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34,000 बच्चों की फ्री सर्जरी कर उनके चेहरे पर मुस्कान बिखेर चुके हैं डॉ. सुबोध, कभी पढ़ाई के लिए बेचे थे चश्मे

इस मतलबी दुनिया में जहां हर शख्स अपना उल्लू सीधा करने के लिए और केवल पैसों के पीछे भाग रहा है, वहीं कुछ शख्स ऐसे भी हैं जो तन-मन-धन से समाज सेवा में लगे हुए हैं। उन्हीं में से एक हैं प्लास्टिक सर्जन डॉ. सुबोध कुमार सिंह।

नई दिल्ली, 9 नवंबर। इस मतलबी दुनिया में जहां हर शख्स अपना उल्लू सीधा करने के लिए और केवल पैसों के पीछे भाग रहा है, वहीं कुछ शख्स ऐसे भी हैं जो तन-मन-धन से समाज सेवा में लगे हुए हैं। उन्हीं में से एक हैं प्लास्टिक सर्जन डॉ. सुबोध कुमार सिंह। सुबोध एक-दो नहीं बल्कि 34,000 बच्चों की सर्जरी कर चुके हैं और वो भी बिल्कुल मुफ्त। ऐसा कर वह न सिर्फ बच्चों के चेहरों पर मुस्कान बिखेर रहे हैं बल्कि समाज के लिए एक मिशाल भी कायम कर रहे हैं। आज भले ही सुबोध एक जाने-माने प्लास्टिक सर्जन बन चुके हैं, लेकिन यहां तक पहुंचने के लिए सुबोध ने कई बाधाओं को पार किया।

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    बचपन से ही संघर्षों से भरा रहा सुवोध का जीवन

    बचपन से ही संघर्षों से भरा रहा सुवोध का जीवन

    सुबोध एक मेधावी छात्र थे, लेकिन परिवार की माली हालत ठीक नहीं थी। साल 1979 में अपनी पढ़ाई के साथ-साथ परिवार की मदद करने के लिए सुबोध ने चश्मे और साबुन बेचे। लेकिन आज सुबोध एक प्रतिष्ठित प्लास्टिक सर्जन बन चुके हैं।

    37,000 सर्जरी कर मुफ्त में मुस्कान बिखेर रहे सुबोध

    37,000 सर्जरी कर मुफ्त में मुस्कान बिखेर रहे सुबोध

    सुबोध होंठ और तालु की सर्जरी करते हैं। स्माइल ट्रेन इंडिया संगठन से जुड़कर सुबोध अब तक 37,000 मुफ्त फांक-तालु सर्जरी कर 25,000 परिवारों के जीवन में मुस्कान वापस ला चुके हैं। फांक तालु की समस्या जन्म के समय कई बच्चों में देखने को मिलती है। यह आनुवांशिक भी हो सकती है। इस समस्या में बच्चे को बोलने और खाना खाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। गरीबों के लिए डॉ. सिंह की सेवा ने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई। साल 2009 में उन्हें अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया जबकि साल 2013 में उन्हें विंबलडन पुरुष एकल के फाइनल मैच में कोर्ट पर सम्मानित किया गया।

    मुझे भगवान ने समाज सेवा के लिए बनाया है व्यापार के लिए नहीं

    मुझे भगवान ने समाज सेवा के लिए बनाया है व्यापार के लिए नहीं

    सुबोध कहते हैं कि समय पर इलाज न मिलने के चलते फरवरी 1979 में ही उनके सिर से पिता का साया उठ गया था। वह कहते हैं कि जब भी कोई बच्चा इलाज के लिए मेरे पास आता है तो मुझे उसमें 13 साल का सुबोध दिखाई देता है। सुबोध कहते हैं कि मुझे लगता है कि भगवान ने मुझे लोगों की सेवा करने के लिए प्लास्टिक सर्जन बनाया है, व्यापार करने के लिए नहीं।

    साल 2002 से कर रहे गरीब बच्चों का फ्री इलाज

    साल 2002 से कर रहे गरीब बच्चों का फ्री इलाज

    साल 2002 में अपने पिता की पुण्यतिथि पर सुबोध ने फ्री इलाज सप्ताह की शुरुआत की। 2003-04 में उन्होंने स्माइल ट्रेन प्रोजेक्ट (विश्व स्तर पर सबसे बड़ा क्लेफ्ट सर्जरी-केंद्रित संगठन) से जुड़कर तालु की सर्जरी करना शुरू कर दिया। सुबोध कहते हैं कि इस संगठन के साथ जुड़कर वह हर साल 4000 से ज्यादा तालु की सर्जरी फ्री करते हैं। सुबोध कहते हैं कि आज उनके साथ दुनियाभर के कई सामाजिक कार्यकर्ता, पोषण विशेषज्ञ, स्पीच थेरेपिस्ट जुड़ चुके हैं। डॉ. सुबोध ने कटे-फटे तालु और होंठ के बच्चों की खोज और उन तक पहुंचने के लिए एक कार्यक्रम भी तैयार किया है। सुबोध और उनकी टीम ने गंभीर रूप से जले हुए रोगियों के जीवन को फिर से सक्रिय करने के लिए 6,000 मुफ्त व्यापक बर्न सर्जरी भी की हैं।

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