कब तक रूठेगी, चीखेगी, चिल्लाएगी, 7 नवंबर से पहले शिवसेना मान जाएगी!
बेंगलुरू। शिवसेना और बीजेपी की विचारधारा कमोबेश एक है, दोनों को इसलिए स्वाभाविक पार्टनर कहा जाता है। वर्ष 1995 से महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में सत्ता के संघर्ष के लिए साथ-साथ चुनाव मैदान में उतर रही बीजेपी और शिवसेना के बीच चुनाव पूर्व और नतीजों के बाद होने वाली नूराकुश्ती इतनी पुरानी हो गई है कि अब उनके विपक्षी दल भी उनसे परेशान हैं।

महाराष्ट्र के मुख्य विपक्षी दलों में शामिल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस दोनों भली-भांति जानते हैं कि खेल दोनो के बीच खेला जाना है, वो नाहक अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। महाराष्ट्र में दोनों दलों के बीच यह खेल पिछले तीन दशकों से चल रहा है और सत्ता संघर्ष के लिए जब भी ऊंट करवट बैठा बीजेपी और शिवसेना के बीच बड़े और छोटे भाई की जंग शुरू हो जाती है। दिलचस्प बात यह है कि जंग में जीत हर हाल बीजेपी और शिवसेना की होती है और हारता वो है जो दोनों की लड़ाई में मलाई खाने की जुगत में होता है।
इतिहास खंगालेंगे तो बीजेपी-शिवसेना ने पहली बार 1990 के विधानसभा चुनाव में किस्मत आजमाई, उस समय शिवसेना ने 183 सीटों और बीजेपी ने 104 सीटों पर अलग-अलग चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में बीजेपी को 42 और शिवसेना को 52 सीटें मिली थीं। इस विधानसभा चुनाव में बीजपी शिवसेना की तुलना में कम सीटों पर चुनाव लड़ी थी और कमोबेश शिवसेना से कम सीटों पर विजयी रही।

लेकिन शिवसेना ने स्वघोषित रूप से खुद को बीजेपी का बड़ा भाई घोषित कर लिया जबकि सीटों पर जीत का औसत बीजेपी की तुलना में शिवसेना की खराब थी। बीजेपी 104 सीटों पर लड़कर 42 सीटों पर विजयी रही थी। बीजेपी की जीत का औसत करीब 42 फीसदी थी जबकि शिवसेना 183 सीटों पर लड़कर 52 सीटें जीती थी और उसकी जीत का औसत बीजेपी से पूरी 10 फीसदी कम थी यानी कि महज 32 फीसदी थी।
वर्ष 1995 में दोनों दलों ने एक साथ महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव मैदान में उतरे। इस बार शिवसेना ने बीजेपी को एक सीट ज्यादा दी, जिसमें बीजेपी 105 और शिवसेना खुद 183 सीट पर चुनाव लड़ी। चुनाव नतीजे आए तो शिवसेना के होश फाख्ता हो गए। 183 सीटों पर लड़ने वाली शिवसेना 73 सीटों पर विजयी रही, लेकिन एक बार फिर वह बीजेपी से पिछड़ गई थी।

क्योंकि 105 सीटों पर लड़ी बीजेपी को पिछले विधानसभा चुनाव में मिली सीटों से 23 सीटें अधिक जीती थीं। बीजेपी ने वर्ष 1995 विधानसभा चुनाव में 105 सीटों पर लड़कर कुल 65 सीटें जीती थी। बीजेपी और शिवसेना ने वर्ष 1995 विधानसभा चुनाव में मिलकर पहली बार महाराष्ट्र में सरकार जरूर बनाई, लेकिन शिवसेना को उसके बड़े भाई होने का मुगालता दूर नहीं हुआ और शिवसेना का यही मुगालता ही महाराष्ट्र में दोनों दलों के बीच का मुख्य झगड़ा है।
हालांकि वर्ष 1999 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी 117 सीट और शिवसेना 161 सीटों पर चुनावी लड़ी। बीजेपी ने 56 और शिवेसना ने 69 सीटों पर जीत दर्ज की, लेकिन बीजेपी-शिवसेना गठबंधन के हाथों से सत्ता खिसक चुकी थी। एक बात साफ हो गई कि बीजेपी बढ़ रही थी और शिवसेना तेजी से घटती जा रही थी।

वर्ष 2004 के विधानसभा चुनाव में शिवसेना 163 सीटों पर और बीजेपी 111 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया। इस चुनाव में भी शिवसेना को झटका लगा और वह महज 163 सीटों पर लड़कर 62 सीटों पर जीत दर्ज कर सकी और बीजेपी को 54 सीटों पर जीत दर्ज की। महाराष्ट्र में शिवसेना का ग्राफ तेजी से गिर रहा था, लेकिन बीजेपी ने तेजी पकड़ी हुई थी। बीजेपी शिवेसना के साथ लड़कर शिवसेना को महाराष्ट्र में पछाड़ चुकी थी।
शिवसेना बीजेपी को बड़ा भाई दो कारणों से मानने को तैयार नहीं था। पहला कारण था कि शिवसेना महाराष्ट्र में राजनीतिक प्रश्रय दिलाने का श्रेय लेती है, जिसके चलते महाराष्ट्र में बीजेपी का जनाधार लगतार बढ़ता गया। दूसरा, शिवसेना खुद को बीजेपी का बड़ा भाई इसलिए भी मानती है, क्योंकि शिवसेना की स्थापना वर्ष 1966 में हुई थी, जो अब 54 वर्ष पुरानी पार्टी है जबकि बीजेपी उसकी तुलना में नवोदित पार्टी है, जिसकी स्थापना वर्ष 1980 में की गई है।

