Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

योगी सरकार को क्या सबसे ज़्यादा ख़तरा पत्रकारों से ही है?

पवन जायसवाल
PAWAN JAISWAL
पवन जायसवाल

"उत्तर प्रदेश में पत्रकारों के ख़िलाफ़ जिस तरह से प्रशासन धड़ाधड़ मुक़दमे दर्ज करा रहा है उससे तो यही लगता है कि प्रशासन और सरकार को सबसे ज़्यादा ख़तरा पत्रकारों से ही है और आने वाले दिनों में राज्य की जेलों में शायद सिर्फ़ पत्रकार ही दिखें."

हाल के दिनों में पत्रकारों पर दर्ज हो रहे मुक़दमों और उनकी हो रही गिरफ़्तारी के सिलसिले में एक पत्रकार मित्र की यह टिप्पणी थी.

मिर्ज़ापुर में मिड डे मील में कथित धांधली की ख़बर दिखाने वाले पत्रकार के ख़िलाफ़ दर्ज मुक़दमे का मामला अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि बिजनौर में फ़र्ज़ी ख़बर दिखाने का आरोप लगाकर पांच पत्रकारों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करा दी गई.

वहीं आज़मगढ़ में एक पत्रकार की ख़बरों से परेशान प्रशासन ने उन पर धन उगाही का आरोप लगाकर एफ़आईआर दर्ज कराई और फिर गिरफ़्तार कर लिया.

नोएडा में पिछले दिनों कुछ पत्रकारों को गिरफ़्तार करके उनके ख़िलाफ़ गैंगस्टर ऐक्ट लगाने का मामला भी ज़्यादा पुराना नहीं है.

बिजनौर में जिन पत्रकारों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया है उन लोगों ने उस ख़बर को रिपोर्ट किया था, जिसमें एक गांव में वाल्मीकि परिवार के लोगों को सार्वजनिक नल से पानी भरने के लिए रोका गया था.

ये भी पढ़ें: स्कूल में बच्चों को नमक-रोटी देने का मामला, पत्रकार पर मुक़दमा

मीडिया
Getty Images
मीडिया

पत्रकारों के उत्पीड़न के मामले में यूपी नंबर-1

वाल्मीकि परिवार के लोगों ने पलायन के मक़सद से अपने घरों के बाहर 'मकान बिकाऊ है' लिख दिया था. बिजनौर के कुछ पत्रकार इस ख़बर को कवर करने गए लेकिन प्रशासन का आरोप है कि ऐसा ख़ुद इन पत्रकारों ने किया.

मामले में अभियुक्त बनाए गए एक पत्रकार ने मीडिया से बातचीत में कहा कि इस ख़बर पर जब प्रशासन की किरकिरी होने लगी तो उसने हम लोगों पर फ़र्ज़ी मुक़दमों में एफ़आईआर लिखा दी.

वहीं पुलिस का कहना है कि इस मुद्दे को पुलिस, ग्राम प्रधान और संबंधित पक्षों की मदद से सुलझा लिया गया था लेकिन पत्रकारों ने प्रशासन की छवि ख़राब करने के मक़सद से मकान बिकाऊ है जैसी बात ख़ुद लिख दी.

प्रशासन की इस कार्रवाई का बिजनौर के पत्रकारों ने विरोध किया, राज्य के दूसरे हिस्सों में भी विरोध प्रदर्शन हुए मुक़दमा वापस लेने की मांग की गई.

बीबीसी से बातचीत में बिजनौर के ज़िलाधिकारी रमाकांत पांडेय ने कहा कि जो होना था हो गया लेकिन पत्रकारों के ख़िलाफ़ अब आगे कोई कार्रवाई नहीं होगी.

दरअसल, पत्रकारों के उत्पीड़न की ख़बरें आए दिन आती रहती हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो आनी एनसीआरबी की मानें तो देश में पत्रकारों के साथ हिंसा और उन पर हमलों के मामले में उत्तर प्रदेश पहले नंबर पर है.

पिछले पांच-छह साल में पत्रकारों के ख़िलाफ़ हिंसा के क़रीब सत्तर मामले दर्ज हो चुके हैं. हिंसा में की पत्रकारों की मौत भी हो चुकी है.

