ISRO के मिशन में फिल्टर चाय, मसाला डोसा भी अहम, पढ़िए Chandrayaan-3 प्रोजेक्ट की दिलचस्प स्टोरी

चंद्रयान को लेकर कड़ी मेहनत के दौरान साइंटिस्ट्स कैसे रिलैक्स होते और फिर अगले दिन की प्लानिंग करने पहले क्या करते थे। ये बात इसरो चीफ के हवाले से एक रिपोर्ट में कही गई है।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) एक के बाद दूसरी बड़ी उपलब्धि हासिल करने जा रहा है। आदित्य एल1 के सफल लॉन्च के साथ पहले चरण में सफलता मिल चुकी है। अब ये अंतरिक्षयान सूर्य और पृथ्वी के बीच लैंग्रेज प्वॉइंट की ओर आगे बढ़ रहा है। इस बीच इसरो ने अपने सफल मिशन चंद्रयान-3 को लेकर एक दिलचस्प स्टोरी शेयर की है। इसरो ने बताया है कि कैसे काम के दबाव के बीच चाय की चुस्की और मसाला डोसा के साथ मानसिक थकान मिटाई जाती थी।

भारतीय साइंटिस्ट्स को पसंद है सादगी
भारत ने चंद्रमा को छूकर इतिहास रच दिया है। ऐसे में इसरो के साइंटिस्ट्स के वो लम्हें याद किए जा रहे हैं, जब वे काम के दबाव को कम करने के लिए शाम के वक्त फिटर टी और मसाला डोसा का स्नेक्स लेते थे। दिलचस्प बात ये है कि चंद्रयान के असली हीरो इसरो के वैज्ञानिकों की इस वक्त दुनिया में प्रशंसा हो रही है। लेकिन वे कैसे अपनी जमीन से जुड़े हैं, इसको लेकर इसरो ने खुद एक पोस्ट किया है। जिसमें बताया गया कि भारतीय स्पेस एजेंसी के साइंटिस्ट शहरी या फिर पॉश इलाकों की आधुनिकता और दिखावे के मुकाबले कितनी सिंपल लाइफ पसंद करते हैं।

 Chandrayaan-3 Masala Dosa Tea Story

दबाव के बीच तनावमुक्त होने रास्ता
स्पेस मिशन चंद्रयान-3 प्रोजेक्ट पर इसरो के साइंटिट्स्ट को एक्ट्रा वर्क करना होता था। जबकि एजेंसी की ओर इसके लिए कोई प्रोत्साहन राशि भी नहीं मिलता। इसके बावजूद उन्होंने देश के लिए लगन से काम किया। वर्क के दबाव के बीच उन्होंने तनाव को कम करने का तरीका ढूंढ लिया, और वो था फिल्टर चाय की चुस्की, मसाला डोसा का नाश्ता, जो कि हर शाम होता था

शाम 5 बजे की फिल्टर चाय थी फिक्स
हाल ही में वाशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट में इसरो के पूर्व प्रमुख माधवन नायर के हवाले से कहा गया, "हम केवल जरूरी चीजों पर ही खर्च करते हैं। हमारे वैज्ञानिकों ने भारत या विदेश में किसी भी अन्य कंपनी के वैज्ञानिकों की तुलना में अधिक प्रयास किया है।" उन्होंने चंद्रयान-3 प्रोजेक्ट पर वर्क को लेकर आगे कहा, "हमने हर शाम 5 बजे मुफ्त मसाला डोसा और फिल्टर कॉफी ली। लंबे समय तक काम के दबाव को हल्का करने के लिए हर कोई इस छोटी की पार्टी में शामिल होता था।" वाशिंगटन पोस्ट के ओपिनियन लेख में आगे उल्लेख किया गया है कि भारत को सत्या नडेला जैसे उद्यमियों की तुलना में इसरो चीफ श्रीधर सोमनाथ जैसे नायकों की अधिक आवश्यकता है।

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