वायनाड में दिखी सेना की जांबाजी, उफनती नदी पर 16 घंटे में बना डाला 190 फीट लंबा बेली ब्रिज, जानें इसकी खासियत
Wayanad Landslide (Bailey bridge): केरल के वायनाड में आई भीषण आपदा के बाद भारतीय सेना के जवान वहां दिन-रात राहत और बचाव कार्यों में लगे हुए हैं। सेना ने रेस्क्यू ऑपरेशन की कमान अपने हाथों में ले ली है। सोशल मीडिया पर भी सेना के जांबाजी और राहत कार्य करने के उनके तरीकों की वाहवाही हो रही है।
अब भारतीय सेना के जवानों ने वायनाड लैंडस्लाइड इलाकों महज 16 घंटे में उफनती नदी पर 190 फीट लंबा बेली ब्रिज दिया है। जिसको देखकर हर कोई हैरान है। सेना ने रिकॉर्ड समय में इस पुल का बनाकर तैयार किया है। वायनाड से सामने आए वीडियो में सेना के जवान 'भारत माता की जय' के नारे लगाते हुए इस बेली ब्रिज पर नजर आ रहे हैं।

जानिए इस बेली ब्रिज की क्या है खासियत?
🔴भारतीय सेना के मद्रास इंजीनियरिंग ग्रुप ने 1 अगस्त को 190 फुट लंबे बेली पुल का निर्माण काम पूरा किया है। ये बेली ब्रिज वायनाड जिले के मुंडक्कई और चूरलमाला के सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों को जोड़ने में मदद करेगा। ये 24 बेली ब्रिज इरुवाझिंजिपुझा नदी पर बनाई गई है। 30 जुलाई को विनाशकारी भूस्खलन से प्रभावित हुए थे। इस आपदा में अब तक 200 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं 200 से ज्यादा लोग लापता हैं।
🔴पुल का निर्माण 31 जुलाई को रात 9:30 बजे शुरू हुआ और 1 अगस्त को शाम 5:30 बजे तक पूरा हो गया। पुल की मजबूती का परीक्षण करने के लिए सेना पहले अपने वाहनों को नदी के दूसरी ओर ले गई थी।
🔴केरल और कर्नाटक उप-क्षेत्र के जनरल ऑफिसर कमांडिंग मेजर जनरल वीटी मैथ्यू ने 24 टन भार वहन करने की क्षमता वाले वाहन को इस पुल से पार कराया था। पुल के बन जाने से अब भारी वाहनों को भूस्खलन स्थल तक ले जाया जाना संभव है।

🔴सेना के बचाव अभियान का समन्वय मेजर जनरल मैथ्यू के नेतृत्व में किया जा रहा है। पुल निर्माण के लिए सामग्री दिल्ली और बेंगलुरु से कन्नूर हवाई अड्डे पर पहुंचाई गई और 17 ट्रकों में भरकर वायनाड लाई गई।
🔴अब यह पुल यातायात के लिए खुल गया है और इसे सिविक एडमिनिस्ट्रेशन को सौंप दिया गया है। इस ब्रिज से 24 टन वजन के वाहन को ले जाया जा सकता है। भारतीय सेना ने ये जानकारी दी है कि यह पुल 190 फीट लंबा है और परंपरा के अनुसार कमांडर सबसे पहले पुल पर गए थे।

जानिए कैसे बनाया गया ये बेली ब्रिज?
ऑपरेशन का नेतृत्व कर रहे मेजर जनरल मैथ्यू ने बताया कि बेली ब्रिज के लिए 10-10 फीट लंबे पैनल मंगलवार 30 जुलाई को 20 ट्रकों में बेंगलुरु से चूरलमाला भेजे गए थे। उसी दिन वायनाड में भूस्खलन हुआ था। 190 फीट ऊंचे इस पुल को बनाने में कुल 19 स्टील पैनल का इस्तेमाल किया गया, जिसे एक ही खंभे से सहारा दिया गया है।
सेना के इंजीनियरिंग टास्क फोर्स मद्रास इंजीनियर ग्रुप के अधिकारियों ने पुल को बनाने से पहले इस जगह का मुआयना किया था। 31 जुलाई को सुबह 9 बजे मद्रास इंजीनियर ग्रुप के 140 जवानों ने पुल पर काम शुरू कर दिया था। पुल के मुहाने पर सीमित जगह की वजह से काम की गति में बाधा आ रही थी।

एक अधिकारी ने कहा, "वहां केवल एक ट्रक के लिए जगह थी, लेकिन हमें 10-फीट के पैनल के साथ काम करने के लिए कम से कम 50 फीट की कोहनी की जरूरत थी। लगातार वीआईपी दौरे और प्रतिकूल मौसम की वजह से भी काम में देरी हुई थी।''
सेना के एक मेजर ने बताया कि मुंडक्कई तक मिट्टी हटाने वाली मशीनें, खुदाई करने वाली मशीनें, ट्रक, एंबुलेंस और जीपें ले जाने के लिए यह चौड़ाई काफी है। अब तक, केवल ऑफ-रोड जीपें ही जो चाय बागान में पहले से मौजूद थीं, वे ही प्रभावित इलाकों तक खाद्य सामग्री ले जा रही थीं। मुंडक्कई के ऊपर 400 घरों में से केवल 30 ही भूस्खलन से बच पाए हैं। कई लोग अभी भी लापता हैं।

असल में 30 जुलाई को हुए विनाशकारी भूस्खलन में दोनों जगहों को जोड़ने वाला पुल बह गया था। बचावकर्मियों ने जमीन पार करने और वहां फंसे लोगों की मदद करने के लिए जमीन के बीच लकड़ी के अस्थायी पुल बनाए थे। लेकिन 31 जुलाई को हुई भारी बारिश में वे अस्थायी पुल भी टूट गए थे। ये प्रीफैब्रिकेटेड ट्रस ब्रिज उसी जगह बनाया गया है, जहां पहाड़ियों से आए बड़े-बड़े पत्थरों ने 100 फीट लंबे कंक्रीट के पुल को तोड़ दिया था।












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