ये भी पढ़ें: महिला पत्रकार और जंग का मैदान - "नामुमकिन है!"

मीडिया
Getty Images
मीडिया

सरकार को प्रचंड बहुमत का अहंकार?

स्थानीय स्तर पर खनन और अपराध जैसे मामलों में रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को कथित तौर पर माफ़िया के हमलों का शिकार तो बनना ही पड़ता है लेकिन जब छोटी-मोटी बातों में प्रशासन की भी नज़रें टेढ़ी होने लगें तो ये मामला बेहद गंभीर हो जाता है और पत्रकारों के सामने स्वतंत्र पत्रकारिता के अलावा सुरक्षा का सवाल भी खड़ा हो जाता है.

अहम सवाल ये भी है कि क्या ख़बर लिखने के आरोप में पत्रकारों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर और गिरफ़्तारी जैसी कार्रवाई होनी चाहिए, वो भी इसलिए कि इससे सरकार की छवि ख़राब हो रही है?

लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार और इंडियन फ़ेडरेशन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट के राष्ट्रीय अध्यक्ष के विक्रम राव कहते हैं, "पत्रकार का काम ऐसा है कि किसी न किसी पक्ष को पीड़ा पहुंचेगी ही. लेकिन सरकार अपनी आलोचना न सुन सके, ये स्थिति बेहद गंभीर है. हो सकता है कि इसके पीछे सरकार का प्रचंड बहुमत का अहंकार हो लेकिन ये लोकतांत्रिक मूल्यों को कितना नुक़सान पहुंचा रहा है, इसका अंदाज़ा शायद सरकार में बैठे लोगों को नहीं है."

राव कहते हैं कि प्रशासनिक स्तर पर ऐसी कार्रवाइयों का सिर्फ़ एक मक़सद है- पत्रकारों को डराना.

उनके मुताबिक़, "स्थानीय स्तर पर अधिकारी सोचते हैं कि यदि दो चार पत्रकारों के ख़िलाफ़ ऐसे केस दर्ज करा देंगे और डरा-धमका देंगे तो बाक़ी अपने आप चुप हो जाएंगे. लेकिन ऐसा करने से पहले वो ये भूल जाते हैं कि दुनिया उनके दर से आगे भी है. ऐसे दुस्साहसिक अधिकारियों के ख़िलाफ़ शासन स्तर से भी कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए जो कि नहीं हो रही है."

ये भी पढ़ें:किस कोने में पत्रकारों की हत्या सबसे ज़्यादा होती है?

मीडिया
Getty Images
मीडिया

एफ़आइआर, गिरफ़्तारी और उत्पीड़न

इससे पहले मिर्ज़ापुर में मिड डे मील में कथित अनियमितता की ख़बर दिखाने वाले पत्रकार के ख़िलाफ़ प्रशासन ने एफ़आईआर दर्ज करा दी थी.

हालांकि अनियमितता की बात ख़ुद प्रशासन के आला अधिकारियों ने भी स्वीकारी थी और कुछ लोगों को इस मामले में निलंबित भी किया गया लेकिन मिर्ज़ापुर के डीएम अनुराग पटेल ने पत्रकार पर एफ़आईआर की ऐसी वजह बताई कि लोग हैरान रह गए.

उनका कहना था कि पत्रकार के ख़िलाफ़ एफ़आईआर इसलिए कराई गई क्योंकि 'प्रिंट का पत्रकार वीडियो कैसे बना सकता है'.

पत्रकार आम जन तक तमाम ख़बरें पहुंचाते ज़रूर हैं लेकिन वो किसी भी ख़बर के प्राथमिक सूत्र यानी प्राइमरी सोर्स नहीं होते हैं. ख़बरें किसी न किसी सूत्र की मदद से ही उन तक पहुंचती है.

हालांकि लोगों को ऐसा लगता है कि पत्रकार ही उसका प्राथमिक सूत्र है. दूसरे, पत्रकार और उनकी ख़बरें हर समय सही ही हों, ये कोई ज़रूरी नहीं है और पत्रकारों को इस संदर्भ में कोई विशेषाधिकार प्राप्त हो, ऐसा भी नहीं है.

