इस्लामिक देशों में सताए गए अल्पसंख्यकों को संरक्षण देती है नागरिकता संशोधन विधेयक

बेंगलुरू। केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 कानून बनने से महज अब चंद कदम दूर है, लेकिन विधेयक को मुस्लिम विरोधी के रूप प्रचारित किया जा रहा है, लेकिन बिल के प्रारूप में ऐसा कुछ कुछ परिलक्षित नहीं हो रहा है।

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कई विपक्षी नेताओं ने नागरिकता संशोधन बिल 2019 का विरोध किया है। इनमें एआईएमआईएम चीफ असदुद्दीन ओवैसी का नाम प्रमुख है, जिन्होंने नागरिकता संशोधन विधेयक को इजरायल से जोड़ दिया है जबकि कुछ विपक्षी नेता एनआरसी और कैब को लेकर कन्फ्यूज हैं जबकि दोनों के विषय वस्तुतः अलग-अलग हैं।

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गौरतलब है मोदी सरकार द्वारा संसद के पटल पर रखे गए नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 मुस्लिम विरोधी नहीं हैं। यह विधेयक मूल रूप से उन अल्पसंख्यकों को संरक्षित करने की बात करता है, जो तीन धर्मशासित पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में सताए जा रहे हैं। इनमें हिंदू, सिख, ईसाई और पारसी शामिल हैं।

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विधेयक में मुस्लिम को इसलिए नहीं रखा गया है, क्योंकि तीनों पड़ोसी मुल्क जिनकी ऊपर चर्चा की गई है, वो इस्लामिक देश हैं, जहां मुस्लिमों को कोई दिक्कत नहीं है। यह विधेयक मुस्लिम के खिलाफ है यह महज दुष्प्रचार है, केवल 20 करोड़ भारतीय मुस्लिम का इससे कोई लेना-देना नहीं है और न ही भारत सरकार उनकी नागरिकता छीनने जा रही है।

यह बात रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह स्पष्ट कर चुके हैं। उन्होंने बताया कि भारत के तीनों पड़ोसी धर्मशासित देशों में रह रहे अल्पसंख्यकों का लगातार मजहबी उत्पीड़न हुआ है, जिसकी वजह से उन्हें भारत में शरण लेनी पड़ी है। इनमें छह अल्पसंख्यक समूहों को नागरिकता का अधिकार देने का फैसला सर्व-धर्म समभा की भावना के अनुरूप हैं।

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चूंकि पाकिस्तान और अफगानिस्तान एक इस्लामिक गणराज्य हैं। जबकि धर्मनिरपेक्षता बांग्लागदेश के संविधान की प्रस्तावना में शामिल है, लेकिन इस्लाम को राष्ट्रीय धर्म बताया गया है। इसलिए मुस्लिम का हित भी बांग्लादेश में सर्वोपरि माना जा सकता है। इसलिए नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 में मुस्लिम को बाहर रखा गया है। यह बात आंकड़ों के जरिए भी आसानी से समझा जा सकता है।

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मोदी सरकार ने इस विधेयक में अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से संबंध रखने वाले छह मजहबों, जिनमें हिंदू, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध और पारसी के उन लोगों को नागरिकता देने का प्रावधान है, जिन्होंने या तो भारत में गैर कानूनी तौर पर प्रवेश किया या यहां आने के बाद उनके दस्तावेजों की अधिक समाप्त हो चुकी है। इन लोगों ने धार्मिक प्रताड़ना की वजह से या ऐसा होने के डर से इन तीन देशों से भारत में आकर शरण ली हो। ये उन लोगों पर लागू होगा जो 31 दिसंबर, 2014 के पहले से यहां रह रहे हों।

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देश के गृह मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने भी तीनों पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों पर धर्म-परिवर्तन के लिए दबाव, उनकी महिलाओं पर प्रताड़ना, बच्चियों को उठाकर ले जाने जैसे अपराधों की बात कही है और स्पष्ट किया कि ऐसे जिन लोगों ने भारत में शरण ली है, उन्हें ये क़ानून राहत देगा। गृह मंत्री का कहना था कि चूंकि इस्लामी मुल्कों में मुसलमानों पर ज़ुल्म नहीं हो सकता इसलिए बिल में मुसलमानों का नाम नहीं लिया गया है।

गृहमंत्री शाह ने सोशल मीडिया पर फैलाए जा रहे उस झूठ से भी पर्दा उठाया है, जिसमें कहा जा रहा है कि मोदी सरकार कैब और एनआरसी की आड़ में मुसलमानों के ख़िलाफ़ एजेंडा है। बीजेपी अध्यक्ष का कहना था कि दुनिया का कौन सा देश है जो अपने नागरिकों का लेखा-जोखा नहीं करता है तो इसमें मुस्लिम-विरोध की बात कहां से आ गई और जो भारतीय नहीं हैं उन्हें यहां से जाना ही चाहिए।

