हॉकी वर्ल्ड कप: भारत को क्वार्टर फ़ाइनल में पहुंचने के लिए ये करना होगा

भारत ने हॉकी विश्व कप के ग्रुप डी के अपने आख़िरी ग्रुप मुक़ाबले में वेल्स को हरा तो दिया पर जिस अंतर से जीत की ज़रूरत थी, उस तक पहुंचने में नाकामयाब होने से वह सीधे क्वार्टर फ़ाइनल में स्थान बनाने से वंचित हो गया.

Hockey World Cup: what India needs to do to reach the quarterfinals

भारत ने इंग्लैंड की तरह ही ग्रुप में अजेय रहकर उसके बराबर सात अंक बनाए पर गोल अंतर में पिछड़ने के कारण ग्रुप में दूसरे स्थान पर रहा.

इस कारण क्रॉस ओवर मैच में भारत न्यूजीलैंड से खेलेगा. क्वार्टर फ़ाइनल में जगह बनाने के लिए भारत को हर हाल में ये मैच जीतना होगा.

भारतीय कोच ग्राहम रीड जानते थे कि दवाब में खेलने पर स्वाभाविक प्रदर्शन नहीं किया जा सकता है. इसलिए उन्होंने मैच से पहले टीम को खेल पर फ़ोकस करने की सलाह दी थी. ग्राहम रीड का मानना था कि ऐसा करने से परिणाम खुद बखुद पा लिया जाएगा.

पर भारतीय टीम इंग्लैंड को ग्रुप में पीछे छोड़ने के लिए आठ गोल के अंतर से जीत पाने के दवाब से कभी निकल ही नहीं सकी.

इसके परिणामस्वरूप शुरुआत में टीम के हमलों में ज़रा भी पैनापन नहीं दिखा. इसकी वजह से गेंद पर ज़्यादातर समय क़ब्ज़ा रखने पर भी वह ऐसे हमले नहीं बना सकी, जिससे वेल्स को दवाब में लाकर उनके ख़िलाफ़ अपनी योजना के अनुसार गोल जमाए जा सकते.

इसकी वजह से पहला क्वार्टर बिना गोल के निकल गया और दूसरे क्वार्टर में भारतीय टीम सिर्फ़ एक गोल कर हाफ़ टाइम तक 1-0 की बढ़त ही बना सकी.

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एक समय तो जीत के भी लाले पड़ते दिख रहे थे

भारतीय टीम शमशेर और आकाशदीप के गोलों से 2-0 की बढ़त बनाने के बाद अपने खेल को पटरी पर लाकर लक्ष्य पाने के बारे में सोच ही रही थी. लेकिन तीसरे क्वार्टर के आख़िरी दो मिनट में वेल्स ने दो गोल जमाकर 2-2 की बराबरी करके भारतीय टीम ही नहीं कलिंगा स्टेडियम में मौजूद सभी दर्शकों को एकदम से स्तब्ध कर दिया. यह मौका था, जब सारे स्टेडियम में सन्नाटा पसर गया था.

वेल्स के बराबरी पर पहुंचने बाद भारतीय टीम हरकत में आई और आकाशदीप सिंह ने दूसरा गोल जमाकर भारत को एक बार फिर 3-2 से आगे तो कर दिया.

लेकिन इस समय तक वेल्स के हौसले इतने बढ़ गए थे कि आख़िरी क्वार्टर में छह सात मिनट तक भारतीय डिफ़ेंस को चौकन्ना रहकर बढ़त को बनाए रखने के लिए जूझना पड़ा. यह वह समय था, जब लग रहा था कि भारत क्या इस मुक़ाबले को जीत भी पाएगा.

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हरमनप्रीत का आख़िर खाता खुल ही गया

भारतीय कप्तान और देश के नंबर एक ड्रैग फ़्लिकर हरमनप्रीत सिंह के लय में नहीं होने ने ही भारत की मुश्किलों को बढ़ाया है.

आमतौर पर वह भारत की जीत में अहम भूमिका निभाते रहे हैं. पर इस विश्व कप में वह उम्मीदों पर ज़रा भी खरे उतरते नहीं दिखे.

पहले दो मैचों और इस मैच के ख़त्म होने से दो मिनट पहले तक उनके नाम कोई गोल दर्ज नहीं था. पर वेल्स के मैच में बराबरी पाने के लिए पूरी जान लगाने के इरादे की वजह से उसने क़रीब सवा मिनट बाक़ी रहने पर गोलकीपर को हटाकर पूरे 11 खिलाड़ियों से खेलने का फ़ैसला किया.

वेल्स के गोल में गोलकीपर नहीं होने का पहले ललित उपाध्याय ने फ़ायदा उठाकर लंबी क्लियरेंस पर गेंद पर क़ब्ज़ा जमाकर भारत को पेनल्टी कॉर्नर दिलाया और इसे हरमनप्रीत ने गोल में बदल दिया. हो सकता है कि गोल का खाता खुल जाने पर हरमनप्रीत अपनी लय को पा सकें जिसकी भारत को न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ क्रॉस ओवर मैच में बहुत ज़रूरत पड़ने वाली है.

