दिल्ली चुनाव: जनसंघ के जन्मस्थान पर भाजपा की 5वीं हार
नई दिल्ली (विवेक शुक्ला)। जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के गढ़ यानी दिल्ली में पार्टी लगातार पांचवीं बार विधानसभा में कब्जा करने में नाकामयाब रही। जनसंघ का जन्म रघुमल आर्य कन्या स्कूल में हुआ था। इसी दिल्ली में जनसंघ से लेकर भाजपा के दौर के शिखर नेता अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी ने दशकों अपनी राजनीति की। आज आडवाणी और अटल को जरूर दु:ख हो रहा होगा।
और यह भी देखिए कि उसी शहर में भाजपा आज लगातार पांचवी बार विधानसभा में सरकार बनाने में नाकामयाब हुई। दिल्लीमें भाजपा बुरी तरह से मात खा रही है। भाजपा दिल्ली में 1998 से विधानसभा चुनाव हार रही है।
जनता आप के साथ
हालांकि भाजपा को को दिल्ली में बीते विधानसभा चुनाव में सर्वाधिक सीटें मिलीं थीं, पर जनता आप के साथ ही थी। कायदे से दिल्ली चुनावों का विजेता तो आप ही रही थी। जो दल बमुशिकल से दो-ढाई एक साल पहले खड़ा हुआ हो,उसका अपने लिए स्पेस बनाना साबित करता है कि जनता की चाहत है किसी नए दल और नेताओं के हक में खड़ा होने की। शर्त सिर्फ ये है कि उऩमें कुछ बात होनी चाहिए।
वादों से बात नहीं बनेगी
एक बात भाजपा के स्टार प्रचारक और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और दूसरे नेताओं को समझनी होगी कि सिर्फ वादे करने से बात नहीं बनेगी। उन्हें अमली जामा भी पहनाना होगा। ओबामा के गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने से आम इंसान के मसले हल नहीं होंगे। उसका पेट नहीं भरेगा। दिल्ली में भाजपा की निश्चित हार नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार के लिए खतरे की घंटी साबित होगी। अब उसे अपने वादों को निभाने के दिशा में ठोस पहल करनी होगी।
वैकल्पिक राजनीति
बेशक,आप ने देश को वैकल्पिक राजनीति के संबंध में सोचने के लिए मजबूर किया। वैकल्पिक राजनीति पर लंबे समय से बात हो रही है, लेकिन कोई ठोस पहल सामने नहीं आ रही थी। पर अब लगता है कि वैकल्पिक राजनीति का झंडा आम आदमी पार्टी ने उठा लिया है। उसे जिस तरह से जनता ने हाथो-हाथ लिया उसे स्पष्ट है कि जनता कुछ नया चाहती थी।
अरविन्द केजरीवाल ने हर आरोप और गलतियों, दोषों, झूठों को उभारने पर उनका भोलेपन से जवाब देकर प्रतिद्वंद्वी पार्टियों को पानी पिला दिया। आप के विपरीत भाजपा की रणनीति कई लिहाज से परिपक्व पार्टी की नहीं थी। पहले चले मोदी के साथ का नारा और समूची दिल्ली में होर्डिंग, पोस्टर, बैनर। चुनाव की तिथि घोषित होने के बाद किरण बेदी आईं और मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार हो गईं। किरण बेदी का आना आप के लिए ज्यादा अनुकूल था। उनको अवसरवादी से लेकर बहुत कुछ कहा गया और भाजपा को उनकी रक्षा करनी पड़ी।
धूल में मिली कांग्रेस
कांग्रेस इस चुनाव में धूल में मिल गई। जो पार्टी एक साल पहले तक इधर राज कर रही थी, वह कहीं नहीं थी। जिस समाज में घूस और भ्रष्टाचार को स्वीकार कर लिया गया हो, वहां पर आप ने इन दोनों समाज को कोढ़ों के खिलाफ ईमानदारी से लड़ाई लड़ी। आप ने वैकल्पिक राजनीति की बात करने वाले लोगों को एक उम्मीद दिखाई।
हालांकि आम आदमी पार्टी के नाम से लगता है कि ये आम इंसान के हक में ही काम करना चाहती है या उसके बीच में अपना स्पेस बनाना चाहती है। पर हकीकत ये है कि उसे राजधानी में समाज के हरेक वर्ग का साथ मिला।
आप को नई दिल्ली जैसी एलिट क्षेत्र से लेकर पूर्वी दिल्ली और राजधानी के बाहरी दिल्ली के इलाकों मेहनतकश और नौजवानों ने जमकर वोट दिए। निर्विवाद रूप से केजरीवाल और उनके साथियों ने आम आदमी की बात की, इसी ने उन्हें महत्वपूर्ण बनाया है। आम ने जनता की निराशा और कुठाओं को प्रतिबिम्बित किया। आप ने व्यापक भ्रष्टाचार के खिलाफ गुस्से को आवाज दी। उसने विचारहीन नीतियों के खिलाफ माहौल बनाया।
उम्दा प्रदर्शन
पर, दिल्ली में आप का पहले और फिऱ दूसरेचुनाव में जिस तरह का उम्दा प्रदर्शन रहा, उससे साफ है कि आप अपनी नई इबारत गढ़ने की कोशिश में सफल रही।
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