अमेठी पर कब्जा करने के लिए गांधी परिवार में हुई थी टूट, मेनका घर से निकाली गईं, अब ये सीट अहम क्यों नहीं रही?
राहुल गांधी ने अमेठी लोकसभा सीट छोड़कर रायबरेली से चुनाव लड़ने का निर्णय लिया है। उत्तर प्रदेश के अमेठी लोकसभा सीट पर 5 लोकसभा यानी 25 साल बाद गांधी परिवार का कोई भी सदस्य चुनाव में नहीं उतर रहा है। कांग्रेस ने इस बार किशोरी लाल शर्मा को मैदान में उतार दिया है।
बीजेपी कांग्रेस के इस फैसले को अमेठी से राहुल गांधी की 'हार का डर' बता रही है। वहीं, कांग्रेस इस फैसले को 'शतरंज की चाल' बता रही है। कांग्रेस का कहना है कि किशोरी लाल शर्मा कांग्रेस के 40 साल पुराने सिपाही हैं। ऐसे में बीजेपी उम्मीदवार स्मृति ईरानी को हराने के लिए वही काफी हैं।

वजह जो भी हो लेकिन गांधी परिवार के अमेठी छोड़ने की बात कईयों को अभी भी पच नहीं रही है। आपको बता दें कि अमेठी ही वो सीट है जिस पर 'कब्जा' करने के लिए गांधी परिवार टूट कर बिखर गया था। इंदिरा गांधी और मेनका गांधी के बीच इसी सीट के लिए जंग छिड़ गई थी लेकिन अब उसी अमेठी सीट पर गांधी परिवार का कोई भी शख्स चुनाव नहीं लड़ना चाहता।
संजय गांधी की मौत
23 जून 1980 वो तारीख थी जिस दिन संजय गांधी की मृत्यु हो गई थी। संजय गांधी का कांग्रेस की राजनीति में बड़ा स्थान था। कहा जाता है कि भले ही देश की पीएम इंदिरा गांधी थी मगर असल मायने में वो संजय थे जो अपनी मां की जगह अहम फैसले ले रहे थे। लेकिन संजय की मौत ने इंदिरा के लिए एक बड़ा राजनीतिक शून्य छोड़ दिया।
संजय आपातकाल के समय से इंदिरा गांधी के सबसे करीबी राजनीतिक सहयोगी थे। वह इंदिरा के चुने हुए राजनीतिक उत्तराधिकारी थे। लेकिन जून 1980 में एक हवाई दुर्घटना में उनकी मृत्यु के बाद इंदिरा की योजनाएँ गड़बड़ा गईं।
संजय गांधी की मौत के बाद अमेठी में चुनाव होना था। चूंकि अमेठी संजय गांधी की सीट थी, इसलिए उनकी पत्नी मेनका गांधी को अपने पति की सीट विरासत में मिलने की उम्मीद थी। हालाँकि, परिवार की मुखिया इंदिरा गांधी की योजनाएँ अलग थीं।
राजीव की राजनीति में एंट्री
साल 1981 में इंदिरा ने राजीव को अमेठी से चुनाव लड़ने के लिए चुना। राजीव जो कि राजनीति में आने के लिए अनिच्छुक थे और अपनी पायलट की नौकरी से खुश थे, संजय की विरासत संभालने अमेठी से उतरे।
संजय की विधवा पत्नी मेनका गांधी, जो उस समय शायद 25 साल की भी नहीं थीं, अपने पति की जगह राजीव को लेते हुए असहाय दिखीं। कहा जाता है कि 25 वर्ष से कम होने के कारण वह उस समय लोकसभा सीट के लिए चुनाव नहीं लड़ सकीं।
असुरक्षित महसूस करने लगी मेनका
1981 के उप-चुनाव में राजीव को अमेठी में जीत मिली। राजीव, मां इंदिरा की निगरानी में पार्टी को चलाने लगे इससे मेनका की राजनीतिक महत्वाकाक्षा को आघात पहुंचने लगा। इंदिरा और मेनका के बीच अनबन शुरू हो गई थी। ये अनबन तब चरम पर पहुंच गई जब एक मीटिंग में शामिल हो गईं।
