49 दिग्गजों ने PM मोदी को लिखा लेटर, बोले- बंद हो 'जय श्री राम' के नाम पर मॉब लिंचिंग

नई दिल्ली: देश के दिग्गजों ने मॉब लिंचिंग को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखी है। पीएम मोदी को लेटर लिखने वालों में अदूर गोपालकृष्णन, मणिरत्नम, अनुराग कश्यप और अपर्णा सेन, कोंकणा सेन शर्मा, सौमित्र चटर्जी जैसे कई फिल्म निर्देशक और अभिनेता शामिल हैं। इन लोगों ने देश में मॉब लिंचिंग घटनाओं को अपनी चिंता व्यक्त की है। इस लेटर में अलग-अलग क्षेत्र के 49 दिग्गजों के हस्ताक्षर हैं।

पीएम मोदी को 49 दिग्गजों ने लिखा लेटर

पीएम मोदी को 49 दिग्गजों ने लिखा लेटर

49 दिग्गजों ने पीएम मोदी को लिखे पत्र में खेद प्रकट करते हुए लिखा कि आज 'जय श्री राम' आज एक भड़काऊ युद्ध बन गया है, । इस पत्र में आगे लिखा गया है कि राम बहुसंख्यक समाज के लिए पवित्र है। राम का नाम लेना बंद कर दें। देश में लिंचिंग के मामलों पर मशहूर हस्तियों ने कहा है कि मुसलमानों, दलितों और और अल्पसंख्यकों की लिंचिंग को तुरंत रोका जाना चाहिए। हम एनसीआरबी के आंकड़े को जानकर हैरान हो गए कि साल 2016 में दलितों से अत्याचार के 840 मामले सामने आए हैं और दोषियों को सजा के मामले में कमी आई है।

'पीएम मोदी आलोचना काफी नही'

'पीएम मोदी आलोचना काफी नही'

पीएम मोदी को लिखे गए लेटर में विनायक सेन, सौमित्र चटर्जी, रेवती, श्याम बेनेगल, शुभा मुद्गल, रूपम इस्लाम, अनुपम रॉय, परमब्रता, रिद्धि सेन के नाम भी शामिल हैं। 23 जुलाई को लिखे इस लेटर में कहा गया कि प्रधानमंत्री जी आपने संसद में इस तरह की लिंचिंग की आलोचना कि लेकिन ये पर्याप्त नहीं है। वास्तव में अपराधियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई? अफसोस है कि 'जय श्री राम' एक भड़काऊ युद्ध बन गया है। आज ये कानून व्यवस्था के लिए समस्या बन गया है और कई लिंचिंग की घटनाएं इसके नाम पर हो रही हैं। इतिहासकार रामचंद्र गुहा, डॉक्टर और सामाजिक कार्यकर्ता विनायक सेन, विद्वान और समाजशास्त्री आशीष नंदी उन लोगों में से हैं जिन्होंने पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं।

'एंटी-नेशनल या अरबन नक्सल ना करें घोषित'

'एंटी-नेशनल या अरबन नक्सल ना करें घोषित'

पीएम को लिखे इस लेटर में लोकतंत्र में असहमति की जोरदार पैरवी की गई है। लेटर में इसे लेकर लिखा गया है कि असहमति के बिना कोई लोकतंत्र नहीं है। अगर कोई सरकार के खिलाफ राय देता है तो उसे 'एंटी-नेशनल' या 'अरबन नक्सल' घोषित नहीं कर दिया जाना चाहिए। सत्ताधारी पार्टी की आलोचना करने का मतलब देश की आलोचना करना नहीं है। कोई भी पार्टी जब सत्ता में आती है तो वो दल देश का प्रतीक नहीं बन जाता है। ये देश की कई पार्टियों में से मात्र एक पार्टी ही है। इसलिए सरकार की आलोचना या स्टैंड लेना देश विरोधी भावनाएं व्यक्त करने जैसा नहीं है।

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