'गैर हिंदू रजिस्‍टर' में राहुल गांधी का नाम? सोमनाथ कंट्रोवर्सी छोडि़ए, कुछ और है असली कहानी

नई दिल्‍ली। राहुल गांधी हिंदू हैं, शिवभक्‍त भी हैं। उनकी दादी इंदिरा गांधी रुद्राक्ष की माला पहना करती थीं। राजीव गांधी क अंतिम संस्‍कार हिंदू रीति-रिवाजों से किया गया। सबूत के तौर पर राहुल गांधी की तस्‍वीर भी पेश की गई। बात में है, सारी बातें एकदम सच्‍ची लगती हैं, लेकिन ये बातें क्‍यों बताई जा रही हैं? क्‍योंकि सोमनाथ मंदिर के गैर हिंदू रजिस्‍टर में राहुल गांधी का नाम दर्ज पाया गया। किसने लिखा? कह नहीं सकते, हो सकता है चुनावी माहौल में कांग्रेस को घेरने के लिए जाल बिछाया गया हो, हो सकता है कांग्रेस कार्यकर्ता की गलती हो। हो तो ये भी सकता है कि वाकई राहुल गांधी हिंदू न हों? क्‍या पता सुब्रमण्‍यम स्‍वामी का तुक्‍का सही हो? हमारे पास कोई सबूत नहीं तो क्‍या कहें? खैर छोडि़ए आखिर धर्म में क्‍या रखा है? हम तो भारत हैं, जन्‍म से सेक्‍युलर हैं, वो और बात है धर्म-जाति के नाम पर ही वोट देते हैं। वो और बात है कि भारत के सभी दल धर्म-जाति के नाम पर ही मांगते हैं तो क्‍या हुआ? फिर भी हम सेक्‍युलर हैं।

वोट के लिए मुल्‍ला बने मुलायम, नीतीश ने भी बदला चोला

वोट के लिए मुल्‍ला बने मुलायम, नीतीश ने भी बदला चोला

कांग्रेस हो या बीजेपी, सपा हो या बसपा या लालू राजद और नीतीश की जदयू, सबका एक ही धर्म है सियासत और सियासत वोटबैंक से चलती है। मतलब जैसा वोटबैंक वैसा जाप। वोट के लिए मुल्‍ला मुलायम बन गए, वोट के लिए आडवाणी रथ पर चढ़े, वोट के लिए ही नीतीश ने कितनी बार चोला बदला। अब बात कांग्रेस की, ये सारे राजनीतिक दलों का प्रेरणास्रोत तो कांग्रेस ही है।

और हिंदू प्रतीकों को रौंदती चली गई कांग्रेस

और हिंदू प्रतीकों को रौंदती चली गई कांग्रेस

हमारे देश की ग्रैंड ओल्‍ड पार्टी मतलब सबसे पुराना पार्टी, जिसका नाम 'गैर हिंदू रजिस्‍टर' में दर्ज हुआ। जिस गैर हिंदू रजिस्‍टर की बात कर रहा हूं, वो सोमनाथ मंदिर वाला नहीं है। वो राजनीति का 'गैर हिंदू रजिस्‍टर' है, इसमें कांग्रेस का नाम सोनिया गांधी के कमान संभालने के बाद से ही लिख दिया गया था। यही कारण रहा कि मनमोहन सिंह के नेतृत्‍व में यूपीए के दो कार्यकाल के दौरान हिंदुत्‍व के सारे प्रतीकों का जमकर मजाक उड़ाया गया। रामसेतु को खारिज किया गया, भगवा आतंकवाद जैसे शब्‍दों को गढ़ा गया। खुद राहुल गांधी ने हिंदू आतंकवाद को लश्‍कर से ज्‍यादा खतरनाक बताया। दिग्विजय सिंह ने तो ओसामा बिन लादेन को जी कहा, उन्‍हें मुंबई हमले के पीछे भी भगवा रंग दिखा। ये सब तब तक ठीक था, जब तक नरेंद्र मोदी राष्‍ट्रीय पटल पर नहीं आए थे।

