संसद में कांग्रेस ने मोदी सरकार का समर्थन किया, जानिए क्या है मामला ?

नई दिल्ली- विधानसभा अध्यक्षों की ओर से दलबदल के मामलों में फैसले को लटकाकर रखने के विषय पर सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी को लेकर कांग्रेस सरकार के समर्थन में उतर आई है। गुरुवार को एस सांसद ने यह मामला राज्यसभा में उठाया तो सरकार की ओर से दलील दी गई कि सर्वोच्च अदालत को विधायिका का कार्य विधायिक पर ही छोड़ देना चाहिए, क्योंकि संविधान ने सभी संवैधानिक संस्थाओं के अधिकारों का बखूबी बंटवारा कर रखा है। इसपर कांग्रेस के नेता ने भी पूरी तरह से सरकार की बातों का समर्थन किया और कहा कि किसी भी संवैधानिक संस्था को दूसरे संवैधानिक संस्था के अधिकार क्षेत्र में दखल देने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

सरकार के समर्थन में उतरी कांग्रेस

सरकार के समर्थन में उतरी कांग्रेस

संसद में डीएमके के एक सांसद पी विल्सन की ओर से उठाए गए एक मुद्दे पर कांग्रेस सरकार के समर्थन में कूद पड़ी। मामला कुछ विधानसभा अध्यक्षों के विधायकों के अयोग्य ठहराने के लिए अनावश्यक समय लिए जाने को लेकर था। विल्सन ने मणिपुर विधानसभा अध्यक्ष का मामला उठाया था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में वहां के स्पीकर को निर्देश दिया था कि विधायकों की अयोग्यता पर चार हफ्तों के अंदर फैसला लें। इसपर राज्यसभा में कांग्रेस के नेता आनंद शर्मा कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद के सुर में सुर मिलाते देखे गए। दरअसल, डीएमके ने एक तमिलनाडु विधानसभा के अध्यक्ष के पास भी मार्च 2017 में भी एक ऐसी याचिका दाखिल की थी, जिसमें एआईएडीएमके के 11 विधायकों को अयोग्य घोषित करने की मांग की गई थी। क्योंकि उन्होंने विश्वास मत के दौरान अपनी ही सरकार के खिलाफ वोट डाला था। जबकि, वहां के स्पीकर ने अभी तक उस याचिका पर फैसला नहीं लिया है, जबकि विधानसभा का कार्यकाल महज एक साल से कुछ ज्यादा बचा है। राज्यसभा में डीएमके सांसद ने जो फैसला लेने में विधानसभा अध्यक्षों की ओर से की जाने वाली देरी की बात कही उसपर राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू ने कानून मंत्री से कहा कि सरकार को इस मामले को उचित जगह पर उठाना चाहिए। नायडू ने कहा, "यह बहुत ही महत्वपूर्ण मामला है। यहां तक कि इसपर अदालत ने भी टिप्पणी की है, लेकिन हर कोई वक्त ले रहा है। पीठासीन अधिकारी वक्त लेते हैं, अदालत भी समय लेती है।"

विधायिका के अधिकार के मुद्दे पर मिला साथ

विधायिका के अधिकार के मुद्दे पर मिला साथ

सभापति की बातों पर रविशंकर प्रसाद ने जो कुछ कहा वह प्रमुख रूप से जनवरी में मणिपुर से संबंधित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की संबंधित बेंच की टिप्पणी पर ही केंद्रित दिखी। रविशंकर ने कहा, "माननीय सुप्रीम कोर्ट का पूरा सम्मान करते हुए, मैं यह जरूर कहूंगा कि पीठानसीन अधिकारियों के लिए व्यापक टिप्पणियों को निश्चित तौर पर टाला जा सकता था। हमें देश की सभी संस्थाओं का आदर करने की जरूरत है। संवैधानिक प्रक्रिया में विधायिका के पीठासीन पदाधिकारी भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। मैं इस बात को रिकॉर्ड पर रखना चाहूंगा। " कानून मंत्री के इस बयान का समर्थन करने के लिए फौरन कांग्रेस नेता आनंद शर्मा उठे और कहा, "इस मामले पर मैं माननीय कानून मंत्री की बातों से सहमत हूं। यह बहुत ही गंभीर मामला है। यह एक अतिक्रमण है। संविधान इन मामलों में और अधिकारों के बंटवारे को लेकर पूरी तरह से स्पष्ट है। "

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा है ?

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा है ?

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने दलबदल कानून के मामले में अयोग्यता से संबंधित याचिकाओं पर फैसला लेने के लिए संसद से कहा है कि एक स्वतंत्र ट्रिब्यूनल का गठन करने पर विचार के। पिछले 21 जनवरी के सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस आरएफ नरीमन की अगुवाई वाली बेंच ने कहा था कि, स्पीकर भी किसी न किसी पार्टी का होता है। ऐसे में क्या वह विधायकों को अयोग्य ठहराए जाने की याचिका पर फैसला ले सकता है? इस पर संसद विचार करे। तब जस्टिस आरएफ नरीमन की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा था कि लोकसभा या विधानसभा अध्यक्षों को सदस्यों और खासकर दलबदल वालों के मामलों पर अधिकतम तीन महीने में फैसला करना चाहिए।

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