'मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बेहतर'

गुजरात में पढ़तीं मुस्लिम लड़कियां
BBC/Zubair Ahmed
गुजरात में पढ़तीं मुस्लिम लड़कियां

गुजरात में प्रतियोगी परीक्षाएं क़रीब हैं.

अहमदाबाद के मुस्लिम इलाक़े जमालपुर के एक कोचिंग सेंटर में 20 से 25 मुस्लिम लड़के और लड़कियां बड़े ध्यान से लेक्चर सुन रहे हैं. इस कोचिंग क्लास में केवल मुस्लिम छात्र हैं. यहाँ पढ़ाई मुफ़्त है. वो सरकारी नौकरियों के इच्छुक हैं. ये पीढ़ी साल 2002 में हुई हिंसा के बाद की पीढ़ी है.

इनमें से कई नौजवान पहली बार वोट डालने के लिए योग्य हुए हैं. लगभग सभी ने विकास के नाम पर वोट डालने का फैसला किया है. जो उनके इलाक़े का विकास करेगा वोट उसी को दिए जाएंगे. इनमें से किसी ने भी साम्प्रदायिक विचारधारा के हिसाब से वोट डालने से इंकार किया.

इन नौजवानों के दोस्त हिंदू भी हैं और मुसलमान भी. उनका ध्यान नौकरी और परीक्षा पर केंद्रित है.

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बुलेट ट्रेन की बात करते हैं लेकिन...

गुजरात के दूसरे और आखिरी चरण का मतदान 14 दिसंबर को है. गुजरात एक युवा आबादी वाला राज्य है. ज़ाहिर है लाखों युवा पहली बार अपने मत का इस्तेमाल करने जा रहे हैं. उनके लिए ये एक एतिहासिक दिन होगा.

छात्रा पठान शहनाज़ अब वोट डालने की उम्र को पहुँच चुकी हैं और 14 दिसंबर को पहली बार अपने मत का इस्तेमाल करेंगी. कैसा महसूस कर रही हैं? वो पूरे आत्मविश्वास के साथ कहती हैं, "ऐसा लग रहा है कि हाथ में शक्ति आई है."

शहनाज़ चाहती हैं कि वो अपने वोट से कुछ बदलाव लाएं. उनका मानना है कि अभी विकास उन्हीं जगहों पर हो रहा है जो पहले से ही विकसित हैं. वो कहती हैं, "कहने को तो बुलेट ट्रेन लाने जा रहे हैं लेकिन जो पुराने स्टेशन हैं, वहां कुछ कर ही नहीं रहे."

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परिवर्तन के नाम पर वोट डालेंगे

उनकी सहेली अल-शिफ़ा उनसे सहमत हैं. वो चाहती हैं कि विकास के केवल नारे न लगाए जाएँ. वो तंज़िया लहज़े में कहती हैं, "सब को पता है कितना विकास हुआ है."

पहली बार वोट डालने वालों में बुख़ारी महीद को शिकायत है कि मुस्लिम इलाक़ों का विकास नहीं हो रहा है. वो कहते हैं, "हमारे इलाक़े में पीने का पानी आता ही नहीं, रोज़ टैंकर से पानी लेना पड़ता. वहां गटर लाइन तो है ही नहीं."

सैयद नदीम हुसैन भी वोट देने की उम्र में दाखिल हो चुके हैं और उन्हें 14 दिसंबर का बेसब्री से इंतज़ार है जब वो पहली बार अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सकेंगे. उनका कहना है कि वो परिवर्तन के नाम पर वोट डालेंगे. वो कहते हैं, "22 साल से ये विकास की बात कर रहे हैं लेकिन एक भी नया स्कूल या नई संस्था नहीं खुली है."

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गुजरात दंगों को भुला देने के कई सुझाव पर एक छात्र ने कहा, "हम मुसलमान हैं सर. हमारा मज़हब भी यही सिखाता है कि शांति चाहिए. भूलने के लिए हम बेशक तैयार हैं लेकिन जैसे ही सेंसटिव माहौल बनता है, पुरानी यादें ताज़ा हो जाती हैं. इतिहास कभी भुलाया नहीं जा सकता. ये इतिहास का हिस्सा है."

आयशा पठान पहली बार वोट डालने वालों में हैं और ये स्वीकार करती हैं कि हिन्दू-मुस्लिम मन-मुटाव अब भी है. वो इस बात की शिकायत करती हैं कि बैंक और अस्पताल जैसी जगहों पर अब भी मुसलमानों के खिलाफ भेद-भाव हैं.

कोचिंग क्लास में मौजूद लगभग सभी मुस्लिम युवाओं ने कहा कि मुस्लिम इलाक़ों में पिछड़ेपन के कारण प्रशासन और मुस्लिम समाज दोनों हैं. उनका कहना था कि उनका मत कामयाब उसी समय होगा जब वो इस पिछड़ेपन को दूर कर सकें.

ये पूछे जाने पर कि क्या वो ग़ैर मुस्लिम इलाक़ों में जाकर रहना पसंद करेंगे सब ने कहा वो अपने इलाक़ों में रहना पसंद करेंगे और विकास के लिए लड़ते रहेंगे.

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नरेंद्र मोदी पर उनकी क्या सोच?

वहां मौजूद सभी छात्रों ने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तरजीह दी. ये हैरानी की बात थी क्योंकि 2002 के दंगों के पीड़ित नरेंद्र मोदी को भी दंगों का ज़िम्मेदार मानते हैं. लेकिन इन नौजवानों ने कहा कि जब नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री थे तो राज्य का विकास सही हुआ.

कई ने शिकायत की कि प्रधानमंत्री अब गुजरात को भूल गए हैं. शून्य में से 10 तक के स्केल पर अधिकतर युवाओं ने प्रधानमंत्री के प्रदर्शन पर औसतन 5 नंबर दिए. कुछ ने सात नंबर भी दिए. लेकिन सभी ने उनकी आलोचना इस बात पर की कि वो विकास का जितना नारा देते हैं उतना विकास हुआ नहीं.

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