लाला लाजपत राय पर पड़ी लाठियों का बदला भगत सिंह ने कैसे लिया?- विवेचना
ब्रितानी शासन के दौर में भारत के वाइसरॉय रहे लॉर्ड कर्ज़न के जाने के बाद, 1925 के आसपास पूरे भारत में स्वतंत्रता की मांग को ज़ोर-शोर से उठाने वालों का एक बड़ा तबक़ा उभर कर सामने आया था. बंगाल में बिपिन चंद्र पाल, महाराष्ट्र में बाल गंगाधर तिलक और पंजाब में लाला लाजपत राय इसका नेतृत्व कर रहे थे. इन्हें आगे चलकर 'गरम दल' के रूप में जाना गया.
इन्होंने मिलकर स्वदेशी सामान का इस्तेमाल बढ़ाने और भारत में विदेशी सामान, ख़ास तौर पर विदेशी कपड़ों के बहिष्कार की मुहिम चलाई थी. मुहिम की सफलता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब ईस्ट बंगाल के लेफ़्टिनेंट गवर्नर लैंसलेट हेयर ने बारिसाल में मैनचेस्टर में बना कपड़ा ख़रीदने का इच्छा प्रकट की तो उनसे कहा गया कि इसके लिए उन्हें पूर्वी बंगाल में राष्ट्रवादी नेता अश्वनी कुमार दत्ता से अनुमति लेनी होगी.
जब बंगाल में सार्वजनिक रूप से 'बंदे मातरम' का नारा लगाना प्रतिबंधित हो गया तो पंजाब में इसका ज़बरदस्त विरोध किया गया. इसका नेतृत्व कर रहे रहे थे लाला लाजपत राय.
आने वाले दिनों में बंगाल, महाराष्ट्र और पंजाब अंग्रेज़ों के विरोध के गढ़ बन गए और वहां के नेताओं बिपिन चंद्र पाल, बाल गंगाधर तिलक और लाला लाजपत राय को 'लाल-बाल-पाल' की उपाधि दी गई.
अकाल के राहत कार्य में बड़ी भूमिका
1882 में 17 वर्ष की आयु में लाला लाजपत राय के आर्य समाज के सदस्य बनने के साथ ही समाज सेवा करनी शुरू कर दी थी. उन्होंने स्वामी दयानंद सरस्वती के साथ मिल कर आर्य समाज को पंजाब में लोकप्रिय बनाया. उन्होंने दयानंद एंग्लोवैदिक (डीएवी) विद्यालयों का भी प्रसार किया.
1896 में जब मध्य भारत में ज़बरदस्त अकाल पड़ा, ईसाई मिशनरियों के उस इलाक़े के बड़ी संख्या में लोगों को ईसाई बनाने की कोशिशों की ख़बरें सामने आईं. लाला लाजपत राय ने अकाल में अनाथ हो गए बच्चों के लिए एक अभियान चलाया. उन्होंने जबलपुर और बिलासपुर क्षेत्र के क़रीब 250 अनाथ बच्चों को वहां से पंजाब लाकर अनाथालयों में शरण दी.
लालाजी समाज सुधारक होने के अलावा एक अच्छे लेखक भी थे. उन्होंने इतालवी राजनेता मैज़िनी और गैरिबाल्डी की जीवनी उर्दू में लिखी. लाला लाजपत राय ने ही एक उर्दू साप्ताहिक 'वंदे मातरम' और अंग्रेज़ी साप्ताहिक 'द पीपुल' छापना शुरू किया.
देश से निष्कासित कर बर्मा भेजा गया
कांग्रेस के सदस्य बनने और पंजाब में राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने के बाद लाला लाजपत राय को देश से निष्कासित कर बर्मा (अभी के दौर का म्यांमार) भेज दिया गया. लालाजी को एक विशेष ट्रेन से वहां भेजा गया जिसकी सभी खिड़कियां बंद कर दी गई थीं. जेल में उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं हुआ.