हिंदुत्‍व की चाशनी में विकास लपेटकर लाए मोदी

हिंदुत्‍व की चाशनी में विकास लपेटकर लाए मोदी

2014 में उनके आने के बाद कहानी पलट गई, क्‍योंकि बरसों बाद देश के बहुसंख्‍यक हिंदुओं ने विकास की चाशनी में लिपटे हिंदुत्‍व को देखा। खासतौर से महिलाएं, जो कि ज्‍यादा धार्मिक होती हैं, उन पर नरेंद्र मोदी का जादू खूब चला। हिंदू आइकॉन मतलब नरेंद्र मोदी हमेशा विकास, विकास, विकास का नारा देते हैं, लेकिन नियमित अंतराल पर कभी मां भगवती तो कभी महादेव के मंदिरों में श्रद्धाभाव से हाथ जोड़े भी नजर आते हैं। शायद भारत में पले-बढ़े न होने के चलते सोनिया गांधी हिंदुत्‍व के प्रतीकों के अपमान के चुनावी नुकसान का अंदाजा नहीं लगा सकीं। भारत को समझना इतना आसान नहीं है, इस धरती पर जन्‍मे और पले-बढ़े जवाहर लालू नेहरू तक को इंडिया की डिस्‍कवरी करनी पड़ी थी। उसी के फलस्‍वरूप देश को 'डिस्‍कवरी ऑफ इंडिया' जैसी किताब नेहरू ने दी।

नेहरू, इंदिरा, राव और राजीव ने हिंदुत्‍व के बराबर साधा

नेहरू, इंदिरा, राव और राजीव ने हिंदुत्‍व के बराबर साधा

कांग्रेस का हिंदुत्‍व से पल्‍ला झाड़ना कितना नुकसानदेह साबित हुआ, इसका अंदाजा आप कांग्रेस के पूर्वजों के व्‍यवहार से लग जाता है। नेहरू ने कभी हिंदुत्‍व से जुड़े प्रतीकों का अपमान नहीं किया। उनकी बेटी इंदिरा ने भी हिंदू प्रतीकों को आत्‍मसात किया। जैसा कि कांग्रेस ने हाल में कहा कि वह रुद्राक्ष पहनती थीं। वह मंदिर भी जाया करती थीं। इंदिरा के बेटे राजीव गांधी के बारे में चर्चा आम रहती है कि राम मंदिर को लेकर उनका क्‍या रुख रहा। राजीव के बाद कांग्रेस के सबसे कद्दावर नेता नरसिम्‍हा राव ने भी कभी हिंदुत्‍व से मुंह नहीं मोड़ा। नेहरू और पटेल के बीच मतभेदों की खूब चर्चा होती है, लेकिन सियासी समीकरण के तौर पर देखें तो एक ही सरकार के ये दो सबसे कद्दावर नेता- एक सेक्‍युलर और दूसरा हिंदुत्‍व प्रतीकों को ओढ़े हुए था। नेहरू की कांग्रेस ने दोनों पक्षों को बराबर साधा था।

नरसिम्‍हा राव के बाद हिंदुत्‍व से अलग होती गई कांग्रेस

नरसिम्‍हा राव के बाद हिंदुत्‍व से अलग होती गई कांग्रेस

नरसिम्‍हा राव के बाद कांग्रेस टूटी, कमजोर हुई और बुरी हालत में सोनिया गांधी ने कमान संभाली। नरसिम्‍हा राव वो कांग्रेसी पीएम थे, जिन्‍होंने राम मंदिर आंदोलन के दौर में भी कभी राम मंदिर विरोधी रुख नहीं अपनाया। उन्‍होंने हिंदू आतंकवाद जैसे शब्‍दों का उपयोग कभी नहीं किया। यह सच है कि सोनिया के आने के बाद कांग्रेस ने एक के बाद एक चुनावी जीत हासिल कीं, लेकिन यह भी सत्‍य सत्‍ता को संभाले रखने की दूरदृष्टि के लिए वह अहमद पटेल जैसे नेताओं पर निर्भर थीं। यही कारण रहा कि वह हिंदुत्‍व और धर्मनिरपेक्षता का बराबर साध नहीं पाईं। जैसा कि नेहरू, इंदिरा, राजीव और नर‍सिम्‍हा राव करने में सफल रहे थे। सोनिया गांधी की इसी चूक ने कांग्रेस का नाम गैर हिंदू रजिस्‍टर में दर्ज करा दिया। राहुल गांधी के हिंदू होने पर जो सवाल उठे, वो उसी चूक का परिणाम हैं, जो सोनिया गांधी या उनके सलाहकार मंडल से हुई।

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