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क्या BRO को मिले स्पेशल पावर ने उड़ा रखी है ड्रैगन की नींद

नई दिल्ली- ये बातें तो बीते तीन महीनों से सामने आ रही हैं कि चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा के आसपास भारत की ओर से हो रहे इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास के काम से परेशान है। लेकिन, आज हम आपको बताने वाले हैं कि कैसे बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन को मिले एक स्पेशल पावर ने बीते तीन-चार वर्षों से ड्रैगन की नींद उखाड़ रखी है। मोटे तौर पर मान लीजिए कि ये सिलसिला डोकलाम के बाद से ही शुरू हो चुका है। लेकिन, अब बात समझ में आ गई है कि बीआरओ के डीजी को मिले स्पेशल पावर ने ही शी जिनपिंग का जीना हराम कर दिया है और इसलिए चीन कभी पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में उलझने के लिए आ जाता है तो कभी पैंगोंग झील पर नजरें गड़ा देता है। अरुणाचल से तो उसकी नजरें हटती है नहीं हैं, इसलिए भूटान जैसे शांतिप्रिय देश को भी अपनी शातिर निगाहों से देखना शुरू कर देता है। आइए चीन की बौखलाहट की पूरी वजह समझिए।

चार साल में एलएसी पर इंफ्रास्ट्रक्चर क विकास से परेशान है चीन

चार साल में एलएसी पर इंफ्रास्ट्रक्चर क विकास से परेशान है चीन

बीते चार वर्षों में चीन (भारत के सीमावर्ती इलाकों में इसे वैद्य रूप से तिब्बत कहा जाना चाहिए) से सटी सीमा के आसपास भारत ने सड़क निर्माण पर होने वाले खर्चों में कम से कम तीन गुना इजाफा कर दिया है। इसका नतीजा ये हुआ है कि 2016 में सिक्किम के डोकलाम में चीन के साथ हुई तकरार से पहले सीमावर्ती इलाकों में भारत ने दशकों में जितना इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास किया था, बीते चार वर्षों में उससे कहीं ज्यादा हो चुका है। इन इलाकों में हर मौसम में उपयोग लायक बेहतरीन सड़कें बनी हैं, पुल बने हैं और सुरंगें भी बनाई गई हैं। एक सरकारी आंकड़े के मुताबिक इन इलाकों में सड़क निर्माण के लिए 2016 में अगर 4,600 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे तो 2021-21 में यह आवंटन बढ़कर 11,800 करोड़ रुपये हो चुका है। जबकि, 2008 से 2016 के बीच इसमें महज 1,300 करोड़ रुपये का इजाफा हुआ था। क्योंकि, 2008 में इन इलाकों में सड़क निर्माण के लिए 3,300 करोड़ रुपये आवंटित हुए थे।

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    इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ने की वजह से बार-बार उलझ रहा है चीन

    इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ने की वजह से बार-बार उलझ रहा है चीन

    जाहिर है कि भारत ने डोकलाम के बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास जिस तेजी से इनफ्रास्ट्रक्चर का विकास करना शुरू किया है, वही बात चीन को खटक रही है। ये उसी दौर की बातें हैं, जब एलएसी से सटे देपसांग, चुमार, डोकलाम, गलवान और पैंगोंग त्सो की घटनाओं ने दुनिया की नजर चीन की हरकतों की ओर खींची हैं। जानकारों की मानें तो इनमें भी चीन की ओर से वास्तविक नियंत्रण रेखा के उल्लंघन की घटनाओं में 50 से 60 फीसदी इजाफा सिर्फ 2018 और 2019 के बीच ही नजर आया है। यह वही समय है जब भारत ने एलएसी पर चीन के मौजूद इंफ्रास्ट्रक्चर के अंतर को पाटना शुरू कर दिया है। वैसे, भले ही एलएसी के नजदीक इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण में पिछले तीन-चार वर्षों में बहुत ज्यादा तेजी आई हो, लेकिन इसकी नीव जुलाई 2014 में ही पड़ गई थी। तभी केंद्र सरकार ने एलएसी से 100 किलोमीटर के हवाई दायरे में सड़कों के निर्माण के लिए पर्यावरण से जुड़ी आम मंजूरी दे दी थी और लालफीताशाही की कमर टूट गई थी।

