लोकसभा चुनाव 2019: 33 साल बाद पहली बार दार्जिलिंग से गोरखालैंड का मुद्दा गायब क्यों है?

नई दिल्ली- दार्जिलिंग में तीन दशक से ज्यादा समय बाद ये पहला ऐसा चुनाव हो रहा है, जिसमें कोई भी पार्टी अलग राज्य यानी गोरखालैंड का मुद्दा नहीं उठा रही है। पहली बार वहां सभी पार्टियां विकास की बात कर रही हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि इस मुद्दे पर गोरखा जन मुक्ति मोर्चा (GJM) और गोरखा नेशनल लिब्रेशन फ्रंट (GNLF) जैसी पार्टियों की भी राय जुदा नहीं है। लेकिन, क्या यही सच है कि इसके पीछे की कहानी कुछ और इस रिपोर्ट इसके पीछे की कहानी सामने लाने की कोशिश कई गई है।

गोरखालैंड पर भारी विकास का मुद्दा!

गोरखालैंड पर भारी विकास का मुद्दा!

द प्रिंट की खबर के मुताबिक दार्जिलिंग में इस बार गोरखालैंड के बदले विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ रही टीएमसी के उम्मीदवार अमर सिंह राय कहते हैं- "हमारे लिए इस बार अलग राज्य मुद्दा नहीं है। हम पहाड़ के पूर्ण विकास पर जोर दे रहे हैं, जो कि पिछले कई वर्षों से इससे वंचित है।" राय टीएमसी में शामिल होने से पहले गोरखा जन मुक्ति मोर्चा (GJM) से विधायक रह चुके हैं। ये वही गोरखालैंड समर्थक हैं, जो 2017 में 104 दिनों तक चली हड़ताल में बढ़-चढ़कर शामिल हुए थे। उनका मुकाबला यहां बीजेपी से होना है, इसलिए वे उस पर निशाना साधने से भी नहीं चूक रहे। उन्होंने कहा- "हमारा एजेंडा विकास है। पिछले 10 वर्षों में बीजेपी के सांसदों ने पहाड़ के लोगों के लिए कुछ नहीं किया।" उन्हें यहां बीजेपी के राजू सिंह बिस्ता का सामना करना है है, जो पूर्व में गोरखा नेशनल लिब्रेशन फ्रंट (GNLF) में शामिल रह चुके हैं। बीजेपी के दार्जिलिंग जिला अध्यक्ष मनोज दिवान भी कहते हैं- "हमारे लिए अलग राज्य मुद्दा नहीं है। हम पहाड़ में लोकतंत्र की बहाली के लिए लड़ रहे हैं,क्योंकि पहाड़ की समस्या का राजनीतिक हल निकालने के लिए संघर्ष जरूरी है....पुलिस और बिनय तमांग ग्रुप के आतंक का राज खत्म को खत्म होना होगा।"

टीएमसी जिसने पिछली हड़ताल के दौरान अलग राज्य की मांग का विरोध किया था, इस बार पीने का पानी, बिजली, शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दे उठा रही है। वहीं बीजेपी जो गोरखांड की मांग के प्रति शुरू से नरम रह ही, 2017 के बाद से जारी कथित पुलिसिया आतंक को खत्म कर लोकतंत्र की बहाली पर जोर दे रही है। इसके अलावा यहां चाय मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी और बंद पड़े चाय बागानों का जैसे मुद्दे भी मौजूद हैं।

विकास तो बहाना है, वर्चस्व पर निशाना है!

विकास तो बहाना है, वर्चस्व पर निशाना है!

दरअसल, दार्जिलिंग में इस बार बिनय तमांग की अगुवाई वाले गोरखा जन मुक्ति मोर्चा (GJM) समर्थित टीएमसी और बिमल गुरुंग की अगुवाई वाले गोरखा जन मुक्ति मोर्चा (GJM) एवं गोरखा नेशनल लिब्रेशन फ्रंट (GNLF) समर्थित बीजेपी के बीच है। वैसे खबरें हैं कि इन दलों की ओर से अलग गोरखालैंड का मुद्दा इस बार जानबूझकर नहीं उठाया जा रहा है, क्योंकि इस चुनाव में गोरखा जन मुक्ति मोर्चा (GJM) के दोनों गुटों में पहाड़ का वर्चस्व तय होना है।

दरअसल, 2017 में गोरखालैंड के मसले पर दार्जिलिंग में तब बवाल हुआ था, जब गोरखा जन मुक्ति मोर्चा (GJM) के बिमल गुरुंग की अगुवाई में 104 दिन लंबी हड़ताल चली थी। उन्होंने राज्य की टीएमसी सरकार पर आरोप लगाया था कि वो गोरखा की पहचान ही मिटा देना चाहती है। इस आंदोलन में कुछ पुलिसकर्मियों समेत कई लोग मारे गए। इसके बाद गुरुंग को पहाड़ छोड़कर भागना पड़ा। वे तब से फरार हैं। इसी हड़ताल के बाद से गोरखा जन मुक्ति मोर्चा (GJM) में दो फाड़ हो गया और गुरुंग के डिप्टी बिनय तमांग ने मोर्चे पर कब्जा कर लिया और गुरुंग और उनके समर्थकों को पार्टी से निकाल दिया। तमांग ने टीएमसी की मदद से तब से खुद को एक तरह से पहाड़ का नेता घोषित कर रखा है।

दार्जिलिंग के साथ अब तक क्या हुआ?

दार्जिलिंग के साथ अब तक क्या हुआ?

दार्जिलिंग पश्चिम बंगाल का एक सुंदर पहाड़ी शहर है, जहां गोरखा समुदाय का दबदबा है। इनके अलावा लेप्चा, शेरपा,भुटिया समुदाय के लोग भी यहां मौजूद हैं। ये इलाक अपनी वर्ल्ड-क्लास चाय के लिए दुनिया भर में मशहूर है। तीन दशक से भी पहले से राजनीतिक पार्टियों ने पहाड़ के लोगों को अधिक स्वायत्ता दिलाने के नाम पर अलग राज्य बनाने का वादा करना शुरू कर दिया था। इसकी उग्र शुरुआत सुभाष घिसिंग की अगुवाई वाले गोरखा नेशनल लिब्रेशन फ्रंट (GNLF) ने की, जिसके चलते 1986 में वहां पहली बार हिंसक आंदोलन हुए। 43 दिनों तक चले उस आंदोलन में 1,200 लोगों की मौत हुई थी। इतने बड़े आंदोलन के बाद वहां के लोगों को शांत करने के लिए 1988 में दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल का गठन किया गया। 23 साल तक इस काउंसिल ने थोड़ी बहुत स्वायत्ता के साथ काम किया। लेकिन, 2007 में गोरखा जन मुक्ति मोर्चा (GJM) बनने के बाद अलग राज्य के आंदोलन ने एक बार फिर से जोर पकड़ लिया और उसकी अगुवाई सुभाष घिसिंग के समर्थक बिमल गुरुंग ने की। 2011 में टीएमसी की सरकार बनने के बाद गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (GTA) बनाकर उसकी कमान गुरुंग के हाथों में दे दी गई। लेकिन, यह शांति भी ज्यादा दिन तक कायम नहीं रही और पहले 2013 में आंदोलन शुरू हुए। फिर 2017 आते-आते भयानक संघर्ष की शुरुआत हो गई। लेकिन, 104 दिनों के हड़ताल के बाद वहां फिलहाल शांति नजर आ रही है।

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