेगी.

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नरोदा पाटिया दंगा, अब्दुल मजीद शेख
Dilip Thakar/BBC
नरोदा पाटिया दंगा, अब्दुल मजीद शेख

"किसी ने मेरे सिर पर तलवार मारी"

वो 2002 के फरवरी को कयामत मानते हैं. अब्दुल कहते हैं, "उस दिन गुजरात बंद का आह्वान किया गया था और मैं नरोदा पाटिया के पास अपनी किराना की दुकान में था. अपनी छोटी दुकान बंद कर मैं बैठा ही था कि गुस्साई भीड़ मुझे देखने को मिली. तभी पता चला कि मोहम्मद हुसैन की चाल के पास दंगा हुआ है."

एक हिंसक भीड़ आई और मैं कुछ समझ सकूं इससे पहले ही किसी ने मेरे सिर पर तलवार मारी. मेरे सिर से ख़ून निकलने लगा और थोड़ी ही देर में मेरे कपड़े लहूलुहान हो गए.

दुबले पतले अब्दुल मजीद बेहोश होकर ज़मीन पर गिर पड़े. उस समय उनके हाथ में कुरान था. अल्लाह को याद करते करते उन्हें एक बात का संतोष था कि वो अपने परिवार को सुरक्षित स्थान पर भेज कर आए थे.

उनको जब होश आया तो वो एक अस्पताल में थे. उनके पास के बिस्तर पर आधी जली हालत में उनकी बेटी सोफिया थीं. उनका छह साल का बेटा यासिन भी जले हुए हालत में था. सोफिया कुछ बोलने की स्थिति में नहीं थीं. यासिन डरा हुआ था. उसके बदन पर कपड़ा भी नहीं था.

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नरोदा पाटिया दंगा, अब्दुल मजीद शेख
Dilip Thakar/BBC
नरोदा पाटिया दंगा, अब्दुल मजीद शेख

"मेरी बेटी को आंखों के सामने मरते देखा"

अब्दुल कहते हैं, "मैंने मेरी बेटी को मेरी नज़रों के सामने मरते हुए देखा है. परिवार के दूसरे लोगों के बारे में पता चला कि मेरी गर्भवती पत्नी और सात बच्चों को ज़िंदा जला दिया गया है. उसके बाद मैंने यासिन को गले लगाया. मैं पुलिस को बयान देने की हालत में नहीं था. मैं आधा पागल हो गया था. मेरे तीन बेटे, तीन बेटियां, गर्भवती पत्नी और उसकी पेट में पल रहा बच्चा अल्लाह को प्यारे हो गए थे. मैं अपना घर छोड़कर छह महीने रहा."

अब्दुल कहते हैं, "मेरे परिजनों की अंतिम क्रिया मेरे रिश्तेदारों ने की. मैं सरकारी अधिकारियों और अदालत के चक्कर काटता रहा. छोटा यासिन और दूसरी बेटी को अकेला छोड़कर मुझे जाना पड़ता था. सरकारी कार्यालयों के चक्कर काटकर मैंने अपने परिजनों के जो मृत्यु प्रमाणपत्र लिए उसके बाद कभी नरोदा पाटिया नहीं गया."

वो कहते हैं, "एक बार मैं अपने जन्मस्थल कर्नाटक गया तभी मैंने देखा कि वहां एक मस्जिद के बाहर एक भिखारी मेरी फ़ोटो दिखाकर भीख मांग रहा था. वो कहता था कि ये मेरा भाई है. उसके परिवार को आठ लोग मर गए हैं. मस्जिद से निकलते लोग उसको पैसा देते थे. मैंने उस भिखारी को उठाया और कहा कि मैं अभी जिंदा हूं मेरे नाम से पैसे मत मांगो. तब से पैसे से मेरा मन उठ गया है. वैसे भी मैं अपने घर के लोगों को खो चुका हूं. मजहब और मेरी मौत के नाम पर लोग पैसे इक्ट्ठा करते थे."

