कैसे हारेगा कोरोना जब टेस्टिंग में राज्य कर रहे हैं तीन बड़ी गलतियां

नई दिल्ली- जनवरी के अंत से लेकर अब तक देश में 50 लाख से भी कहीं ज्यादा लोगों का नोवल कोरोना वायरस टेस्ट हो चुका है। आज की तारीख में टेस्टिंग की संख्या में भी भारत दुनिया में चौथे नंबर पहुंच गया है। अलबत्ता, ये भारत की आबादी की तुलना में बहुत ही कम है। बीते 19 मई को भारत ने पहली बार एक लाख टेस्ट का आंकड़ा पूरा किया और उसके बाद रोजाना इसकी संख्या में तेजी से इजाफा ही होता गया है। लेकिन, इसके बावजूद राज्यों में आबादी के हिसाब से टेस्टिंग की संख्या में बहुत बड़ा अंतर देखा जा रहा है और सबसे बड़ी बात ये है कि कई राज्य टेस्टिंग को लेकर तीन बड़ी गलतियां कर रहे हैं, जिसका बड़ा खामियाजा भी भुगतना पड़ सकता है।

राज्यों की ओर से टेस्टिंग में पहली गलती

राज्यों की ओर से टेस्टिंग में पहली गलती

कुछ राज्य पहली गलती तो ये कर रहे हैं कि वो बहुत ही कम लोगों की ही कोरोना जांच कर रहे हैं। मसलन, गुजरात का ही उदाहरण ले लीजिए, संक्रमण के मामले में शुक्रवार को ये देश में चौथे नंबर पर वापस आ गया है, लेकिन जब प्रति 10 लाख की आबादी पर टेस्टिंग की संख्या को देखा जाय तो यह नीचे से पांचवें पायदान पर है। इस मामले में गुजरात से भी पीछे सिर्फ बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और ओडिशा जैसे ही राज्य हैं। आज की तारीख में गुजरात में प्रति 10 लाख की आबादी पर सिर्फ 84 लोगों की ही कोविड-19 टेस्टिंग हो रही है। यहां तक कि झारखंड, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ भी इस मामले में गुजरात से बेहतर स्थिति में है। अगर टेस्टिंग की संख्या कम होगी तो समय पर कोरोना संक्रमितों का पता लगा पाने में देरी हो जाएगी, जिससे पूरी लड़ाई ही कमजोर पड़ सकती है।

राज्य कर रहे हैं ये दूसरी बड़ी गलती

राज्य कर रहे हैं ये दूसरी बड़ी गलती

दूसरी गलती कुछ राज्यों से ये हो रही है कि वह टेस्टिंग के परिणामों के तुलनात्मक आंकलन को नजरअंदाज कर रहे हैं। मसलन, टेस्टिंग के परिणामों के आंकलन के दो आधर हैं, टेस्टिंग पॉजिटिविटी रेट (TPR), जिससे पता चलता है कि लिए गए सैंपल्स का पॉजिटिविटी रेट क्या है और फिर प्रति 10 लाख लोगों की आबादी पर रोजाना कितनी टेस्टिंग हो रही है। अगर इन दोनों आंकड़ों का विश्लेषण होता है तो पता चल जाता है कि कोविड से लड़ने में कौन सा राज्य कैसा कर रहा है। इस मामले में महाराष्ट्र और गुजरात का रिकॉर्ड बहुत ही खराब है। दोनों का टीपीआर बहुत ही ज्यादा है, जबकि डेली टेस्टिंग उसकी तुलना में काफी कम है। टीपीआर के मामले में दिल्ली की स्थिति भी दिनों-दिन नाजुक होती जा रही है और यहां से भी टेस्टिंग में आनाकानी की सूचनाएं मिल रही हैं। हालांकि, पहले इसकी टेस्टिंग की रफ्तार काफी अच्छी थी। पिछले 7 दिनों के आंकड़ों से पता चलता है कि दिल्ली में 10 लाख की आबादी पर 270 लोगों की टेस्टिंग हो रही थी, जबकि महाराष्ट्र में ये संख्या 111 थी। लेकिन, गोवा और जम्मू और कश्मीर में टीपीआर बहुत ही कम है और काफी टेस्टिंग हो रही है। पिछले सात दिनों में वहां प्रति 10 लाख जनसंख्या पर 990 लोगों की टेस्टिंग हुई है, जबकि उसका टीपीआर सिर्फ 1.05 है। वहीं संघ शासित जम्मू और कश्मीर में 10 लाख की आबादी पर 571 की टेस्टिंग हो रही है और उसका टीपीआर भी सिर्फ 1.84 फीसदी है।

राज्यों की ओर से तीसरी बड़ी गलती

राज्यों की ओर से तीसरी बड़ी गलती

तीसरी गलती ये है कि कुछ राज्य अभी भी टेस्टिंग नहीं बढ़ा रहे हैं, जबकि नए मामले मई के मध्य से आने शुरू हुए हैं। गुजरात और दिल्ली जैसे राज्य टीपीआर बढ़ने के बावजूद उस अनुपात में टेस्टिंग नहीं बढ़ा रहे हैं। हालांकि, इस मामले में तमिलनाडु ने गति पकड़ी है। महाराष्ट्र में काफी टेस्ट हो रहे हैं। वहां रोजाना औसतन 14,000 टेस्ट हो रहे हैं, जबकि दिल्ली और गुजरात में रोजाना औसतन 6,000 से भी कम टेस्ट किए जाने लगे हैं। 9 जून तक गुजरात ने 2,61,587 टेस्ट किए थे और दिल्ली ने 2,61,079.

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