सीएम फडणवीस के लिए उद्धव ने क्यों तोड़ी शिवसेना की 53 साल पुरानी परंपरा?

नई दिल्ली- बुधवार को शिवसेना अपना 53वां फाउंडेशन डे मना रही है। लेकिन, जश्न के इस मौके के लिए पार्टी ने अपनी रणनीति में जो बदलाव किया है, वह बहुत ही अनूठा है। बाल ठाकरे के जमाने से माना जाता रहा है कि शिवसेना अपनी निर्धारित परंपरा पर कायम रहने के प्रति बहुत ही संजीदा रहती है। यही नहीं वह पार्टी से जुड़े कार्यक्रमों में किसी बाहरी को बुलाने से भी बचती है। लेकिन, इसबार उसकी इस सोच में बड़ा बदलाव आया है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के लिए उसने अपनी नीतियों में बड़ा परिवर्तन किया है। शिवसेना ने अपने वार्षिक कार्यक्रम के लिए मुख्यमंत्री फडणवीस को बतौर चीफ गेस्ट बुलावा भेजा है। इसलिए सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर उद्धव ठाकरे की पार्टी के नजरिए में इतना बड़ा परिवर्तन क्यों आया है?

शिवसेना ने इसलिए तोड़ी अपनी परंपरा

शिवसेना ने इसलिए तोड़ी अपनी परंपरा

मोदी सरकार के पिछले पांच साल की सरकार में लगभग साढ़े चार साल तक शिवसेना ने सत्ता में रहकर भी विपक्ष के भी कान काटने का काम किया था। लेकिन, जब लोकसभा का चुनाव नजदीक आया तो जमीनी हालात को भांपकर बीजेपी-शिवसेना दोनों ने मिलकर चुनाव लड़ा और राज्य में विपक्षी पार्टियों को धूल चटाने में फिर से कामयाब रहे। शिवसेना के फाउंडेशन डे कार्यक्रम में देवेंद्र फडणवीस को बुलाने के पीछे भी आने वाले विधानसभा चुनाव को ही माना जा रहा है। हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक शिवसेना के एक नेता ने माना भी है कि, "सेना प्रमुख उद्धव ठाकरने ने फडणवीस को बुलावा भेजा है और इसके पीछे हमारे कैडर को ये सिगनल देना है कि यहां गठबंधन बरकार है, ताकि विधानसभा चुनाव साथ में लड़ने के लिए उनका मनोबल बढ़ाया जा सके।"

बार्गेनिंग पावर बढ़ाना चाहती है शिवसेना

बार्गेनिंग पावर बढ़ाना चाहती है शिवसेना

लोकसभा चुनाव के नतीजों से ये साफ हो गया है कि महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबंधन दोनों दलों के हित में है। 2014 के विधानसभा चुनाव में शिवसेना-बीजेपी का चुनाव पूर्व गठबंधन टूट गया था। चुनाव के बाद दोनों दलों ने फिर से साथ आकर सरकार बनाई थी। तब शिवसेना को ही ज्यादा नुकसान हुआ था और मुख्यमंत्री की कुर्सी बीजेपी के खाते में चली गई थी। शायद इसलिए इसबार उद्धव ठाकरे की ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतकर विधानसभा में अपनी दावेदारी मजबूत करने का इरादा है। बीजेपी के एक सीनियर नेता ने कहा है कि, "ठाकरे को पता है कि अगर विधानसभा चुनावों के बाद सेना को बीजेपी से मुकाबले के लिए बार्गेनिंग पावर चाहिए, तो उन्हें अपनी सीटें 63 से बढ़ानी होंगी। और सेना प्रमुख को यह पूरी तरह पता है कि राज्य में विपक्ष की जो हालत है, उसके चलते भगवा दल ही सत्ता में आएंगे, इसलिए पार्टी ने अपना ट्रैक बदल लिया है।" वैसे महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ मिलकर बिना ज्यादा विवाद के सरकार चलाने का श्रेय सीएम फडणवीस को जाता है, जिन्होंने उसके साथ अच्छे संबंध बनाए रखने की बहुत ही सफल कोशिश की है।

सीएम की कुर्सी पर शिवसेना की नजर

सीएम की कुर्सी पर शिवसेना की नजर

अब उद्धव ठाकरे मान चुके हैं कि बीजेपी के बगैर उनके लिए सत्ता का स्वाद चखना संभव नहीं लगता। इसलिए, एक तरफ उनकी पार्टी मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को अपनी पार्टी के मंच पर लाने के लिए अपनी परंपरा तोड़ रही है, तो दूसरी तरफ अभी से मुख्यमंत्री पद पर दावेदारी भी ठोक रही है। फाउंडेशन डे के अवसर पर पार्टी के मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में पार्टी की यह मंशा खुलकर जाहिर की गई है, लेकिन उसमें बीजेपी से गठबंधन की जरूरत भी बयां की गई है। इसके लिए पार्टी की ओर से पहले से ही दोनों दलों से ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री बनाने का फॉर्मूला भी उछाला जा रहा है। कुल मिलाकर पार्टी की रणनीति यही है कि वह विधानसभा में अपना कद और बढ़ा ले, ताकि बीजेपी पर चुनाव के बाद दबाव बनाने में उसे मदद मिल सके। यानी तभी वह सीएम की कुर्सी पर दावा कर सकती है। वैसे चर्चा है कि महाराष्ट्र की 288 विधानसभा सीटों में से दोनों पार्टियां 135-135 सीटों पर लड़ेंगी और बाकी सीटें दूसरे सहयोगी दलों के लिए छोड़ी जाएंगी। ये बात अलग है कि शिवसेना अपने लिए 144 सीटों की मांग कर रही है, लेकिन वह इसमें कितनी कामयाब होगी, यह देखने वाली बात है। लेकिन, इतना तो तय है कि 2014 के विधानसभा चुनाव के बाद से शिवसेना ने जो बीजेपी के खिलाफ जो तेवर अपनाए थे, वो कब के गायब हो चुके हैं।

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