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सर्वधर्म समभाव और वसुधैव कुटुंबकम को जीवन का आधार मानने वाले हिंदुओं की स्थिति उन देशों में काफी बदतर है जहां वे अल्पसंख्यक हैं। भारत से बाहर रह रहे हिंदुओं की आबादी लगभग 20 करोड़ है। सबसे ज्यादा खराब स्थिति दक्षिण एशिया के देशों में रह रहे हिंदुओं की है। दक्षिण एशियाई देशों जैसे अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश प्रमुख हैं, जहां हिंदू ही नहीं, अल्पसंख्यक की श्रेणी में शुमार सिख, और ईसाई भी पीड़ित है।

उल्लेखनीय है पाकिस्तान में 1947 में कुल आबादी का 25 प्रतिशत हिंदू थे। अभी इनकी जनसंख्या कुल आबादी का मात्र 1.6 प्रतिशत रह गई है।" वहां गैर-मुस्लिमों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार हो रहा है। 24 मार्च, 2005 को पाकिस्तान में नए पासपोर्ट में धर्म की पहचान को अनिवार्य कर दिया गया। स्कूलों में इस्लाम की शिक्षा दी जाती है।

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गैर-मुस्लिमों, खासकर हिंदुओं के साथ असहिष्णु व्यवहार किया जाता है। जनजातीय बहुल इलाकों में अत्याचार ज्यादा है। इन क्षेत्रों में इस्लामिक कानून लागू करने का भारी दबाव है। हिंदू युवतियों और महिलाओं के साथ दुष्कर्म, अपहरण की घटनाएं आम हैं। उन्हें इस्लामिक मदरसों में रखकर जबरन मतांतरण का दबाव डाला जाता है। गरीब हिंदू तबका बंधुआ मजदूर की तरह जीने को मजबूर है।

कमोबेश यही हालत बांग्लादेश में हैं, जहां हिंदू अल्पसंख्यकों की संख्या तेजी से घटी है। हाल ही में बांग्लादेश ने "वेस्टेड प्रापर्टीज रिटर्न (एमेंडमेंट) बिल 2011"को लागू किया है, जिसमें जब्त की गई या मुसलमानों द्वारा कब्जा की गई हिंदुओं की जमीन को वापस लेने के लिए क्लेम करने का अधिकार नहीं है।

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इस बिल के पारित होने के बाद हिंदुओं की जमीन कब्जा करने की प्रवृति बढ़ी है और इसे सरकारी संरक्षण भी मिल रहा है। इसका विरोध करने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों पर भी जुल्म ढाए जाते हैं। इसके अलावा हिंदू इस्लामी कट्टरपंथियों के निशाने पर भी हैं। उनके साथ मारपीट, दुष्कर्म, अपहरण, जबरन मतांतरण, मंदिरों में तोडफोड़ और शारीरिक उत्पीड़न आम बात है। अगर यह जारी रहा तो अगले 25 वर्षों में बांग्लादेश में हिंदुओं की आबादी ही समाप्त हो जाएगी।

बड़ा सवाल है कि आखिर बिल का विरोध क्यूं हो रहा है। इस विधेयक से मुस्लिमों को दूर रखने की वजह साफ है कि तीनों पड़ोसी देश इस्लामिक हैं, जहां मुस्लिम का हित सुरक्षित है, उन्हें भारत में क्यों आने की पड़ी है। यह विधेयक सिर्फ उन लोगो के संरक्षण की बात करता है, जो तीनों इस्लामिक देशों में पीड़ित हैं, जहां उनके साथ दोयम नागरिकों जैसा बर्ताव किया जाता है।

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भारत में पाकिस्तान के बंटवारे की मुख्य वजह भी यही थी, क्योंकि मुस्लिमों की हितों की सुरक्षा के लंबरदारों का सीधा मानना था कि मुस्लिम इस्लामिक राष्ट्र में सुरक्षित रह सकता है। वैसे भी यह बिल भारतीय मुस्लिमों की नागरिकता के बारे में अथवा उनकी नागरिकता छीनने की बात नहीं करता है बल्कि भारत में जबरन घुसने की फिराक में बैठे असामाजिक लोगों को नागरिकता नहीं देने की बात कर रही है।

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ऐसा नैरेटिव गढ़ा जा रहा है कि एनआरसी और कैब के जरिए भारत से मुसलमानों को भगाया जा रहा है जबकि सच्चाई इसके उलट है। यह उनके लिए जो जबरन और गैर-कानूनी तरीके से भारत में घुस आए हैं या भारत में घुसने की फिराक में हैं। एक अनुमान असम 50 पश्चिम बंगाल में 57 लाख और पूरे देश में 2 करोड़ हैं। रोहिंग्या मुसलमानों की संख्या में कानूनी रूप से भारत शरणार्थी के रूप में यूएन द्वारा रजिस्टर्ड 14 हजार है जबकि भारत में इनकी संख्या 40 हजार है। यह भारत में रह रहे 20 करोड़ मुसलमान आबादी के लिए उचित हैं।

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