Droupadi Murmu:राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाने से BJP को गुजरात समेत इन 14 राज्यों में हो सकता है फायदा
नई दिल्ली, 22 जून: इसबार का राष्ट्रपति चुनाव भाजपा के लिए एक बार फिर से ट्रंप कार्ड साबित हो सकता है। इसकी वजह ये है कि देश की पहली आदिवासी और दूसरी महिला को राष्ट्रपति भवन तक पहुंचाने की रणनीति बनाकर उसने पहले से ही हथियार डालते दिख रहे विपक्ष को चुनाव की शुरुआत में ही भौंचक्का कर दिया है। बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए ने झारखंड की पूर्व राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी घोषित किया है, जिसके लिए 18 जुलाई को वोटिंग होगी। भाजपा ने मुर्मू के नाम की घोषणा मास्टरस्ट्रोक के तौर पर उसी दिन की, जब साझा विपक्ष को अपने तीन-तीन संभावित उम्मीदवारों- शरद पवार, फारूक अब्दुल्ला और गोपाल कृष्ण गांधी के पहले ही मैदान छोड़कर भागने के बाद पूर्व भाजपा नेता और पीएम मोदी के कट्टर आलोचक यशवंत सिन्हा को मजबूरन चुनना पड़ा। विपक्ष को भले ही इस काम के लिए काफी माथापच्ची करनी पड़ी हो और फिर भी आखिरी बचे हुए विकल्प पर दांव लगानी पड़ी हो, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी सरकार का होमवर्क पुख्ता दिख रहा है। क्योंकि,यह सिर्फ राष्ट्रपति चुनाव की बात नहीं है, इससे भाजपा आने वाले कई चुनावों को साधना चाहती है।

द्रौपदी मुर्मू साबित हो सकती हैं भाजपा की ट्रंप कार्ड
द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाए जाने की घोषणा के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्विटर के जरिए उन्हें दिए शुभकामना संदेश में जो कुछ कहा, उससे काफी कुछ स्पष्ट हो जाता है। पीएम मोदी ने ट्विटर पर लिखा, 'श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी ने अपना जीवन समाज की सेवा और गरीबों, दलितों के साथ-साथ हाशिए के लोगों को सशक्त बनाने के लिए समर्पित किया है। उनके पास समृद्ध प्रशासनिक अनुभव है और उनका कार्यकाल उत्कृष्ट रहा है। मुझे पूरा विश्वास है कि वह हमारे राष्ट्र की एक महान राष्ट्रपति होंगी।' पीएम मोदी की इन शुभकामनाओं के बाद मुर्मू की पहली प्रतिक्रिया कुछ इस तरह की थी, 'हमें यह समाचार (राष्ट्रपति उम्मीदवार चुने जाने पर) आप लोगों (मीडिया) से ही मिला है। मैं अभी इसपर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहती हूं। बहुत-बहुत धन्यवाद।' यानी खुद मुर्मू को भी अंदाजा नहीं था कि पीएम मोदी की सरकार ने उनके लिए क्या कुछ सोच रखा है।

