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Dandi March:गांधीजी समेत सभी 79 आंदोलनकारियों के पास उस दिन सबसे जरूरी सामान क्या था ?

अहमदाबाद: कभी-कभी सोचकर हैरानी होती है कि कैसे 384 किलोमीटर की एक पदयात्रा ने अंग्रेजी हुकूमत की जड़ें खोदने की शुरुआत कर दी। गांधीजी ने तो सिर्फ यह कहा था कि भारतीय नमक पर गलत टैक्स का भुगतान क्यों करें? वह कोई गैर-वाजिब टैक्स का भुगतान नहीं करेंगे, बल्कि वो अपना नमक खुद बनाएंगे और उसे बेचेंगे। एक तरह से वह इस सोच के साथ जनता में आत्मनिर्भर भारत की भावना का भी बीज डाल रहे थे। नमक सत्याग्रह का परिणाम क्या हुआ, किस तरह से सविनय अवज्ञा आंदोलन ने अंग्रेजों के खिलाफ आखिरी अभियान की शुरुआत कर दी थी, इसपर तो काफी बातें हो चुकी हैं। लेकिन, यह जानना भी दिलचस्प है कि उस दिन पदयात्रा शुरू होने से ठीक पहले और नमक कानून तोड़ने तक बापू का मंत्र क्या था? साबरमती आश्रम का माहौल कैसा था? माही नदी कैसे पार किया। शुरू में इस अभियान में शामिल हो रहे लोगों ने क्या तैयारियां की थीं?

अंग्रेजों को यकीन ही नहीं था कि गांधीजी इतनी दूर पैदल चल पाएंगे

अंग्रेजों को यकीन ही नहीं था कि गांधीजी इतनी दूर पैदल चल पाएंगे

तब महात्मा गांधी सीनियर सिटीजन के दायरे में आ चुके थे। उनकी उम्र 61 साल की हो चुकी थी, लेकिन वह फिर भी सबसे तेज चलते थे। बापू के साथ कदम मिलाने के लिए बाकियों को दौड़ना पड़ जाता था। मजे की बात ये है कि जब अंग्रेजों को गांधीजी ने नमक कानून तोड़ने की खुली चुनौती दे रखी थी तो उन्होंने उन्हें रोकने की कोशिश क्यों नहीं की? तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन ने कहा था, 'ओह.....मिस्टर गांधी कभी उतनी दूर तक नहीं जा सकेंगे। वह दांडी पहुंचने से बहुत पहले ही गिर पड़ेंगे। ' मतलब, अंग्रेज तबतक इसी गुमान में थे कि बापू का आइडिया हवा में उड़ जाएगा। सिर्फ अंग्रेज ही नहीं थे। बहुत सारे भारतीयों को भी उनके फैसले पर हंसी आ रही थी। लेकिन, उन्होंने किसी की बातों की परवाह नहीं की और वो और उनके साथ चले 78 लोग आगे बढ़ते चले गए। अनुशासन उनके जीवन के मूल आधार में से एक था। उन्होंने हर दिन की योजना पहले से तैयार कर ली थी। हर दिन सुबह जल्द से जल्द निकल जाते और कुछ ही जगहों पर थोड़ी देर के लिए ठहरते थे। हर दिन रात में कहां ठहरना है, यह पहले से तय किया होता था। रोजाना करीब 16 किलोमीटर चलते गए।

सत्याग्रहियों को सबसे पहले देखने वाले खुद को विजेता समझते थे

सत्याग्रहियों को सबसे पहले देखने वाले खुद को विजेता समझते थे

ये सत्याग्रही जहां से निकलते थे, वहीं उनकी एक झलक देखने के लिए बच्चे-बूढ़े-जवानों का हुजूम पहले से ही उमड़ पड़ता था। गांधीजी की एक झलक पाने के लिए लोग पेड़ों पर पहले से ही स्थान लिए रहते थे। प्रतियोगिता इस बात की होती थी कि आंदोलनकारियों को अपने गांव-मोहल्ले-शहर-कस्बे की ओर आते हुए पहले कौन देखता है। जिसकी नजर सबसे पहले पड़ गई, वह खुद को विजेता समझता था। सत्याग्रहियों का स्वागत फूल-मालाओं से होता था। गांव के गांव पहले से सजकर तैयार होते थे। जहां भी गांधीजी और उनके साथी सत्याग्रही विश्राम के लिए ठहरते थे, बापू का उन सबको सख्त निर्देश होता था, कोई भी गंदगी नहीं रहनी चाहिए। खुद महात्मा जरा भी समय खाली बैठकर नहीं बिता थे। या तो कोई चिट्ठी ही लिख लते थे या फिर कुछ दूसरा काम कर लेते थे। उनमें इस अवस्था में भी गजब की एनर्जी थी।

