काटजू ने बताया देश के 50 फीसदी जजों को भ्रष्ट
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने भारतीय न्याय प्रक्रिया पर बड़ा हमला बोला है। काटजू ने एक ब्लॉग लिखकर 50 फीसदी भारतीय जजों को भ्रष्ट करार दिया है। उन्होंने कहा है कि भारतीय न्याय प्रणाली में बड़ी खामी है जिसे ठीक किया जाना बहुत जरूरी है।

1971 तक भ्रष्टाचार नहीं था कोर्ट में
काटजू ने लिखा है कि जब उन्होंने 1971 में इलाहाबाद हाई कोर्ट से अपना कैरियर शुरु किया उस समय भारत की किसी भी कोर्ट में संभवत: भ्रष्टाचार नहीं था। लेकिन बाद में हाई कोर्ट में धीरे-धीरे भ्रष्टाचार बढ़ता गया। उन्होंने कहा कि 1994 में जस्टिस वेंकटचेलैया जोकि मुख्य न्यायाधीश के समय में बड़ी संख्या में न्यायाधीशों का भ्रष्टाचार के चलते तबादले किये गये थे।
J'accuseI sent this article to four leading English newspapers, but none of them had the courage to publish it, as...
Posted by Markandey Katju on Sunday, April 12, 2015
मैंने खुद इलाहाबाद हाई कोर्ट पर सवाल उठाया था
वहीं 2001 में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस भरूच ने कहा था कि 20 फीसदी हाई कोर्ट के जज भ्रष्ट हो सकते हैं। लेकिन मेरा मानना है कि मौजूदा समय में 50 फीसदी हाई कोर्ट के जज भ्रष्ट हैं। काटजू ने कहा कि 2011 के राजा खान बनाम सेंट्रल वक्फ बोर्ड के केस में मेरी खुद की बेंच जिसमें जस्टिस ग्यान सुधा मिश्रा भी शामिल थे को कहना पड़ा था कि इलाहाबाद हाई कोर्ट में कुछ गलत हो रहा है।
शांति भूषण के अपील को भी दबाया गया
काटजू ने कहा कि शांति भूषण जोकि सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील हैं और पूर्व में कानून मंत्री भी रह चुके हैं ने खुद सुप्रीम कोर्ट में एक एफीडिविट दाखिल किया था जिसमें उन्होंने कहा था कि पूर्व के 16 मुख्य न्यायाधीश भ्रष्ट थे। लेकिन मेरा मानना है कि उसके बाद से इस सूचि में और भी कई नाम जुड़ गये होंगे।
शांति भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस सीके प्रसाद के खिलाफ भ्रष्टाचार के चलते एफआईआर दाखिल करने की अपील की थी। लेकिन भारत की सुप्रीम कोर्ट ने इस भ्रष्टाचार के मुद्दे को दबा दिया था।
सुप्रीम कोर्ट के जज ने 1000 करोड़ का भ्रष्टाचार किया
काटजू ने कहा कि जस्टिस प्रसाद के खिलाफ मामला मेरे सामने भी आया था। जिसमें उनके खिलाफ 35 एकड़ जमीन जिसकी कीमत तकरीबन 1000 करोड़ रुपए थी को खरीदने का आरोप था। यह मामला 3 जजों की बेंच के पास था जिसमें से दो जजों ने इस मामले में महज कुछ मिनटों में अपनी मनमानी करते हुए जस्टिस प्रसाद के समर्थन में फैसला दिया था।
जजों के खिलाफ सबूतों को दबा दिया गया
वहीं इस मामले में दुष्यंत दवे ने सुप्रीम कोर्ट के बार काउंसिल एसोसिएशन में अपने जस्टिस प्रसाद के खिलाफ कई सबूत पेश किये थे। दवे ने अपने पत्र में लिखा था कि जस्टिस प्रसाद के द्वारा बनी बेंच जमीन के मामले की इतनी जल्दी सुनवाई करने के लिए क्यों आतुर थी। उन्होंने लिखा था कि अप्राकृतिक जल्दबाजी कई सवाल उठाती है। उन्होंने साथ ही अपने पत्र में लिखा था कि इस मामले को बिना बहस के ही पूरा कर लिया गया था।
क्या न्याय प्रक्रिया में भ्रष्टाचार को उजागर नहीं करना चाहिए
काटजू ने कहा कि मेरे अनुसार प्रथम दृष्टया यह भ्रष्टाचार का मामला था और जस्टिस प्रसाद के खिलाफ एफआईआर होनी चाहिए थी। ऐसे में शांति भूषण की इस मामले में एफआईआर दर्ज करने की अपील बिल्कुल जायज थी। वहीं जब मैंने तीन जजों के भ्रष्टाचार की बात कही थी तो सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधी जस्टिस लोढ़ा ने कहा था कि कुछ लोग भारत की न्याय प्रक्रिया को बदनाम करना चाहते हैं। ऐसे में मेरा सवाल है कि क्या भ्रष्टाचार को लोगों के सामने नहीं लाना चाहिए।












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