लालू जी के नाम पर कब तक कुर्बानी दें ? राजद के सीनियर लीडर पूछ रहे सवाल

लालू जी के नाम पर कब तक कुर्बानी दें ? राजद के सीनियर लीडर पूछ रहे सवाल

शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है....। लालू यादव के साथ भी ऐसा ही हो रहा है। एक सामान्य नेता से लालू अगर करिश्माई नेता बने तो यह कई लोगों की कुर्बानियों से मुमकिन हुआ। लेकिन अब राजनीतिक बलिदान देने वाले नेता खुद को राजद में ठगा हुआ महसूस करने लगे हैं। लालू अब पहले वाले नेता नहीं रहे। राजद में कोई लालू की जगह ले नहीं सकता। तेजस्वी भी नहीं। पार्टी में नये और पुराने का जबर्दस्त अंतर्विरोध है। लालू के करीबी नेता अब अपनी तौहीन से इस कदर खफा हैं कि उन्होंने बगावत का झंडा उठा लिया है। उनके समर्थक लालू- तेजस्वी से पूछ रहे हैं, क्या पार्टी में उनकी कोई अहमियत है ? या सिर्फ झोला ढोना ही नियति है ? लालू यादव की राजनीतिक कामयाबी में उदय नारायण राय और डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह की अहम भूमिका है। दोनों बुजुर्ग नेता हैं। सम्मान नहीं मिलने से दोनों नाराज हैं। उदय नारायण राय का आरोप है कि लालू यादव ने एमएलसी बनाने का वादा किया था, लेकिन अब आनाकानी कर रहे हैं। दूसरी तरफ रघुवंश प्रसाद सिंह के विरोध के बाद भी दबंग नेता रामा सिंह को राजद में लाने की तैयारी चल रही है।

उदय नारायण राय ने लालू के लिए क्या किया ?

उदय नारायण राय ने लालू के लिए क्या किया ?

1990 में जब लालू बिहार के मुख्यमंत्री बने तो उस समय वे सांसद थे। सीएम बने रहने के लिए उनका बिहार विधानमंडल का सदस्य बनना आवश्यक था। लालू अल्पमत की सरकार चला रहे थे। उन्होंने सुरक्षित रास्ता अपनाया और एमएलसी बन गये। 1995 का विधानसभा चुनाव आया तो लालू अपने लिए एक जीताऊ सीट की खोज करने लगे। वे 1980 और 1985 में सोनपुर से विधायक बने थे लेकिन उनको ये सीट जम नहीं रही थी। लालू यादवलैंड में कोई शर्तिया जीत वाली सीट चाहते थे। वैशाली जिले का राघोपुर विधानसभा क्षेत्र यादवों का गढ़ है। इस सीट पर पुराने समाजवादी नेता उदय नारायण राय उर्फ भोला राय का कब्जा था। वे इस सीट पर 1980, 1985 और 1990 में जीत चुके थे। राघोपुर में उनका मजबूत जनाधार था। 1990 में सीएम बनने के बाद लालू पिछड़ों के बड़े नेता बन चुके थे। लालू यादव को इज्जत देने के लिए उदय राय ने अपनी तीन बार की जीती हुई सीट छोड़ दी। उन्होंने लालू को राघोपुर से चुनाव लड़ने का ऑफर दिया ताकि उन्हें सुरक्षित ठिकाना मिल जाए। लालू के नाम और उदय राय के काम से कमाल कर दिया। लालू इस सीट पर करीब 54 हजार वोटों से जीते। लालू को 74 हजार से अधिक वोट मिले थे।

राघोपुर कैसे बना लालू का गढ़ ?

राघोपुर कैसे बना लालू का गढ़ ?

1995 में लालू यादव राघोपुर से चुनाव लड़ने तो आ गये लेकिन उनको अपनी जीत को लेकर आशंका बनी हुई थी। लालू हार हाल में जीत चाहते थे। इसलिए उन्होंने दो सीटों से चुनाव लड़ा। राघोपुर से अलावा लालू ने दानापुर से भी खड़े हुए। इस सीट पर लालू का मुकाबला भाजपा के विजय सिंह यादव से थी। दानापुर में स्थानीय यादव और बाहरी यादव के नारे ने लड़ाई कठिन बना दी थी। लालू को 49 हजार 840 वोट मिले तो विजय सिंह यादव को 25 हजार 980 मत। लालू करीब 23 हजार वोटों से जीते। इस जीत से लालू खुश नहीं थे। पिछड़ों के सबसे बड़े नेता को ये वोट कम लगे। लालू यादव को राघोपुर ही सुरक्षित ठिकाना लगा। उन्होंने दानापुर सीट से इस्तीफा दे दिया। दानापुर की सीट सच में राजद के मुफीद न थी। जब 1996 में यहां उपचुनाव हुआ तो भाजपा के विजय सिंह यादव ने राजद के रामानंद यादव को हरा कर जीत हासिल कर ली। तब से राघोपुर लालू के लिए घर बन गया। यहां से लालू जीते, राबड़ी देवी जीतीं। 2010 में राबड़ी इस सीट पर हार गयीं। लेकिन 2015 में तेजस्वी को जीत से ये साफ हो गया कि राघोपुर लालू का किला है। लालू परिवार की इस जीत के सूत्रधार रहे हैं उदय नारायण राय़