'जाओ और अपने साथ स्वराज्य लेकर ही लौटना'

'जाओ और अपने साथ स्वराज्य लेकर ही लौटना'

उनका करिश्मा गजब का था। एक जगह पर गांधीजी ने लोगों से अपील की थी कि 'सरकारी नौकरियां (अंग्रेजों की नौकरियां) छोड़ दें।' उनकी एक आवाज पर 300 युवा अधिकारियों ने अपनी जौब एक झटके में छोड़ दी थी। देघम गांव की बात है। 105 साल की एक बुजुर्ग महिला बहुत ही बेसब्री से उनके आने का इंतजार कर रही थी। जैसे ही बापू पहुंचे वो उनके सामने गई और झुक गई। उसने तुरंत ही उनके माथे पर बड़ा सा ला तिलक लगाया और बोली- 'जाओ और अपने साथ स्वराज्य लेकर ही लौटना'। इस मार्च को उस जमाने में भी जबर्दस्त मीडिया कवरेज मिल रहा था। हर दिन की खबरें भारत के कोने-कोने में ही नहीं, दुनियाभर में पहुंच रही थीं। रास्ते में सत्याग्रहियों का जोरदार स्वागत हो रहा था तो कई तरह की परेशानियां भी झेलनी पड़ रही थी। मसलन, जब करीब आंदोलनकारी आधे रास्ते पहुंचेंगे होंगे तो एक दिन उनके सामने माही नदी पार करने की चुनौती आ गई। उन्होंने देखा की नदी की गहराई बहुत ही ज्यादा है। सूरज तेजी से ढलने लगा था। गांधीजी सबको नदी की दूसरी जगह पर लेकर पहुंचे, जहां सतह थोड़ा उथला था। लेकिन, तब तक रात के 10 बज चुके थे। पानी कम था,लेकिन अंधेरे की वजह से सत्याग्रही घुटने भर पानी में भी फिसल रहे थे। करीब ढाई घंटे लग गए, लेकिन सबको नदी पार करा दिया।

हाथ में मुट्ठीभर नमक उठाकर कानून तोड़ा

हाथ में मुट्ठीभर नमक उठाकर कानून तोड़ा

बापू का हौसला साथ था तो 5 अप्रैल को नमक यात्रा के 25वें दिन सत्याग्राही दांडी तक पहुंच ही गए। लेकिन, तब तक रात हो चुकी थी। अगले दिन सबरे-सबरे स्नान और प्रार्थना करने के बाद गांधीजी अरब सागर तक गए। वह नीचे उतरे और हाथ से मुट्ठीभर नमक उठा लिया। वहां जुटे सत्याग्रही और बाकी लोगों ने जोर का नारा लगाया- 'महात्मा गांधी की जय'- 'वंदे मातरम'! बापू ने अंग्रेजी हुकूमत का बनाया नमक कानून तोड़ दिया था। यह खबर पूरी दुनिया में जंगल की आग की तरह फैल चुकी थी।

सभी सत्याग्रहियों ने अपने साथ एक साथ खास 'झोला' रखा था

सभी सत्याग्रहियों ने अपने साथ एक साथ खास 'झोला' रखा था

12 मार्च, 1930 को अहमदाबाद के साबरमती आश्रम से यात्रा निकलने से पहले, सभी सत्याग्रही सुबह-सुबह उठ गए थे। सबने यात्रा शुरू करने से पहले स्नान और ध्यान किया, प्रार्थना की और गांधीजी के नजदीक इकट्ठे हो गए। बापू ने थोड़ी देर तक सबसे बातें की, आंदोलन का महत्त्व फिर से समझाया। फिर सबके साथ आश्रम से अपनी लक्ष्य की ओर निकल पड़े थे। इस दौरान बापू और उनके सभी सहयोगियों ने अपने साथ एक चीज अनिवार्य रूप से रख ली थी। सबके पास एक खास 'झोला' था, जिसमें उन्होंने इस कठिन यात्रा के लिए अपने और अपने साथियों के लिए जरूरी चीजें रखी थी। (साभार- संध्या राव की किताब 'दि स्टोरी ऑफ दांडी मार्ड' से)

इसे भी पढ़ें- 'हम आज भी कहते हैं कि देश का नमक खाया है...', PM मोदी ने 'आजादी का अमृत महोत्सव' लॉन्चिंग पर क्या-क्या कहा?

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