चुनावी किस्साः जब दो चुनाव हारकर पहली बार विधायक बने नीतीश, फिर नहीं लड़ा विधानसभा चुनाव
नई दिल्ली। दो दिन पहले आरजेडी नेता और महागठबंधन के सीएम उम्मीदवार तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) को चुनाव लड़ने का चैलेंज दे दिया था। चैलेंज भी ऐसी ही किसी जगह से नहीं बल्कि सीएम को उनके गृह नगर नालंदा से ही लड़ने की चुनौती दी। तेजस्वी ने कहा कि अगर सीएम नीतीश कुमार में दम है तो वह मैदान में आएं और अपने जिले की किसी सीट से चुनाव लड़ लें। मैं वहां भी उन्हें हरा दूंगा। दरअसल नीतीश ने 16 साल से सीधे किसी चुनाव में हिस्सा नहीं लिया है। तेजस्वी यादव उसी सवाल को फिर से उठाना चाह रहे थे जो सीएम नीतीश के विरोधी उन पर लगाते रहे हैं। विरोधियों का कहना है कि सीएम नीतीश दरअसल हार के डर से चुनाव नहीं लड़ते। ऐसे में आइए हम आपको वो किस्सा सुनाते हैं जब नीतीश ने पहला चुनाव जीता था। साथ ही ये भी बताएंगे कि उन्होंने कब चुनाव लड़ना छोड़ दिया।

छात्र राजनीति से हुई शुरुआत
नीतीश ने राजनीति की शुरुआत पटना यूनिवर्सिटी में छात्र राजनीति से हुई थी। उसी दौर में जेपी का आंदोलन शुरू हुआ और लालू यादव, नीतीश कुमार, सुशील मोदी और राम विलास पासवान समेत कई नेता आंदोलन का हिस्सा बने। इस दौरान नीतीश जेपी, लोहिया, कर्पूरी ठाकुर जैसे दिग्गज नेताओं के साथ रहे। जहां उनके साथी लालू 1977 में ही लोकसभा में पहुंच गए वहीं नीतीश को 1985 में पहली बार जीत मिली। इसके पहले उन्हें दो चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा था। दरअसल जेपी आंदोलन के बाद 1977 में बिहार विधानसभा के चुनाव हुए। इस बार उन्हें जनता दल सेक्युलर ने हरनौत सीट से उम्मीदवार बनाया लेकिन वे निर्दलीय भोला सिंह ने उन्हें हरा दिया। 1980 में मध्यावधि चुनाव हो गए। एक बार फिर नीतीश को इसी सीट से उम्मीदवार बनाया गया। इस बार फिर नीतीश एक दूसरे निर्दलीय उम्मीदवार अरुण सिंह से मुकाबले में नीतीश कुमार हार गए।

जब पहली बार बने विधायक
1985 का विधानसभा चुनाव आया। इस बार लोकदल के टिकट पर नीतीश ने हरनौत विधानसभा सीट से जीत हासिल की। नीतीश ने कांग्रेस के ब्रजनंदन सिंह को 21 हजार से अधिक वोटों से हराया। इसके बाद नीतीश ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। चार साल बाद 1989 में वह लोकसभा चुनाव में वह बाढ़ लोकसभा सीट से प्रत्याशी बने और राम लखन सिंह यादव को हराकर संसद में पहुंचे। इसके बाद 1991, 1996, 1998 और 1999 में वह बाढ़ से ही चुनाव जीतते रहे। इस दौरान उन्होंने 1994 में जनता दल से अलग होकर जार्ज फर्नांडीज के साथ समता पार्टी का गठन कर लिया और 1996 में भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। अटल बिहारी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार में मंत्री भी बने।
2004 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार दो जगह से चुनाव लड़े। एक नामांकन उन्होंने बाढ़ लोकसभा से किया वहीं दूसरा पर्चा अपने गृह जनपद नालंदा से भरा था। दरअसल नीतीश को बाढ़ के बारे में अंदाजा हो गया था कि स्थिति कुछ ठीक नहीं है। नीतीश चुनाव तो जीते लेकिन आशंका सच साबित हुई। वे नालंदा से चुनाव जीत गए लेकिन बाढ़ ने उन्हें हरा दिया था। इसके बाद नीतीश ने चुनाव नहीं लड़ा। कहने वाले तो कहते हैं कि बाढ़ की हार ने नीतीश को झकझोर दिया।

16 साल से नहीं लड़ा चुनाव
इसके बाद नीतीश राज्य की राजनीति में सक्रिय हो गए। राबड़ी राज के खिलाफ जुट गए। मेहनत 2005 में रंग लाई और नीतीश बिहार के मुख्यमंत्री बने। उस दौरान वे सांसद थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद लोकसभा से इस्तीफा देकर वे विधान परिषद के सदस्य बने। तब से वे विधान परिषद के सदस्य ही हैं। आखिरी बार उन्होंने 2004 में कोई चुनाव लड़ा। तब से अबतक 16 साल हो गए और नीतीश कुमार सीधे जनता द्वारा निर्वाचित नहीं हुए। अगर विधानसभा की बात करें तो 1985 के बाद से नीतीश ने कोई विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा है।
वैसे बहुत कम लोगों को शायद पता होगा कि नीतीश पहली बार 2000 में ही बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। हालांकि ये कार्यकाल मात्र सात दिन का ही था। खास बात ये भी है कि बिहार में डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी भी विधान परिषद से ही पहुंचते हैं।












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