यह अलग बात है कि बीजेपी वर्ष 1951 में स्थापित जनसंघ का नया वर्जन है। यही कारण था कि बीजेपी ने बड़े भाई और छोटे भाई के टंटे से निकलने के लिए रणनीत बदलते हुए वर्ष 2009 विधानसभा चुनाव में 119 सीटों के साथ चुनाव मैदान में उतरी और शिवसेना को 169 सीटों चुनाव लड़ी।

वर्ष 2009 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में बीजेपी 119 सीटों पर लड़कर 46 सीट जीत सकी, लेकिन 169 सीटों पर लड़ी शिवसेना गिरकर 44 सीटों पर पहुंच गई। बीजेपी इस बार कम सीटों पर लड़कर भी शिवसेना से ज्यादा सीटें जीतने में कामयाब रही, जिससे बीजेपी का आत्मविश्वास सातवें आसमान था। इसी का नतीजा था कि वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने शिवसेना की शर्तों पर समझौता नहीं किया दोनों पार्टियों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा और बीजेपी 260 सीटों पर लड़कर 122 सीटें जीती और शिवसेना 282 सीटों पर लड़कर भी 63 सीटों पर सिमट गई।

बीजेपी इशारों-इशारों में शिवसेना को बता चुकी थी कि बीजेपी ही बड़ा भाई है, लेकिन चुनाव नतीजे के बाद बीजेपी के साथ सरकार में शामिल हुई शिवसेना अब तक इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं हुई। वर्ष 1995 से 2014 के सफर में पहली बार दोनों दलों की साझा सरकार में बीजेपी हावी थी। विधायक दल के नेता चुने गए बीजेपी नेता देवेंद्र फड़णवीस महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना गठबंधन के पहले मुख्यमंत्री थे।
शिवसेना को यह बात कचोट तो रही थी, लेकिन सत्ता में काबिज होने के लिए उसने बीजेपी को बड़ा भाई को ओहदा तो दे दिया, लेकिन बड़ा भाई तब भी नहीं माना। यही कारण था कि वर्ष 2019 विधानसभा चुनाव से पूर्व सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों दलो के बीच में बड़े-छोटे भाई को लेकर खूब रस्साकसी हुई, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर दूसरी प्रचंड जीत से सत्ता में पहुंची बीजेपी के आगे वह नतमस्तक हो चुकी है और 124 सीटों पर लड़ने के तैयार हो गई और बीजेपी ने 162 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे।

वर्ष 2019 का विधानसभा चुनाव के नतीजे इस बार बीजेपी के लिए ज्यादा उत्साहजनक नहीं रहे। बीजेपी, जो 162 सीटो के साथ चुनाव मैदान में उतरी थी, उसे महज 105 सीटों पर जीत मिली जबकि 124 सीटों पर मैदान में उतरी शिवसेना को 56 सीटों पर विजयश्री मिली। बीजेपी का ग्राफ गिरा तो शिवसेना को जैसे मन मांगी मुराद मिल गई है, क्योंकि बीजेपी का ग्राफ नीचे गिरने के बाद ही शिवसेना बड़े भाई के ओहदे पर अपना दावा कर सकती थी। हालांकि सीटों पर जीत का औसत अभी बीजेपी की शिवसेना से बेहतर है, लेकिन शिवसेना के लिए इतना ही काफी है कि बीजेपी 122 से 105 पर आ गई थी। शायद यही कारण है कि बहुमत के बाद भी शिवसेना अड़ी हुई है।

ऐसा कहा जा सकता है कि शिवसेना शायह ही 50-50 फार्मूले से इतर बीजेपी के साथ किसी समझौते वाली सरकार में शामिल होगी, क्योंकि शिवसेना ने बड़े भाई के ओहदे को अह्म और आत्म सम्मान का मुद्दा बना लिया है। अगर बीजेपी 50-50 फार्मूले पर तैयार नहीं हुई तो शिवसेना अपनी अह्म की संतुष्टि के लिए सत्ता से बाहर बैठना भी स्वीकार सकती है अथवा बीजेपी का साथ छोड़कर एनसीपी और कांग्रेस के साथ वाली सरकार में भी शामिल हो सकती है।

क्योंकि ऐसा लगता नहीं है कि बीजेपी 50-50 फार्मूले पर बीजेपी तैयार होती दिख रही है, लेकिन यह भी कटु सत्य है कि अगर शिवसेना कांग्रेस और एनसीपी के साथ वाली सरकार में शामिल होती है, तो महाराष्ट्र ही नहीं, पूरे देश में शिवसेना का राजनीतिक अस्तित्व खतरे में आ जाएगा, जो शिवसेना की नई पीढ़ी के नेता आदित्य ठाकरे के लिए बिल्कुल आत्मघाती कदम होगा।
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