दिल्ली चुनाव से तय होगा राष्ट्रीय रुझान

Delhi polls seen as national trend-setter
नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजधानी अभी पूर्ण राज्य नहीं है और इसमें केवल 70 विधानसभा सीटें हैं, इसके बावजूद यहां के चुनाव को राष्ट्रीय स्तर पर रुझान तय करने वाला माना जा रहा है। यहां का चनाव पहले भी कई बार लोकसभा चुनाव में मतदाताओं के रुझान का सूचक बन चुका है।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पिछले 15 वर्षो से यहां की सत्ता पर काबिज होने का पूरा प्रयास कर रही है। पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में चुनाव प्रचार का नेतृत्व किया और महानगर में पांच रैलियों को संबोधित किया। पार्टी के अनुसार, पिछले 10 दिनों में विभिन्न नेताओं ने 230 जनसभाएं आयोजित की हैं।

लोकसभा चुनाव इस विधानसभा चुनाव के केवल छह माह बाद ही होने वाला है और भाजपा के कई नेता दिल्ली से चुनाव लड़ने के इच्छुक हैं। पार्टी इस बार कोई मौका छोड़ना नहीं चाहती, क्योंकि पार्टी ने 1993 के बाद से दिल्ली विधानसभा चुनाव में सफलता का स्वाद नहीं चखा है।

मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस लगातार तीन बार दिल्ली में सरकार बना चुकी है। अब वह चौथी बार जीत के लिए आशान्वित हैं। पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी दिल्ली में रैलियों को संबोधित किया। लेकिन इसके बावजूद 75 वर्षीया मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ही दिल्ली में कांग्रेस की प्रमुख प्रचारक के तौर पर उभरीं।

दिल्ली में कांग्रेस के लिए जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि सर्वेक्षणों के अनुसार राजस्थान और मध्य प्रदेश में भाजपा आगे है और छत्तीसगढ़ में कड़ा मुकाबला है। इसलिए दिल्ली में जीत कांग्रेस के लिए सांत्वना की बात हो सकती है।

इस बार एक नया दल आम आदमी पार्टी (आप) ने जमीनी स्तर पर प्रचार कर एक लहर पैदा कर दी है। इसके नेता अरविंद केजरीवाल ने भ्रष्टाचार और आम आदमी के सवालों को उठाकर राजनीति के मुख्य केंद्र में ला दिया है। आप ने दिल्ली के चुनाव को पहली बार त्रिकोणीय बना दिया है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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