लाला लाजपत राय के जीवनीकार डाक्टर लाल बहादुर सिंह चौहान लिखते हैं, "लाला लाजपत राय को छोटी-सी कोठरी में रखा गया. उन्हें सोने के लिए एक चारपाई, एक कुर्सी और मेज़ दी गई थी लेकिन उन्हें पढ़ने के लिए न तो कोई समाचार पत्र उपलब्ध कराया गया और न ही उन्हें किसी से मिलने की इजाज़त दी गई. उन्हें हजामत के वास्ते नाई बुलाने के लिए हुज्जत करनी पड़ती थी. उनकी कोठरी में अंधेरा रहता था. कई बार कहने के बाद ही उन्हें कमरे में रोशनी के लिए दो मोमबत्तियां दी गई थीं. कपड़ों और दवाओं के लिए भी लालाजी को बार-बार अंग्रेज़ अफ़सरों से कहना पड़ता था."
1914 में भारत की आज़ादी के लिए दुनियाभर में सहानुभूति जगाने के उद्देश्य से लाला लाजपत राय पहले ब्रिटेन गए और फिर वहां से उन्होंने अमेरिका का रुख़ किया.
पहला विश्व युद्ध शुरू हो जाने के कारण उन्हें 1920 तक अमेरिका में ही रहना पड़ा. जब वो भारत लौटे तो उन्हें कांग्रेस के कलकत्ता सत्र में पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया. उन्होंने ही पंजाब नेशनल बैंक और लक्ष्मी इंश्योरेंस कंपनी की स्थापना की.
इसके साथ ही उन्होंने ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस की स्थापना भी की और उसके पहले अध्यक्ष भी बने. सन 1921 में उन्होंने सर्वेंट्स ऑफ़ द पीपुल सोसाइटी की स्थापना की.
1922 में जब महात्मा गांधी ने चौरी चौरा कांड के बाद असहयोग आंदोलन वापस लिया तो लाजपत राय ने इसे पसंद नहीं किया. इस मतभेद के कारण उन्हें कुछ समय के लिए कांग्रेस छोड़नी भी पड़ी.
जिन्ना के साथ काम करने में नहीं था ऐतराज़
हालांकि लाला लाजपत राय की छवि एक हिंदू नेता की थी लेकिन मोहम्मद अली जिन्ना के साथ काम करने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं आई.
असहयोग आंदोलन से पहले के दिनों में दोनों ने कई मौक़ों पर साथ-साथ काम किया था लेकिन जब कांग्रेस में गांधी का महत्व बढ़ा तो जिना ने कांग्रेस पार्टी छोड़ दी लेकिन जब लाजपत राय असेंबली के सदस्य बने तो उन्हें हिंदू-मस्लिम मुद्दों पर कई बार जिन्ना से बात करने का मौक़ा मिला.
फ़िरोज़ चंद लालाजी की जीवनी 'लाजपत राय लाइफ़ एंड वर्क' में लिखते हैं, "कई मुद्दों पर लाला लाजपत राय और जिन्ना के मतभेद हुआ करते थे और वो सार्वजनिक रूप से एकदूसरे की आलोचना भी किया करते थे, लेकिन उन दोनों को पता होता था कि किन मुद्दों पर उनके विचार नहीं मिलते और किस हद तक वो एकदूसरे के साथ काम कर सकते थे."
"साइमन कमीशन का मुद्दा उनमें से एक था. असेंबली सत्र के दौरान जिन्ना अक्सर बिना बताए लाला लाजपत राय के कक्ष में चले जाते थे. कई बार दोनों साथ-साथ मदन मोहन मालवीय से बात करने उनके कक्ष में भी जाते थे. हिंदु-मुस्लिम मुद्दों पर लालाजी और जिन्ना के बीच भले ही सहमति न बन पाई हो लेकिन अन्य मुद्दों पर अक्सर दोनों को साथ-साथ देखा जाता था".