क्यों नाराज हैं उदय नारायण राय ?

क्यों नाराज हैं उदय नारायण राय ?

उदय नारायण राय को लालू ने एमएसली बनाया। मंत्री भी बनाया। अब उनकी उम्र 80 पार है और पिछले कुछ समय से वे हाशिये पर हैं। इस साल फरवरी में उदय नाराय राय लालू यादव से मिलने रांची गये थे। उस समय उन्होंने रांची में कहा था, राघोपुर लालू के लिए छोड़ा तो वे मुख्यमंत्री बने। पिछली बार तेजस्वी के लिए छोड़ा तो वे डिप्टी सीएम बन गये। अब (2020) छोड़ेंगे तो तेजस्वी भी मुख्यमंत्री बन जाएंगे। कहा जाता है इस मुलाकात में ही लालू ने उदय राय को विधान परिषद में भेजने का वायदा किया था। लेकिन अब जब टिकट देने का मौका आया तो उनकी अनदेखी किये जाने का आरोप लग रहा है। इस बात से उदय राय के समर्थक बेहद उग्र हैं। उन्होंने धमकी दी है कि अगर उनके नेता को टिकट नहीं मिला तो तेजस्वी यादव के लिए राघोपुर में चुनाव लड़ना मुश्किल हो जाएगा। क्या लालू परिवार के लिए किये गये त्याग का यही इनाम है ?

लालू के लिए संबल रहे डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह

लालू के लिए संबल रहे डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह

राजद के उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद सिंह पार्टी में सवर्ण और बौद्धिक चहेरा थे। वे गणित में डॉक्टरेट हैं। राजपूत जाति से आने वाले रघुवंश प्रसाद सिंह समाजवादी धारा के नेता हैं। वे जेपी आंदोलन की आग में तप कर निखरे हैं। 1977 में पहली बार विधायक बने थे और उन्हें कर्पूरी ठाकुर सरकार में ऊर्जा मंत्री बनाया गया था। इस हिसाब से वे राजद के सबसे वरिष्ठ नेता थे। वे बेलसंड विधानसभा क्षेत्र से लगातार पांच विधायक चुने गये। जेपी आंदोलन से समय से ही उनकी लालू यादव से निकटता रही। वे बिहार और केन्द्र में मंत्री रहे। लालू यादव के सबसे निकट सहयोगियों में उनकी गिनती होती रही। वे बिना लाग लपेट के बोलने वाले नेता हैं। जो महसूस किया वो बोल दिया। 2019 के लोकसभा चुनाव में जब राजद को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा तो उन्होंने लालू यादव से बेहिचक कह दिया कि पार्टी को सवर्ण आरक्षण के विरोध की कीमत चुकानी पड़ी। रघुवंश प्रसाद सिंह, दबंग नेता रामा सिंह को राजद में लाये जाने का विरोध कर रहे थे। बाहुबली रामा सिंह पहले लोजपा में थे। 2014 के लोकसभा चुनाव में रामा सिंह ने रघुवंश प्रसाद सिंह को हरा दिया था। बाद में रामा सिंह की रामविलास पासवान से खटपट हो गयी। पिछले चुनाव में लोजपा ने रामा सिंह को टिकट नहीं दिया था। तब से रामा सिंह राजद में आने की कोशिश कर रहे थे। रामा सिंह ने लालू का भी खूब विरोध किया था। लेकिन जब तेजस्वी ने रघुवंश प्रसाद सिंह की अनदेखी कर रामा सिंह को राजद में लाने का मन बना लिया तो इस वरिष्ठ नेता ने पार्टी से इस्तीफा कर दिया। वे कोरोना से पीड़ित हैं फिर भी अपने गुस्से को जताने से नहीं चूके।

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