मार्च 1982 में लखनऊ में संजय गांधी के कॉलेज के साथी और नेता अकबर अहमद ने एक सभा का आयोजन किया था। कहने को तो वो सभा संजय गांधी की याद में बुलाई गई थी मगर उसका अहम उद्देश्य शक्ति प्रदर्शन करना था। इसकी भनक इंदिरा गांधी को पहले से थी।
मेनका ने किया शक्ति प्रदर्शन
उन्होंने मेनका को इसमें न शामिल होने की हिदायत दी और लंदन दौरे के लिए रवाना हो गईं। इंदिरा की बात को अनसुना कर वह लखनऊ पहुंची और वहां ज़ोरदार भाषण दिया। उनके इस भाषण को सुन लोगों ने अनुमान लगाया कि वो राजनीति में उतरेंगी और अपने पति की विरासत को छीनेंगी।
इंदिरा गांधी नाराज
उनके इस बयान से इंदिरा गांधी नाराज हो गईं। उन्होंने मेनका को घर से निकाल दिया। इसके कुछ दिनों बाद मेनका ने अकबर अहमद के साथ राष्ट्रीय संजय मंच की स्थापना की। हालांकि राष्ट्रीय संजय मंच कामयाब नहीं हो पाया।
साल 1984 के लोकसभा चुनाव में राजीव गांधी के खिलाफ अमेठी से निर्दलीय चुनाव लड़ने उतर गईं। इस चुनाव में सोनिया ने पति के पक्ष में खूब चुनाव प्रचार किया। राजीव को 84% से अधिक वोट मिले। मेनिका बुरी तरह हार गईं। इसके बाद राजीव गांधी ने 1991 तक चार बार अमेठी निर्वाचन क्षेत्र से जीत हासिल की।
मेनका को मिली हार
इसके बाद साल 1999 में अमेठी से अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की। इसके बाद राहुल ने अपनी राजनीतिक करियर को बढाने के लिए इसी सीट को चुना और वह तब तक इस सीट से लड़ते रहे जब तक कि उन्हें स्मृति ईरानी से हार नहीं मिल गई।
मेनका गांधी संजय विचार मंच के फ्लॉप होने के बाद 1988 में जनता दल और 2004 में भाजपा में शामिल हो गईं, वह फिर से गांधी परिवार से मुकाबला करने के लिए कभी अमेठी नहीं लौटीं। मेनका के बेटे वरुण ने भी कभी अमेठी पर दावा नहीं किया। इसके बदले मेनका और वरुण ने अमेठी से दूर जाकर क्रमशः पीलीभीत और सुल्तानपुर जैसी सीटों पर ध्यान केंद्रित किया।
अमेठी से छूटा गांधी परिवार का मोह
कुछ दिन पहले तक यही समझा जा रहा था कि राहुल अमेठी से चुनाव लड़ेंगे मगर कांग्रेस ने प्लान बदल दिया। राहुल ने रायबरेली को चुन लिया। तब से ये प्रश्न उठ रहा है कि जिस अमेठी सीट के लिए गांधी परिवार में विभाजन हो गया आखिर उसे गांधी परिवार ने छोड़ कैसे दिया?
कुछ रिपोर्ट के मुताबिक इसकी वजह अमेठी और रायबरेली सीटों पर कांग्रेस द्वारा कराया आंतरिक सर्वे है। कांग्रेस के आंतरिक सर्वे में ये निष्कर्ष निकला कि अगर नेहरू-गांधी परिवार के किसी सदस्य को रायबरेली से उतारा जाता है तो उसकी जीत का चांस सौ फीसदी है वहीं, अमेठी में ये संभावना आधी ही है। कहा जा रहा है कि यही वो वजह थी जिसने राहुल को अमेठी से दूर जाने पर मजबूर किया।












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