लाहौर की सड़कों पर उतरे
जब 1927 में साइमन कमीशन भारत आया तो कांग्रेस ने उसका यह कहकर विरोध किया कि उसका एक भी सदस्य भारतीय नहीं था. 27 और 28 अक्तूबर को लाजपत राय इटावा में थे. जैसे ही उनको सूचना मिली कि साइमन कमीशन उनके गृह नगर लाहौर पहुंच रहा है, वो उसका विरोध करने के लिए तुरंत लाहौर रवाना हो गए.
जैसे ही साइमन लाहौर के रेलवे स्टेशन पर उतरे लोगों ने काले झंडे दिखा कर और 'साइमन गो बैक' के नारे लगाकर उनका स्वागत किया. लाला लाजपत राय विरोध जुलूस का नेतृत्व कर रहे थे. वहां पर धारा 144 लगी हुई थी और पुलिस अधिकारियों ने जुलूस चेतावनी दी थी.
लालाजी ने जवाब दिया, "जनता तो प्राणों का मोह छोड़कर यहां आई है. तुम्हें जो अच्छा लगता हो करो, मैं अपना काम कर रहा हूं."
लेकिन पुलिस ने पहले से ही प्रदर्शनकारियों पर हमला करने का मन बना लिया था.
पुलिस अधीक्षक स्कॉट ने लाठी से लालाजी पर प्रहार किया
पुलिस को आदेश मिला कि आँखें मूंद कर भीड़ पर लाठीचार्ज करो. फ़िरोज चंद अपनी किताब में लिखते हैं, "भीड़ पर लाठी चलाने वालों में खुद सबसे आगे था वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक जेम्स स्कॉट. उनका साथ दे रहा था उनका असिस्टेंट जॉन साउंडर्स. उनका निशाना थे छाते के नीचे खड़े और हाथ में वॉकिंग स्टिंक लिए लाला लाजपत राय. उन्होंने बहादुरों की तरह अंग्रेज़ पुलिस की लाठियों को झेला."
वो वहां से भागे नहीं और न ही उन्होंने भीड़ को उकसाया कि वो पुलिस पर जवाबी हमला करें. उनके समर्थकों ने उन्हें घेर लिया लेकिन अंग्रेज़ पुलिस ने लालाजी को ही निशाना बनाकर लाठियां बरसाईं. इस बीच लालाजी ने चिल्ला कर लाठियां मारने वाले अंग्रेज़ अफ़सर का नाम पूछा. उसने उसका जवाब और लाठी चला कर दिया."
जब लाठीचार्ज थमा तो बुरी तरह से घायल होते हुए भी लाला लाजपत राय ने सबसे आगे चलते हुए वापस जाते जुलूस का नेतृत्व किया.
शाम को भाटी गेट के बाहर पुलिस की इस कार्रवाई के विरोध में लाहौर वासियों ने एक विरोध सभा बुलाई. इस सभा में भी लाला लाजपत राय शामिल हुए और उन्होंने वहां उपस्थित लोगों को बताया कि उनके साथ क्या हुआ था.
लाला लाजपत राय ने लोगों को उनके धैर्य के लिए धन्यवाद दिया और एक ऐसा वाक्य बोला जो हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया.
उन्होंने कहा, "हमारे ऊपर किया गया हर वार ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत में ठोकी गई एक कील साबित होगा."
उन्होंने ये भी कहा कि"अगर वो मर जाते हैं और वो युवा जिन्हें उन्होंने कुछ करने से रोक दिया था, अगर कुछ कर गुज़रने के बारे में सोचते हैं तो उनकी आत्मा जहां भी हो उन्हें आशीर्वाद देती रहेगी.
पुलिस को झूठा साबित किया
अगले दिन इस घटना की जांच के आदेश दिए गए. जांच में पुलिस को बेकसूर माना गया. दो सप्ताह बाद रावलपिंडी के आयुक्त डीजे बॉयड के नेतृत्व में एक और जांच समिति का गठन किया गया.
