कभी मोदी को सीधी टक्कर देने वाले नीतीश सिमटे माझी की लड़ाई में
पटना। दो साल पहले जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी को सीधी टक्कर देने का फैसला लिया था तो किसी ने नहीं सोचा था कि 17 साल पुराना गठबंधन जदयू-भाजपा टूट जाएगा। नीतीश कुमार ने कहा था कि बिहार के साथ देशभर के लोगों को सांप्रदायिक ताकतों को हराने के लिए आगे आना चाहिए।

मोदी-नीतीश साथ-साथ
गुजरात में 2002 के दंगों के बाद से नीतीश कुमार ने कभी भी नरेंद्र मोदी पर निशाना नहीं साधा था। नीतीश कुमार अटल बिहारी के कार्यकाल में रेल मंत्री थे और गुजरात दंगे एक ट्रेन हादसे के बाद हुए थे।
गुजरात में इस हादसे के बाद नीतीश कुमार ने बिहार में अपनी ताकत को बढ़ाना शुरु किया था और उसके बाद से ही नीतीश कुमार ने अपनी राजनैतिक महत्वकाक्षांओं को बढ़ाना शुरु कर दिया था। वाजपेयी जी के राजनीति से सन्यास के बाद लाल कृष्ण आडवानी के बढ़ती उम्र को देखते हुए नीतीश कुमार ने खुद को एनडीए के शीर्ष नेता के रूप में पटना और बिहार के बाहर अपना भविष्य तलाशना शुरु कर दिया था।
बिहार का मुख्यमंत्री बनने के बाद नीतीश का कद बढ़ा
2005 में जब नीतीश कुमार ने बिहार का किल फतह किया था और बतौर मुख्यमंत्री अपना कार्यभार संभाला था उसके कुछ ही समय बाद उनकी गिनती देश के बेहतरीन मुख्यमंत्री के तौर पर होने लगी थी। बिहार में नीतीश के बढ़ते कद के आगे नीतीश को राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में इस बात का एहसास होने लगा था कि गुजरात दंगों की आंच उनके राजनैतिक भविष्य के बीच बाधा बन सकती है।
2009 में लुधियाना की रैली से बदला नीतीश का रुख
मई 2009 ये वह साल था जब लोकसभा के चुनाव होने थे और नीतीश कुमार एक रैली में खुद मौजूद थे जहां उनके साथ मंच पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी मौजूद थे। इसी मंच पर दोनों नेताओं की एक साथ ली गयी तस्वीर जिसको लेकर नीतीश कुमार पर हमेशा से हमला होता रहा, कि एक समय दोनों नेता साथ थे और राजनैतिक महत्वकांक्षाओं के चलते दोनों नेताओं में टकराव की स्थिति पैदा हुए। जिस समय जदयू का एनडीए से गठबंधन टूटा उसके बाद से मोदी और नीतीश कुमार में कई बार अपरोक्ष रूप से टकराव होते रहे।
लोकसभा चुनाव के बाद बैकफुट पर आए नीतीश, माझी को सौंपी कमान
जिस तरह से 2014 के लोकसभा चुनाव के प्रचार में नरेंद्र मोदी ने पूरे देश का रूख भाजपा की ओर करने में सफल हुए थे। उसके बाद जिस तरह से लोकसभा चुनाव के नतीजे एकतरफा भाजपा के पक्ष में आए और पूर्ण बहुमत के साथ मोदी ने अपनी ताकत का एहसास कराया उसके बाद से ही नीतीश कुमार का रुख पूरी तरह से बदल गया।
नीतीश कुमार की साख पर राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं बल्कि बिहार की राजनीति में भी बड़ा बट्टा लगा था। नीतीश कुमार ने लोकसभा चुनाव में हार की जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। साथ ही बिहार में महादलित के वोट बैंक को साधने के लिए नीतीश कुमार ने जीतन राम माझी को मई 2014 में बिहार की कमान सौंपी।
बिहार में अगले विधानसभा चुनाव महज कुछ ही महीनों बाद होने हैं। ऐसे में चुनाव से कुछ महीनों पहले नीतीश ने माझी को पद से हटाने का मन बना लिया था और खुद के हाथ में एक बार फिर से बिहार की बागडोर संभालने का फैसला लिया।
माझी की आड़ में बिहार में सत्ता की जंग
माझी ने जबसे बिहार की कमान संभाली थी तब से वह अपने बयानों को लेकर हमेशा में विवाद में रहे। लेकिन बिहार में प्रशासन की विफलता के लिए सिर्फ माझी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है, बल्कि इसके पीछे अहम वजह सत्ता का संघर्ष था।
नीतीश कुमार के लिए माझी को उनके पद से हटाना एक बड़ी मुश्किल का सबब बन सकता है। हालांकि नीतीश इस फैसले के बाद इसके नुकसान से भी वाकिफ होंगे। लेकिन जिस तरह से माझी को उनके पद से हटाया गया उसके बाद से नीतीश कुमार की राजनैतिक महत्वकांक्षा और उनका दोहरा रवैया बिहार के सामने आ गया है।
सत्ता के संघर्ष में नीतीश ने खुद की साख को दांव पर लगाया
नीतीश कुमार ने बिहार में लालू प्रसाद यादव को हराने के लिए बहुत ही आक्रामक रुख अख्तियार किया था। यही नहीं उन्होंने हर तरह से लालू पर हमला बोला था। लेकिन सत्ता के संघर्ष में जिस तरह से नीतीश ने लालू को फिर से गले लगाया था उससे बिहार के लोगों का नीतीश से भरोसा कम होने लगा है।
महादलित वोट बैंक की राजनीति
जदयू ने एनडीए से जब गठबंधन तोड़ा था तो उसकी अहम वजह उच्च जाति की राजनीति को दरकिनार करना था। लेकिन माझी विवाद के बाद जिस तरह से महादलित वोट बैंक में सेंधमारी शुरु हुई है वह नीतीश के लिए मुश्किल का सबब बन सकती है। एक समय नीतीश ने नरेंद्र मोदी से सीधे तौर पर सामना करने का मन बनाया था लेकिन अब जिस तरह से वो माझी के साथ लड़ाई में उलझ कर रह गये हैं वह नीतीश के लिए आत्ममंथन करने का विषय है।












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