मौजूदा समय में पेनल्टी कॉर्नर लेते समय चार्ज करने वाले खिलाड़ी इतनी तेज़ी से आगे आकर खिलाड़ी के कोण को ब्लॉक करते हैं कि पेनल्टी पर गोल जमाना बेहद मुश्किल होता जा रहा है.

आजकल पेनल्टी कॉर्नर लेने वाले खिलाड़ी को सिर्फ़ 40 सेकेंड ही मिलते हैं. इस वजह से पेनल्टी कॉर्नर लेने में रणनीति बदलने की ज़रूरत है. मुझे याद है कि बालकिशन के भारतीय टीम के मुख्य कोच रहने के समय भारत ने गेंद का गेंद फेंकने वाले खिलाड़ी को गेंद लौटाकर गोल जमाने की रणनीति बनाई थी,जो बहुत कारगर रही थी.

असल में पेनल्टी कॉर्नर लेते समय बचाव करने वालों को गच्चा देने की रणनीति बनानी होगी और एक बदलाव पर टिके रहने के बजाय कई तरीके अपनाने होंगे, तब ही इस मामले में बेहतर परिणाम पाए जा सकते हैं.

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हार्दिक की अनुपस्थिति में आकाशदीप चमके

हम सभी जानते हैं कि आकाशदीप सिंह टोक्यो ओलंपिक टीम में शामिल होने के प्रमुख दावेदार थे. लेकिन आख़िरी समय में उन्हें छोड़ दिया गया था. इस मलाल को वह शायद ही भूलें.

इसकी वजह यह थी कि वह फ़ॉरवर्ड खिलाड़ी हैं और कोच अन्य फ़ॉरवर्डों पर भरोसा कर रहे थे. पर कोच ने बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स से आकाशदीप को अटैकिंग मिडफ़ील्डर के तौर पर खिलाने का फ़ैसला किया, इस तरह से उनकी टीम में जगह बन सकी.

पहले दो मैचों में हार्दिक सिंह ने मिडफ़ील्डर के रूप में बिखेरी चमक में बाकी सभी दब गए. लेकिन इस मैच में हार्दिक के चोटिल होने की वजह से आकाशदीप ने शानदार प्रदर्शन से उनकी कमी को ख़त्म ही नहीं किया, बल्कि दो गोल जमाकर अपनी सार्थकता को साबित कर दिया.

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डिफ़ेंस में पहली बार दिखी दरार

इस विश्व कप के पहले दो मैचों में भारत ने एक भी गोल नहीं खाया था, जिसकी वजह से कोच ग्राहम रीड भी इस बात को गर्व के साथ कह रहे थे.

भारत पहले दो मैचों में भले ही उम्मीदों के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर पाने पर भी यह लग रहा था कि डिफ़ेंस की लंबे समय से चली आ रही कमज़ोरी पर भारत पार पाने में सफल हो गया है.

लेकिन पहली बार दवाब में खेलने पर डिफ़ेंस में दरारें साफ़ नज़र आने लगीं. वह भी ग्रुप की सबसे कमज़ोर टीम और विश्व कप में पहली बार खेल रही वेल्स के ख़िलाफ़.

असल में इंग्लैड और स्पेन के ख़िलाफ़ हमारे डिफ़ेंडर जिस तरह से दिमाग़ को ठंडा रखकर बचाव कर रहे थे, उस सिलसिले को जारी रखने की ज़रूरत है.

सही मायनों में इस मैच में भारत की मुश्किलों को दवाब ने बढ़ाया है. दिलचस्प यह है कि यह दवाब विपक्षी टीमों के बजाय भारतीय खिलाड़ियों ने ख़ुद अपने ऊपर बनाया था.

यह समझ से परे है कि भारतीय टीम सीधे क्वार्टर फ़ाइनल में स्थान बनाने का दवाब क्यों ओढ़े बैठी थी. उन्हें यह समझने की ज़रूरत थी कि वह क्रॉस ओवर के लिए पहले ही क्वालीफ़ाई कर चुकी है और आगे बढ़ने का यह भी एक तरीक़ा है.

वैसे तो बेल्जियम की टीम भी क्रॉस ओवर खेलकर चैंपियन बन चुकी है. सही मायनों में टीम की यह सोच यह होना ज़रूरी है कि सामने कोई भी टीम हो, उसे हर हाल में हराना है.

न्यूजीलैंड के ख़िलाफ़ क्रॉस ओवर मैच में भारत यदि अपने अनुकूल परिणाम चाहता है तो उसे मिले मौकों का फ़ायदा उठाने का अपना प्रतिशत सुधारना होगा. बिना इसमें सुधार लाए जीत के बारे में सोचना बेमानी होगी.

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