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नरोदा पाटिया दंगा, अब्दुल मजीद शेख
Dilip Thakar/BBC
नरोदा पाटिया दंगा, अब्दुल मजीद शेख

मजहब को खरोंच आए तो जलजले आ जाते हैं

अब्दुल कहते हैं, "उसके बाद मैं अजमेर शरीफ़ गया. वहां मुस्लिम ही नहीं हिंदू भी दुआएं मांगने आते हैं. उसके बाद मैं उर्स में गया जहां की कव्वाली मैंने सुनी, उसकी दो लाइनें मेरे जेहन में उतर गई हैं."

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कव्वाली की इन पंक्तियों ने मेरा जुनून तोड़ दिया. मजहब के लिए मेरा दृष्टिकोण बदल गया. धर्म के नाम पर निर्दोष लोगों की हत्या करने वालों को सज़ा होनी ही चाहिए. इसलिए पांच बार नमाज पढ़ने के साथ ही मैंने मंदिर जाना भी शुरू कर दिया.

मैं जहां रहता हूं वहां से कुछ दूर कालिका माता का मंदिर है. नमाज पढ़ने के बाद मैं वहां जाता हूं और नरोदा पाटिया के गुनहगारों को सज़ा मिले ऐसी प्रार्थना दोनों जगह करता हूं.

उनको सज़ा मिलनी चाहिए क्योंकि वो धर्म के नहीं इंसानियत के गुनहगार हैं.

थोड़ी देर रुक कर अब्दुल कहते हैं, "मैं अपने बेटे को भी यही सिखाता हूं कि मजहब से ऊपर इंसानियत होती है. तुमने भले ही अपनी मां, भाई, बहनों को मजहब के नाम पर खोया है लेकिन इंसानियत को हमेशा ज़िंदा रखना."

नरोदा पाटिया दंगा, अब्दुल मजीद शेख
Dilip Thakar/BBC
नरोदा पाटिया दंगा, अब्दुल मजीद शेख

अब्दुल जैसा परिवर्तन आएशा बानो में नहीं देखने को मिल रहा है.

नरोदा पाटिया इलाके में रहने वाली आएशा बानो हिंसा की शुरुआत हुई तभी अपने चार बच्चों को लेकर एसआरपी (स्टेट रिजर्व पुलिस) कैंप में भाग कर पहुंची थी. उनके पति आबिद अली पठान रिक्शा चलाते थे. उस समय मोबाइल फ़ोन महंगा था. किसी को फ़ोन नहीं कर सकती थीं इसलिए वो एसआरपी में छुप गई थीं.

आएशा बानो कहती हैं, "मारो काटो की चीखें सुनने की मिलती थीं लेकिन बाहर क्या चल रहा है पता नहीं चलता था. दो दिन एसआरपी कैंप रहने के बाद मैं शाह आलम कैंप में अपने बच्चों के साथ पहुंची थी. "

आएशा बानो के अनुसार शाह आलम कैंप में उनके जैसे कई मुस्लिम परिवार रहते थे. वो उनके पति को ढूंढना चाहती थी लेकिन बच्चों को छोड़कर जा नहीं सकती थीं.

आएसा बानों कहती हैं, "अंत में मुझे पता चला कि मेरे पति की दंगे में मौत हो गई है. यह सुनकर मेरे सिर पर आसमान टूट पड़ा था. मैं कुछ समझ नहीं पा रही थी कि क्या करूंगी. अपने चार बच्चों को बड़ा कैसे करूंगी."

नरोदा पाटिया दंगा, आएशा बानो
Dilip Thakar/BBC
नरोदा पाटिया दंगा, आएशा बानो

वो कहती हैं, "मेरे पति की हत्या कर दी गई थी. उनके रिक्शा को जला दिया गया था. घर चलाना बड़ी समस्या थी. मेरी ज़िंदगी में बहुत बड़ा भूचाल आ गया था. राहत कैंप में दूसरों की पीड़ा देखकर मेरी पीड़ा कुछ कम हुई थी लेकिन शौहर की मौत का गम बहुत बड़ा था."

कुछ समय बाद हमें मकान मिला. छह महीने का राशन और बर्तन मिला. मैं पढ़ी लिखी नहीं हूं. कुछ काम करना नहीं जानती थी. आखिर में मैंने सिलाई का काम सीख लिया. रात दिन सिलाई करती थी. थोड़ा बहुत पैसे कमाती थी और बच्चों को खाना खिलाती थी.