अगर उनकी ख़बरों या रिपोर्टों में कोई तथ्यात्मक त्रुटि है, उससे किसी को ठेस पहुंच रही है या फिर किसी को कोई आपत्ति है तो उसकी शिकायत के लिए अलग फ़ोरम बने हुए हैं, न कि सीधे एफ़आईआर और उसके बाद गिरफ़्तारी.

ये भी पढ़ें:पत्रकार को मिल रहीं बलात्कार और हत्या की धमकियां

मिड डे मिल
PAWAN JAISWAL
मिड डे मिल

सुप्रीम कोर्ट क्या कहता है?

वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र कहते हैं, "पत्रकार ने ख़बर लिखी और किसी को आपत्ति है तो उसके लिए फ़ोरम बने हैं. आप संपादक से शिकायत कर सकते हैं, प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया में जा सकते हैं, यहां तक कि कोर्ट में भी जा सकते हैं. लेकिन ये थोड़ी न है कि आप उसके साथ अपराधी की तरह पेश आएंगे, एफ़आईआर कर देंगे और फिर गिरफ़्तार कर लेंगे. इससे साफ़ पता चलता है कि आलोचना सुनने की सहनशक्ति आप में नहीं है और आप प्रतिशोध की भावना से काम कर रहे हैं."

पिछले साल मानहानि संबंधी मामले की सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने टिप्पणी की थी कि प्रेस के बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी पूरी होनी चाहिए और कुछ ग़लत रिपोर्टिंग होने पर मीडिया को मानहानि के लिए नहीं पकड़ा जाना चाहिए.

ये टिप्पणी प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानवलकर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने एक पत्रकार और मीडिया हाउस के ख़िलाफ़ मानहानि की शिकायत संबंधी एक याचिका की सुनवाई के दौरान की थी.

वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई और नेटवर्क 18 के संस्थापक और पूर्व प्रबंध निदेशक राघव बहल के ख़िलाफ़ बिहार के पूर्व मंत्री परवीन अमानुल्लाह की बेटी रहमत फ़ातिमा अमानुल्लाह ने मानहानि का मुक़दमा दायर किया था.

अदालत ने कहा था, "लोकतंत्र में सहनशीलता सीखनी चाहिए. किसी कथित घोटाले की रिपोर्टिंग करते समय उत्साह में कुछ ग़लती हो सकती है. परंतु हमें प्रेस को पूरी तरह से बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी देनी चाहिए."

ये भी पढ़ें: बुलेट और पत्थरों के बीच कश्मीर में रिपोर्टिंग कितनी मुश्किल

मीडिया
Getty Images
मीडिया

सरकार की 'छवि खराब करना' अपराध?

उत्तर प्रदेश में पत्रकारों के ख़िलाफ़ प्रशासन की इन कार्रवाइयों पर जगह-जगह विरोध प्रदर्शन भी हो रहे हैं और पत्रकार सड़कों पर भी उतर रहे हैं लेकिन आश्चर्य की बात ये है कि कई पत्रकार संगठनों के सक्रिय होने के बावजूद राजधानी लखनऊ में अब तक इसके ख़िलाफ़ कोई सड़क पर नहीं उतरा.

के विक्रम राव कहते हैं, "जब तक पत्रकार अपने निजी स्वार्थों के दायरे से बाहर नहीं आएंगे, वो पत्रकारों के हितों की लड़ाई लड़ी ही नहीं सकते हैं."

वहीं राज्य सरकार के आला अधिकारी इस मुद्दे पर आधिकारिक रूप से कुछ भी कहने से बच रहे हैं लेकिन एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि यदि आरोप में सच्चाई पाई जाती है तो मुक़दमा ज़रूर होना चाहिए, इसमें कोई बुराई नहीं है.

उनके मुताबिक, पत्रकार कोई अलग नहीं हैं, वो भी आम आदमी हैं. यह सही भी है कि पत्रकार ख़ास नहीं बल्कि आम लोग ही हैं, लेकिन सवाल ये भी है कि क्या सरकार की छवि ख़राब करने वाली रिपोर्ट अपराध की श्रेणी में आती है ?

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+