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विधानसभा चुनाव 2022: डिजिटल चुनाव प्रचार में बीजेपी से पीछे क्यों हैं कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल?

फ़रवरी महीने में उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में चुनाव होने जा रहे हैं. वहीं दूसरी ओर देश में कोरोना महामारी की तीसरी लहर के बीच पांच राज्यों में हो रहे इन विधानसभा चुनाव के प्रचार में सोशल मीडिया के इस्तेमाल में ख़ासी तेज़ी देखी जा रही है.

मतदान 10 फ़रवरी से शुरू हो गया है.

देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में 7 चरण में मतदान होना है. आख़िरी चरण की वोटिंग वहां 7 मार्च को होगी.

इसे देखते हुए कई पार्टियों ने तो दिसंबर से ही चुनाव प्रचार शुरू कर दिया था. लेकिन जनवरी में जब मतदान की तारीख़ों का एलान किया गया, तब भारत के चुनाव आयोग ने कोरोना संक्रमण का हाल देखते हुए परंपरागत रैलियों या रोड शो आयोजित करने पर प्रतिबंध लगा दिया.

चुनाव आयोग ने बाद में ये प्रतिबंध 11 फ़रवरी तक बढ़ा दिए. हालांकि राजनीतिक दलों को अब कई तरह की ढील दी गई है. मसलन, अब खुली जगह पर 1,000 लोगों के साथ रैली की जा सकती है. वहीं 20 लोगों के साथ घर-घर जाने की अनुमति भी दे दी गई है.

ऐसे हालात में इन राज्यों में अपनी पार्टी का प्रचार करके लोगों तक पहुंचने के लिए राजनीतिक दलों ने इंटरनेट के ज़रिए सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफ़ॉर्म्स का सहारा लिया है. इसलिए प्रचार अभियान चलाने के लिए फ़ेसबुक, व्हाट्सऐप, ट्विटर और इंस्टाग्राम का जमकर उपयोग हो रहा है.

निर्वाचन आयोग
Getty Images
निर्वाचन आयोग

डिजिटल कैंपेन पर परंपरागत प्रचार वाले नियम लागू

राजनीतिक पार्टियां सोशल मीडिया के ज़रिए मतदाताओं को लुभाने के विभिन्न तरीक़ों का इस्तेमाल कर रही हैं. मतदाताओं तक अपनी पार्टी की विचारधारा पहुंचाने के लिए कई दल लुभावने गीतों का सहारा ले रहे हैं. वे इन गीतों को फ़ेसबुक और यूट्यूब पर डाल रहे हैं.

कई राजनीतिक दलों ने हर सीट के लिए अलग अलग व्हाट्सएप ग्रुप बनाए हैं, जहां लगातार चुनावी मुहिम और उससे संबंधित प्रचार सामग्री शेयर की जा रही है.

अंग्रेज़ी दैनिक द हिंदू की एक रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग ने साफ़ तौर पर कह दिया है कि इंटरनेट पर चलने वाले वर्चुअल चुनावी अभियानों के नियम क़ायदों और ख़र्चों पर वही नियम लागू होंगे, जो पारंपरिक चुनाव अभियान पर लागू होते हैं.

इस रिपोर्ट में चुनाव आयोग के एक शीर्ष अधिकारी के हवाले से बताया गया कि उम्मीदवारों को इसके लिए एक बैंक खाता खोलना होगा और आयोग के पास ख़र्चों का ब्योरा जमा कराना होगा.

साथ ही, लोगों को भड़काने वाले भाषण और सरकारी तंत्र के दुरुपयोग पर प्रतिबंध लगाने वाली आदर्श आचार संहिता अब सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के मामले में भी लागू होगी.

क्या कहते हैं आंकड़े?

सोशल मीडिया अब संवाद के लिए ज़रूरी साधन के रूप में उभरा है. इसने राजनीतिक लामबंदी के नए तरीक़े ईज़ाद किए हैं. पिछले एक दशक में सोशल मीडिया पर राजनीतिक दलों की सक्रियता में भारी उछाल दर्ज़ किया गया है.