    एलएसी पर भारत की ओर कैसे आया है बदलाव

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    मसलन, 2017 तक भारतीय इलाके में सड़कों पर मिट्टी बिछाने के लिए पहाड़ों को काटने का काम सालाना 230 किलोमीटर की गति से होता था, लेकिन उसके बाद 470 किलोमीटर प्रति वर्ष के हिसाब से हो रहा है। इसी तरह सड़क की ऊपरी सतह का निर्माण पिछले दशक में 170 किलोमीटर सालाना हो रहा था, लेकिन सिर्फ तीन साल में ही यह 380 किलोमीटर सालाना की रफ्तार से हो रहा है। चीन की सीमावर्ती इलाकों में यह कायाकल्प सिर्फ सड़क निर्माण में ही नहीं हुआ है, यह बदलाव सुरंग निर्माण और पुलों के निर्माण में भी हुआ है। अगर यूपीए और एनडीए के कार्यकाल में हुए इन निर्माणों की तुलना करें तो भारत-चीन सीमा पर 2008 से 2014 के बीच 3,610 किलोमीटर सड़कों का निर्माण हुआ तो 2014 से 2020 के बीच 4,764 किलोमीटर सड़कें बनी हैं। यूपीए के कार्यकाल में इन इलकों में 7,270 मीटर पुल बनाए गए तो एनडीए के कार्यकाल में दोगुने यानि 14,450 मीटर पुल का निर्माण हुआ। सुरंगों की बात करें तो मनमोहन सिंह के कार्यकाल में 1 सुरंग बन पाई तो नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में अब 6 सुरंगों के निर्माण का काम पूरा हो चुका है।

    BRO को मिले स्पेशल पावर ने उड़ा रखी है ड्रैगन की नींद

    BRO को मिले स्पेशल पावर ने उड़ा रखी है ड्रैगन की नींद

    तीन-चार वर्षों में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर युद्धस्तर पर सड़कें भी बनी हैं, पुलों का भी निर्माण हुआ है और सुरंगें भी तैयार हो चुकी हैं। लेकिन, यह सब इतनी जल्दी नहीं हो पाता अगर केंद्र सरकार ने इसके लिए बोर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन (बीआरओ) और उसके डायरेक्टर जनरल को इसके लिए खुली छूट न दी होती। क्योंकि, इन सीमावर्ती इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण की मुख्य जिम्मेदारी बीआरओ की ही होती है, इसलिए सरकार ने उसके डीजी को स्पेशल पावर दिए जिससे कि वो तेजी से निर्माण का काम पूरा करने के लिए बिना लालफीताशाही के जरूरतों के मुताबिक भारी से भारी उपकरण खरीद सकें। इसी का नतीजा हुआ कि बीआरओ ने एलएसी पर सड़कों के जल्द निर्माण के लिए भारी से भारी बर्फ काटने वाले उपकरण, खुदाई के उपकरण, पत्थरों में ड्रिल करने लिए भारी मशीन और मिट्टी के समतलीकरण के लिए अत्याधुनिक मशीनें और नई सर्फेसिंग टेक्नोलॉजी की खरीदारी की।

    एलएसी के इन्हीं प्रोजेक्ट ने उड़ाई है ड्रैगन की नींद

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    भारत में जो सामरिक प्रोजेक्ट तैयार होने के करीब है उसमें अरुणाचल प्रदेश स्थित 'से ला सुरंग' भी शामिल है। इसके तैयार होने के बाद भारतीय सेना आसानी से चीन की सीमा पर स्थित जिले तवांग तक अपनी फौज उतार सकती है। लद्दाख की बात करें तो 255 किलोमीटर लंबी डरबोक-श्योक-दौल बेग ओल्डी (DSDBO) रोड तैयार है, जिसने चीन की नींद उड़ा रखी है। इनके अलावा जितने प्रोजेक्ट पूरे हो चुके हैं, उनमें लद्दाख सेक्टर में ससोमा और ससेरिया, मानसरोवर सेक्टर में घाटियाबागढ़-लिपुलेख, उत्तराखंड में गुंजी-कुट्टी-जॉलिंगकॉन्ग और सिक्किम में डोकलाम शामिल हैं। (तस्वीरें फाइल)

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