2003 से 2007 तक हमने ईद की खुशियां नहीं मनाई थी. ईद के दिन भी हमलोग खिचड़ी खाकर गुजारा कर लेते थे. आस पड़ोस के घरों में ईद के दिनों में जो सेलिब्रेशन होता था उसे देख कर बच्चे ज़िद करते थे. पर मेरे पास इतना पैसा नहीं था कि उनके लिए नए कपड़े भी ला सकूं.

धीरे धीरे मेरी कमाई बढ़ी. बच्चों को पढ़ाना शुरू किया. फिर सरकार की तरफ से कुछ पैसे मिले. नरोदा पाटिया का घर ठीक करवाया और उसे भाड़े पर दिया. उससे मेरी कमाई शुरू हुई.

आएशा बानो के पति आबिद अली पठान
Dilip Thakar/BBC
आएशा बानो के पति आबिद अली पठान

आएशा कहती हैं, "उस समय मैंने बेटे पर पहली बार हाथ उठाया था. ईद के दिन नज़दीक थे, बेटा साइकिल ख़रीदने की ज़िद कर रहा था. मेरे पास उसके लिए पैसे नहीं थे. मैंने गुस्से में उसपर पहली बार हाथ उठाया था. उस रात मैं बहुत रोई. मेरे प्यारे बच्चे पर हाथ उठाने का मुझे बेहद अफ़सोस था."

वो कहती हैं, "कुछ समय बाद मेरी दोनों बेटियां भी काम करने लगीं. घर कमाई बढ़ी. लड़कियों की शादी हुई, लड़कों को भी पढ़ाया और उनकी शादी की. लेकिन मेरी ज़िंदगी के वो 16 साल नरक के समान थे. मैंने और मेरी बेटियों ने आधी रोटी खाकर गुजारा किया. अल्लाह की मेहरबानी से चारों बच्चों की शादी हो चुकी है. हालांकि आज भी घर चलाने के लिए सिलाई का काम करती हूं. क्योंकि मेरे पास कोई सहारा नहीं है, 2002 की हिंसा में मेरे भाई की मौत हुई थी. एक भाई को गोली लगी थी और वो अपाहिज हो गया है."

नरोदा पाटिया दंगा, आएशा बानो
Dilip Thakar/BBC
नरोदा पाटिया दंगा, आएशा बानो

आएशा बानो हर रोज कुरान पढ़ कर एक ही दुआ मांगती हैं कि नरोदा पाटिया में निर्दोशों की हत्या करने वाले तमाम लोगों को सज़ा होनी चाहिए.

वो कहती हैं, "अल्लाह से मैं हमेशा पूछती हूं कि मेरा क्या कसूर था कि तुमने मेरे पति को अपने पास बुला लिया और मेरे बच्चों को रस्ते पर भटकने के लिए छोड़ दिया."

फ़ैसले का दिन जैसे जैसे नजदीक आ रहा है वैसे वैसे आएशा बानो अल्लाह के सामने दुआ मांगने में बिताती हैं.

नरोदा पाटिया दंगा, आएशा बानो
Dilip Thakar/BBC
नरोदा पाटिया दंगा, आएशा बानो

हर जुम्मे को नमाज के बाद ही खाना खाने वाली आएशा कहती हैं, "हमें न्यायतंत्र पर भरोसा है लेकिन हमें न्याय नहीं मिला तो सुप्रीम कोर्ट में भी जाएंगे. और सुप्रीम कोर्ट में केस लड़ने के लिए चंदा इकट्ठा करेंगे. लेकिन नरोदा पाटिया के अभियुक्त निर्दोष साबित हों यह हमें स्वीकार नहीं है. 16 साल निकाले हैं और जिंदगी के आखिरी दम तक लड़ेंगे. हम ग़रीब 16 साल से चुप बैठे हैं लेकिन वो लोग हमारी खामोशी को हमारी मजबूरी समझते हैं. हमारी पीड़ा कोई नहीं देखता. एक दिन वो अल्लाह देखेगा और हमें न्याय मिलेगा ऐसा हमें भरोसा है."

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