2013-14 में भारतीय जनता पार्टी ने सोशल मीडिया को एक राजनीतिक उपकरण के तौर पर अपनाना शुरू किया. उसके बाद से सोशल मीडिया पर उसकी ताक़त लगातार बढ़ती ही गई है. इंस्टाग्राम पर इस समय बीजेपी के 42 लाख फ़ॉलोअर्स हैं. वहीं यूट्यूब पर 40.1 लाख, फ़ेसबुक पर 1.67 करोड़ और ट्विटर पर 1.73 करोड़ फ़ॉलोअर्स हैं.

बीजेपी की तुलना में, विपक्षी पार्टी कांग्रेस के इंस्टाग्राम पर 10 लाख, ट्विटर पर 84 लाख, यूट्यूब पर 17.7 लाख और फ़ेसबुक पर 62 लाख फ़ॉलोअर्स हैं.

हिंदी न्यूज़ चैनल रिपब्लिक भारत की एक रिपोर्ट बताती है कि जिन पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, वहां पार्टी के सोशल मीडिया कैंपेन चलाने की ज़िम्मेदारी केंद्रीय सूचना और प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री राजीव चंद्रशेखर को सौंपी गयी है.

वहीं अंग्रेज़ी समाचार वेबसाइट एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के अनुसार, बीजेपी मानती है कि वर्चुअल मीडियम पर उसकी ताक़त की असली वजह आईटी वॉलेंटियर्स की "विशाल सेना" है. इस रिपोर्ट में बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि पार्टी के पास क़रीब 14 लाख एक्टिव रजिस्टर्ड स्वयंसेवक हैं.

वहीं कांग्रेस पार्टी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर बीजेपी से काफ़ी पीछे है.

हालांकि, कांग्रेस के सोशल मीडिया प्रमुख रोहन गुप्ता ने अंग्रेज़ी न्यूज़ चैनल इंडिया टुडे को दिए एक साक्षात्कार में कहा, "पार्टी ने डिजिटली अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए एक व्यापक योजना बनाई है. हमने वर्चुअल रैली करने का एक खाका तैयार किया है. हमारे पास फ़ोन नंबरों का एक डेटाबेस है, जबकि पार्टी के ज़मीनी कार्यकर्ताओं की पहचान की जा चुकी है.''

पंजाब और गोवा में जी जान लगाकर चुनाव लड़ रही आम आदमी पार्टी ने सोशल मीडिया पर "एक मौक़ा केजरीवाल को" नाम से 25 जनवरी को अपने अभियान की शुरुआत की है.

हिंदी समाचार चैनल आज तक के अनुसार, पार्टी ने दिल्ली के लोगों से अपील की है कि वे दिल्ली सरकार के किए "अच्छे कामों" के बारे में सोशल मीडिया पर अभियान चलाएं.

चैनल के अनुसार, पार्टी प्रमुख और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने कहा, "ट्विटर, इंस्टाग्राम, फ़ेसबुक पर आप लोगों को बताइए कि हमारी सरकार से आपको कैसे लाभ मिला. साथ ही लोगों से केजरीवाल को मौका देने की अपील करें.''

इस समय ट्विटर पर आम आदमी पार्टी के 58 लाख, यूट्यूब पर 23 लाख, इंस्टाग्राम पर 6.30 लाख और फ़ेसबुक पर 52 लाख फ़ॉलोअर्स हैं.

ट्विटर का वॉयस ट्वीट फीचर
AFP
ट्विटर का वॉयस ट्वीट फीचर

कंटेंट वायरल कर लोगों तक पहुंचने की कोशिश

अधिक से अधिक वोटरों तक पहुंचने और युवा मतदाताओं को अपनी पार्टी की ओर खींचने के लिए तमाम राजनीतिक दल सोशल मीडिया पर वायरल ट्रेंड के रूप में कंटेंट को फैला रहे हैं.