लाला लाजपत राय और उनके साथियों ने इस जांच समिति के सामने उपस्थित होने से इनकार कर दिया. हमले के बाद जब डाक्टरों ने लाला लाजपत राय की जांच की तो उन्हें उनके सीने के बाएं हिस्से में दो जगहों पर चोट के गहरे निशान मिले.
घटना के 29 घंटे बाद उनकी तस्वीर ली गई और वो अगले दिन अख़बारों में छपी. अपने अख़बार में उन्होंने घटना का पूरा ब्योरा दिया. उस दिन उनके अख़बार की हेडलाइन थी, 'हाऊ द गार्डियंस ऑफ़ लॉ बिहेव.'
उन्होंने इस रिपोर्ट में लिखा कि "रेलवे इंडस्ट्रियल स्कूल को अहाते के पांच फ़ीट बाहर लोहे के तारों की एक बाड़ खींच दी गई थी. मेरा या मेरे साथियों का उस बाड़ को तोड़ने का कोई इरादा नहीं था. जांच समिति का ये कहना कि मैंने और मेरे साथियों ने उस बाड़ को तोड़ने की कोशिश की, एक सफ़ेद झूठ है ताकि वो भीड़ पर किए गए अपने बुज़दिल हमले को सही ठहरा सकें."
इसी रिपोर्ट में लालाजी ने लिखा, "जिस किसी ने भी ये रिपोर्ट बनाई है उसके बारे में मैं सिर्फ़ ये कह सकता हूँ कि वो बहुत बड़ा झूठा है. अगर मेरी ये बात ग़लत है तो वो मुझ पर केस कर सकता है. मैं गवर्नर महोदय से पूछना चाहता हूं कि क्या वो इन लोगों के सहारे राज्य पर राज करेंगे."
घायल लालाजी सम्मेलन में
बुरी तरह से घायल हो जाने के बावजूद लाला लाजपत राय ने काम करना नहीं छोड़ा. यहां तक कि वो तीन और चार नवंबर को दिल्ली में होने वाले कांग्रेस सम्मेलन में भाग लेने वहां गए. उन्होंने सम्मेलन में न सिर्फ़ भाग लिया बल्कि वहां भाषण भी दिया, लेकिन उस दौरान उनकी तकलीफ़ बढ़ गई और उन्हें दिल्ली छोड़ कर वापस लाहौर आना पड़ा.
उन्होंने अपने अख़बार में लिखा, "शुरू में लगा कि लाहौर में मुझे लाठियों से मिली चोट इतनी गंभीर नहीं थी लेकिन इसने मेरे पूरे शरीर को गहरा सदमा पहुंचाया था. सोमवार को मैं एक सार्वजनिक सभा संबोधित नहीं कर पाया था क्योंकि मुझे बुख़ार चढ़ गया था."
इसका ज़िक्र करते हुए जवाहरलाल नेहरू भी अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, "साइमन कमीशन का विरोध करने के दौरान पिटने के बाद भी लाला लाजपत राय दिल्ली में कांग्रेस की बैठक में आए थे. उनके शरीर पर अब भी चोटों के निशान थे और वो उसके असर से जूझ रहे थे. दिल्ली से वापस आने के बाद भी उन्होंने काम करना नहीं छोड़ा था."
उन्होंने डाक्टरों की उस सलाह को ताक पर रख दिया था जिसमें कहा गया था कि उन्हें आराम की सख़्त ज़रूरत है.
सीने में दर्द बढ़ा
लाला लाजपत राय के जीवनीकार फ़िरोज़ चंद लिखते हैं, "लाला जी को दीवाली मनाने का बहुत शौक था इसलिए 12 नवंबर को दीवाली के दिन उन्होंने अपने कुछ दोस्तों को खाने पर बुलाया था. उन्होंने अच्छा भोजन बनवाया था लेकिन हमेशा की तरह उस दिन उनकी आवाज़ बुलंद नहीं थी और कुछ दबी-दबी सी थी. उनके दोस्त उनके बेडरूम में ही बैठे हुए थे और वो उनसे पलंग पर लेटे-लेटे ही उनसे बातें कर रहे थे."
