दिल्ली विधानसभा चुनाव: केजरीवाल के मुकाबले भाजपा क्यों नहीं बता पा रही सीएम का चेहरा?
नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली में विधानसभा चुनाव की तारीख का सोमवार को ऐलान कर दिया गया। दिल्ली की सभी 70 विधानसभा सीटों पर 8 फरवरी को चुनाव होंगे और 11 फरवरी को नतीजे आएंगे। 2014 के मुकाबले राजधानी की चुनावी रुख इस बार बदला हुआ है। राजधानी का चुनाव दो पार्टियों बीजेपी और आम आदमी पार्टी के बीच लड़ा जा रहा है। जहां आप केजरीवाल के चहरे और पांच साल के विकास कार्यों पर वोट मांग रही है। वहीं बीजेपी के आगे सबसे बड़ी दुविधा सीएम चेहरे को लेकर चल रही है। करीब 21 सालों से दिल्ली की सत्ता से बाहर बीजेपी, विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर फिलहाल असमंजस में है। किस चेहरे के दम पर वह चुनाव में उतरे जो सभी को मान्य हो और वह जनता के बीच अच्छी छवि हो।
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दिल्ली में तीन इंजन की सरकार का नारा
सीएम चेहरे को लेकर जब दिल्ली के प्रभारी प्रकाश जावडेकर से पूछा गया तो वे इस पर गोलमोल जवाब देते दिखे। उन्होंने कहा कि, दिल्ली की जनता ही केजरीवाल के खिलाफ उनका मुख्यमंत्री का चेहरा है। दिल्ली बीजेपी का मानना है कि, मोदी जी की छवि और विकास सब पर भारी है। इसलिए बीजेपी तीन इंजन की सरकार (नरेंद्र मोदी+बीजेपी का सीएम+एमसीडी) की बात कहती सुनी जा सकती है। यही नहीं दिल्ली प्रभारी बनाए गए प्रकाश जावड़ेकर ने भी माना है कि अभी पार्टी ने इस बारे में कोई फैसला नहीं किया है।

प्रवेश वर्मा- केवल बाहरी दिल्ली इलाके तक ही सीमित
सूत्रों के अनुसार, पार्टी चुनाव के दौरान अंदरूनी मनमुटाव से बचने के लिए सीएम चेहरे की घोषणा करने से बच रही है। पार्टी में एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है, जिसका मानना है कि किसी चेहरे की बजाय सामूहिक नेतृत्व में पार्टी चुनाव लड़ती है तो उसे दिल्ली में फायदा होगा। पार्टी में मुख्यमंत्री के चेहरे पर सुगबुगाहट तब शुरू हुई जब एक के बाद एक दो कार्यक्रमों में खुद अमित शाह ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को बीजेपी सांसद प्रवेश वर्मा से बहस की चुनौती दे डाली। इसके बाद ही यह माना जाने लगा कि वर्मा को कोई बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है। प्रवेश वर्मा पार्टी की नजर में केजरीवाल से टक्कर लेने में सक्षम लेकिन केवल बाहरी दिल्ली इलाके तक ही सीमित हैं। पार्टी के कई धड़े उनके खिलाफ हैं। आम चुनाव के कुछ ही दिन बाद मीडिया में खबरें आयी थीं कि आरएसएस के कुछ पदाधिकारी भी मनोज तिवारी के कामकाज से खफा हैं। MCD चुनावों के लिए जब उम्मीदवारों की सूची तैयार की जा रही थी तब भी कुछ वाकये ऐसे हुए थे जो पार्टी आलाकमान को भी नागवार गुजरी थी। प्रवेश वर्मा पश्चिमी दिल्ली से दो बार सांसद बन चुके हैं। पहली बार वे 2014 में सांसद बने और दूसरी बार 2019 में इसी सीट पर जीत दर्ज कर चुके हैं। पार्टी का युवा चेहरा होने के साथ ही प्रवेश दिवंगत बीजेपी नेता और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह के बेटे हैं।

मनोज तिवारी- प्रदेश अध्यक्ष, बाहरी का टैग, पार्टी के अंदर ही मंजूर नहीं
दिल्ली बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी को दिल्ली के सीएम पद का दावेदार बनाने को लेकर बीजेपी पसोपेश में है।इसी का नतीजा है कि बीजेपी के दिल्ली सहप्रभारी और केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने एक कार्यक्रम में मनोज तिवारी को सीएम चेहरे के तौर पर प्रोजेक्ट किया, लेकिन कुछ ही देर में पलट गए। दिल्ली की सारी राजनीति पंजाबी-वैश्य समुदायों के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है। मनोज तिवारी आज भी पूर्वांचलियों के नेता के रूप में जाने जाते हैं। बीजेपी में एक बड़ा वर्ग उन्हें स्वीकार नहीं करता। हालांकि मनोज तिवारी पीएम मोदी और शाह दोनों के क़रीबी हैं लेकिन सीएम के रूप में उन्हें प्रोजेक्ट करने से बीजेपी की गुटबाज़ी निश्चित रूप से बढ़ेगी।

विजय गोयल- पूरी दिल्ली के नेता नहीं, सर्व स्वीकार्य नहीं
तीसरा बड़ा नाम हैं पूर्व केंद्रीय मंत्री विजय गोयल। लेकिन गोयल और मनोज तिवारी के मतभेद छिपे हुए नहीं हैं। विजय गोयल 2003 के विधानसभा चुनाव के बाद से ही मुख्यमंत्री पद पर नजर लगाए बैठे हैं लेकिन उन्हें एक बार भी मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट नहीं किया गया। गोयल को जोड़तोड़ में माहिर माना जाता है। पार्टी में बहुत से लोग कहते हैं कि अगर 2013 की स्थिति में विजय गोयल मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार होते तो चार विधायक तोड़ लाते और किसी न किसी तरह सरकार बना लेते। तब डॉ. हर्षवर्धन ने नतीजे आते ही सरकार बनाने से इनकार कर दिया था। इसलिए अगर विजय गोयल को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट किया जाता है तो केजरीवाल एंड पार्टी के लिए उन्हें निशाने पर लेना ज्यादा आसान होगा। गोयल पूरी दिल्ली के नेता नहीं है और ना ही वह दिल्ली के सभी धड़ों में स्वीकार्य हैं।

विजेंद्र गुप्ता- पूर्व प्रदेश अध्यक्ष, मास अपील नहीं
चौथे दावेदार के रूप में विजेंद्र गुप्ता का नाम लिया जा सकता है। गुप्ता दिल्ली बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं। लेकिन उनके मास लीडर के तौर पर पार्टी के भीतर नहीं देखा जाता है। विजेंद्र गुप्ता पिछले पांच साल से बीजेपी के सिर्फ़ 3-4 सदस्यों के विधायक दल के नेता हैं लेकिन उनकी वरिष्ठता उनके इस दावे को साबित नहीं करती कि अगर हारने पर वह विपक्ष के नेता हैं तो फिर जीतने पर भी उन्हें ही नेता बनाया जाना चाहिए।












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