Bhima Koregaon Case: SC ने आरोपी सुधा से कहा- मेरिट बेस्ड पर जमानत की अर्जी क्यों नहीं देते?

नई दिल्‍ली। भीमा कोरेगांव मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी सुधा भारद्वाज की मेडिकल के आधार पर जमानत की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को सुनवाई से इनकार कर दिया है। आपको बता दें कि भारद्वाज की ओर से मेडिकल की याचिका दाखिल की गई थी। कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज करते हुए कहा है कि उनके पास एक अच्छा मामला है और उन्हें मेरिट के आधार पर जमानत याचिका दाखिल करनी चाहिए।

supreme court

मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस यूयू ललित ने कहा कि 'आपने मेडिकल आधार पर संपर्क क्यों किया है? शुगर लेवल ठीक है। हम चिकित्सा आधार पर इस जमानत पर आपके साथ नहीं हैं। आप मेरिट के आधार पर जमानत की अर्जी क्यों नहीं देते?' सुधा की वकील वृंदा ग्रोवर ने याचिका को वापस ले लिया। उन्होंने कहा कि सुधा के पास से कुछ भी बरामद नहीं हुआ है। बता दें कि 28 अगस्त को एल्गार परिषद मामले की आरोपी प्रोफेसर सुधा भारद्वाज की अंतरिम जमानत अर्जी बॉम्बे हाईकोर्ट ने खारिज कर दी थी। सुधा भारद्वाज भायखला महिला जेल में बंद हैं। स्वास्थ्य कारणों से भारद्वाज ने जमानत की अपील की थी। अदालत ने राज्य सरकार के दायर हलफनामे पर विचार किया, जिसमें 21 अगस्त की नवीनतम चिकित्सा रिपोर्ट शामिल थी। रिपोर्ट में उनका स्वास्थ्य सामान्य बताया गया है।

क्‍या है भीमा कोरेगांव मामला

एक जनवरी 2018 को पुणे के पास भीमा-कोरेगांव लड़ाई की 200वीं वर्षगांठ पर एक समारोह आयोजित किया गया था, जहां हिंसा होने से एक व्यक्ति की मौत हो गई थी। इतिहास में जाएं तो भीमा-कोरेगांव लड़ाई जनवरी 1818 को पुणे के पास हुई थी। ये लड़ाई ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना और पेशवाओं की फौज के बीच हुई थी। इस लड़ाई में अंग्रेज़ों की तरफ से महार जाति के लोगों ने लड़ाई की थी और इन्हीं लोगों की वजह से अंग्रेज़ों की सेना ने पेशवाओं को हरा दिया था। महार जाति के लोग इस युद्ध को अपनी जीत और स्वाभिमान के तौर पर देखते हैं और इस जीत का जश्न हर साल मनाते हैं।

इस साल जनवरी में भीमा-कोरेगांव में भी लड़ाई की 200वीं सालगिरह को शौर्य दिवस के रूप में मनाया गया। इस दिन लोग यह दिवस मनाने के लिए एकत्र हुए। भीम कोरेगांव के विजय स्तंभ में शांतिप्रूवक कार्यक्रम चल रहा था। अचानक भीमा-कोरेगांव में विजय स्तंभ पर जाने वाली गाड़ियों पर किसी ने हमला बोल दिया। इसी घटना के बाद दलित संगठनों ने 2 दिनों तक मुंबई समेत नासिक, पुणे, ठाणे, अहमदनगर, औरंगाबाद, सोलापुर सहित अन्य इलाकों में बंद बुलाया जिसके दौरान फिर से तोड़-फोड़ और आगजनी हुई। इसके बाद पुणे के ज्वाइंट कमिश्नर ऑफ पुलिस रवीन्द्र कदम ने भीमा-कोरेगांव में दंगा भड़काने के आरोप में विश्राम बाग पुलिस स्टेशन में केस दर्ज किया और पांच लोगों को गिरफ्तार किया।

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