उत्तर प्रदेश में बीजेपी के चुनावी अभियान का आगाज़ पीएम मोदी ने 31 दिसंबर को वर्चुअल रैली के ज़रिए किया था. पार्टी ने इसके लिए वहां के स्थानीय लोगों के बीच उस वर्चुअल रैली के लिंक को शेयर किया. साथ ही विभिन्न चुनावी क्षेत्रों में स्टूडियो भी स्थापित किए ताकि छोटे छोटे समूह पीएम का संबोधन सुन सकें.

हिंदी न्यूज़ चैनल एबीपी न्यूज के अनुसार, कांग्रेस पार्टी की महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने फ़ेसबुक पर 30 मिनट की लाइव चैट के ज़रिए उत्तर प्रदेश में अपनी पार्टी के वर्चुअल कैंपेन की शुरुआत की थी.

अंग्रेज़ी वेबसाइट द वायर की एक रिपोर्ट के अनुसार, किसान संगठन और छात्र समूह भी अपनी अपनी मांगों को उठाने के लिए हैशटैग, मीम्स और स्पूफ़ का सहारा ले रहे हैं. किसान समूह क़रीब साल भर तक चले अपने विरोध प्रदर्शनों को ख़त्म करने के लिए किए गए वादे पूरा करने में हो रही देरी का मसला उठा रहे हैं. वहीं छात्र समूह बीजेपी सरकार के रोज़गार देने में विफल रहने की समस्या दर्ज़ करवा रहे हैं.

पंजाब में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच इन दिनों सोशल मीडिया पर जमकर मुक़ाबला हो रहा है. फ़ेसबुक और ट्विटर पर हिंदी गाने पर बना एक वीडियो वायरल हो रहा है.

इस वीडियो में, आम आदमी पार्टी के सीएम प्रत्याशी भगवंत मान, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू और मौजूदा सीएम चरणजीत सिंह चन्नी को दिखाया गया है. फ़ेसबुक पर इस वीडियो को क़रीब 10 लाख बार देखा जा चुका है.

आर्थिक ताक़त से बीजेपी को बढ़त

उत्तर प्रदेश के नोएडा की एक डिजिटल मीडिया कंपनी के शीर्ष अधिकारी ने इंडिया टुडे वेबसाइट को दिए इंटरव्यू में बताया कि डिजिटल मीडियम ज़रूरी नहीं कि सबको समान मौक़ा मुहैया कराए.

उन्होंने कहा, "इंटरनेट के चलते अब सबके पास समान मौक़ा है. लेकिन पैसा इसमें अहम हो जाता है. इसलिए जिसके पास अधिक पैसा होता है, उसका अभियान बेहतर हो जाता है."

इस मामले में बीजेपी काफ़ी मजबूत है, ​लिहाज़ा दूसरे दलों पर वो बढ़त बनाती हुई दिख रही है.

पिछले साल मार्च में चुनावी सुधार पर काम करने वाली संस्था एसोसिएशन ऑफ़ डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स (ADR) ने बताया कि 2,700 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति के साथ बीजेपी सबसे अमीर राजनीतिक दल है. वहीं 929 करोड़ रुपये के साथ कांग्रेस का स्थान दूसरा रहा.

हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2019 के लोकसभा चुनाव के वक़्त डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर प्रसारित होने वाले राजनीतिक विज्ञापनों के मामले में बीजेपी ने सबको पीछे छोड़ दिया.

गूगल और फ़ेसबुक के आंकड़ों के अनुसार, फ़रवरी 2019 से अप्रैल 2019 के दौरान बीजेपी ने फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम, गूगल और यूट्यूब पर 25 करोड़ रुपये के विज्ञापन दिए. उसकी तुलना में कांग्रेस ने उन्हीं दोनों प्लेटफ़ॉर्म पर कुल 1.42 करोड़ रुपये के विज्ञापन प्रसारित करवाए.

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