फ़िरोज़ चंद लिखते हैं, "16 नवंबर की सुबह उनके डाक्टर एनआर धर्मवीर उनको देखने आए थे. उन्होंने डॉक्टर से कहा था कि वो उन्हें शाम को कार ड्राइव पर ले चलें. लेकिन डाक्टर के पहुंचने से पहले ही वो वॉक के लिए निकल गए थे. वॉक से लौटने के बाद जब डाक्टर ने उनकी जांच की तो पाया कि थकान या चोटों के कारण उनके पूरे शरीर मे दर्द हो रहा था. सीने के दाहिनी तरफ़ रीढ़ की हड्डी के पास दर्द कुछ ज़्यादा था. डाक्टर ने उन्हें एस्पिरिन दी और रात 11 बजे उनसे विदा ली."
लाला जी का निधन
17 नवंबर की सुबह कुछ लोग उस पुराने घर में दौड़ते हुए आए जहां उनके नौकर रहा करते थे. वो लोग अभी जागे भी नहीं थे. जब वो लोग भागते हुए लालाजी के कमरे में पहुंचे तो वहां उन्होंने उनकी पत्नी, बेटे और बेटी को उनकी पलंग के चारों ओर खड़े पाया.
सबको डाक्टर का इंतज़ार था. डाक्टर ने आते ही लाला लाजपत राय को मृत घोषित कर दिया.
सभी डॉक्टरों का मानना था कि लालाजी की मौत का कारण था 30 अक्तूबर की दोपहर उनकी देह पर पड़ी पुलिस की लाठियां थीं. कुछ ही क्षणों में ये ख़बर बिजली की तरह पूरे लाहौर में फैल गई.
चारों ओर शोक की लहर छा गई. दोपहर होते-होते लाखों लोग लाला लाजपत राय के अंतिम दर्शन करने के लिए रावी के तट की तरफ़ चल दिए.
भगत सिंह ने लिया बदला
लालाजी पर लाठी चलाने वालों में से एक जेम्स स्कॉट को आनन-फानन में चुपचाप लाहौर से बाहर तैनात कर दिया गया. लाला लाजपत राय के निधन के ठीक एक महीने बाद 17 दिसंबर को शाम होते-होते जिला पुलिस दफ़्तर के सामने गोलियों की आवाज़ सुनाई दी.
हमलावर स्कॉट को मारना चाहते थे लेकिन निशाना बना स्कॉट का नज़दीकी साथी सैंडर्स. घटनास्थल पर ही उसकी मौत हो गई.
जवाहरलाल नेहरू ने लिखा, "भगत सिंह इसलिए लोकप्रिय नहीं हुए कि उन्होंने एक अंग्रेज़ अफ़सर की हत्या की, बल्कि इसलिए हुए क्योंकि देशवासियों की नज़र में उन्होंने लाला लाजपत राय के सम्मान को वापिस दिला दिया. वो एक प्रतीक बन गए. उनके किए गए काम को भुला दिया गया और कुछ ही महीनों में पंजाब और उत्तर भारत का हर कस्बा और गांव उनके नाम से गूँज उठा."
1907 में अंग्रेज़ सरकार ने लाला लाजपत राय और अजीत सिंह को देश निकाला दिया था. उन दोनों को एक ही किले में नज़रबंद रखा गया था लेकिन एक बार भी मिलने नहीं दिया गया था.
छोड़े जाने के बाद दोनों एक ही ट्रेन से लाहौर वापस लाए गए थे. भगत सिंह उन्हीं अजीत सिंह के भतीजे थे, जिन्होंने अंग्रेज़ पुलिस अफ़सर पर गोली चलाकर लाला लाजपत राय की मौत का बदला लिया था.
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