भाजपा के लिए द्रौपदी मुर्मू की उम्मीदवारी क्यों महत्वपूर्ण है ?
1958 में जन्मीं 64 साल की द्रौपदी मुर्मू ओडिशा की आदिवासी समुदाय की नेता हैं। वह ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल में प्रभावशाली अनुसूचित जनजाति संथाल समाज से आती हैं। चुनाव जीतने पर वह ओडिशा से आने वाली पहली राष्ट्रपति तो होंगी ही, पहली आदिवासी भी होंगी, जो देश के सर्वोच्च पद पर आसीन होंगी। इससे पहले भाजपा उन्हें झारखंड की पहली महिला और आदिवासी राज्यपाल भी बना चुकी है। ओडिशा में वह बीजेपी की बड़ी शख्सियत रह चुकी हैं और पूर्व में बीजेडी-बीजेपी गठबंधन सरकार में कैबिनेट मंत्री की जिम्मेदारी भी संभाल चुकी हैं। यही वजह है कि उनके नाम की घोषणा को ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने अपने प्रदेश का गौरव बताया है। उनकी बातों से साफ है कि घोषणा से पहले पीएम मोदी ने सीएम को भी भरोसे में ले लिया था।
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झारखंड की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण
2019 में भाजपा झारखंड में कांग्रेस, आरजेडी और झारखंड मुक्ति मोर्चा के महागठबंधन से हार गई थी। शिबू सोरेन और उनके बेटे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन आदिवासियों की राजनीति करके ही झारखंड में सत्ता शिखर तक पहुंचते रहे हैं। लेकिन, इस समय केंद्र में विपक्ष में होने के नाते जेएमएम के सामने मुर्मू की उम्मीदवारी की घोषणा से चुनौती बढ़ गई है। विपक्ष के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा झारखंड के हजारीबाग लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। जबकि, द्रौपदी मुर्मू प्रदेश की पांच साल तक राज्यपाल रह चुकी हैं और उनका राज्य सरकार के साथ अच्छा संबंध रहा था। अब अगर जेएमएम विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस के दबाव में सिन्हा के साथ जाती है, तो भविष्य में उसके सामने आदिवासी महिला उम्मीदवार को नजरअंदाज करने के आरोप लग सकते हैं, जो कि उसकी राजनीति की धुरी रही है। इसके ठीक उलट भाजपा प्रदेश के आदिवासी समुदाय में अपनी स्थिति और मजबूत करने की कोशिश कर सकती है। 2017 में मुर्मू की छवि सशक्त आदिवासी नेता के रूप में तब उभरी थी, जब उन्होंने तत्कालीन बीजेपी सरकार की ओर से लाए जा रहे भूमि काश्तकारी अधिनियम को उन्होंने लौटा दिया था। झारखंड में आदिवासी इसका विरोध कर रहे थे। बदले समय में उनका यह प्रशासनिक फैसला इस वर्ग में बीजेपी के हक में काम कर सकता है।

भाजपा को 14 राज्यों में हो सकता है फायदा
द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाना भाजपा की लंबी-अवधि की राजनीतिक योजना का हिस्सा हो सकता है। सबसे पहले गुजरात को ही लेते हैं, जहां आदिवासियों की आबादी करीब 14% है। गुजरात में इसी साल के अंत में चुनाव होने हैं। गुजरात के डांग जिले में तो आदिवासी समुदाय बहुतायत में हैं। लेकिन,सिर्फ गुजरात ही नहीं। भाजपा को इस कदम से कुल 14 राज्यों में आने वाले चुनावों में लाभ मिल सकता है, जहां आदिवासियों की जनसंख्या ज्यादा है। वैसे देश में आदिवासियों की आबादी 8.6% है, लेकिन कई राज्यों में यह चुनाव का परिणाम अपने हिसाब से पलटने का दम रखते हैं।

आदिवासियों के प्रभाव वाले 14 राज्य
- गुजरात: 14.8%
- छत्तीसगढ़: 30.6%
- झारखंड: 26.2%
- ओडिशा: 22.8%
- मध्य प्रदेश: 21.1%
- राजस्थान: 13.5%
- जम्मू और कश्मीर: 11.9%
- मिजोरम: 94.4%
- नागालैंड: 86.5%
- मेघालय: 86.1%
- अरुणाचल प्रदेश: 68.8%
- मणिपुर: 35.1%
- सिक्किम: 33.8%
- त्रिपुरा: 31.8%
ये वो राज्य हैं, जहां बीजेपी को अपने फैसले का लाभ मिल सकता है। इनमें से गुजरात, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में अगले दो साल में चुनाव होने हैं। उसके बाद लोकसभा चुनाव की भी बारी है। जब, 2017 में बीजेपी ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को बिहार के राजभवन से उठाकर प्रत्याशी बनाया था, तब उनका दलित होना और यूपी से कनेक्शन पार्टी के लिए काफी फायदेमंद साबित हुआ था।












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