तालिबान का चीन और पाकिस्तान से गठजोड़ चिंता की बात है, प्रस्ताव पारित होने पर बधाई देना जल्दबाजी- पी चिदंबरम

नई दिल्ली, सितंबर 01। हाल ही में भारत की अध्यक्षता में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) ने एक प्रस्ताव पारित किया था। इस प्रस्ताव में मांग की गई थी कि अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा होने के बाद वहां की धरती का इस्तेमाल आतंकियों को पनाह देने, आतंकियों को तैयार करने या फिर किसी अन्य देश को धमकी देने के लिए नहीं होना चाहिए। इस प्रस्ताव में ये उम्मीद की गई थी कि तालिबान अफगान नागरिकों और विदेशी नागरिकों के देश से सुरक्षित और व्यवस्थित ढंग से जाने देने के संबंध में उसके द्वारा जताई गई प्रतिबद्धताओं का पालन करना होगा।

इस प्रस्ताव के पारित होने पर पी चिदंबरम की प्रतिक्रिया

इस प्रस्ताव के पारित होने पर पी चिदंबरम की प्रतिक्रिया

UNSC में पारित इस प्रस्ताव को लेकर पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम की प्रतिक्रिया आई है। उन्होंने कहा है कि अभी हमें खुद को बधाई देना काफी जल्दबाजी होगी, क्योंकि तालिबान का पाकिस्तान और चीन से गठजोड़ एक चिंता का विषय है। पी चिदंबरम ने एक ट्वीट के जरिए कहा है, "खुद को बधाई देना जल्दबाजी होगी।" "चीन, पाकिस्तान और तालिबान नियंत्रित अफगानिस्तान की संभावित धुरी चिंता का कारण है।"

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    प्रस्ताव को जमीन पर उतारना बहुत मुश्किल है- चिदंबरम

    प्रस्ताव को जमीन पर उतारना बहुत मुश्किल है- चिदंबरम

    UNSC के प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया देते हुए पी चिदंबरम ने कहा कि भारत सरकार इस प्रस्ताव के पारित होने पर खुद को बधाई दे रही है, लेकिन इस प्रस्ताव के दो अर्थ हैं- पहला ये कि इस मुद्दे का हल निकाल लिया गया है, लेकिन ये UNSC में नहीं हुआ है। वहीं दूसरा अर्थ है- हमने अपनी इच्छाओं को कागज पर लिख दिया है और उस कागज पर कुछ अन्य के हस्ताक्षर करा लिए हैं। कल UNSC में यही हुआ है। पी चिदंबरम की प्रतिक्रिया से साफ है कि प्रस्ताव के अनुसार तालिबान अफगानिस्तान में राज करेगा, ये सुनिश्चित होना बहुत मुश्किल है और वो भी तब, जब उसका पाकिस्तान और चीन से गठजोड़ है।

    15 में से 13 देशों ने प्रस्ताव के समर्थन में किया मतदान

    15 में से 13 देशों ने प्रस्ताव के समर्थन में किया मतदान

    आपको बता दें कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सोमवार को फ्रांस, ब्रिटेन, और अमेरिका द्वारा प्रायोजित प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। इस प्रस्ताव के पक्ष में 15 में से 13 देशों ने मतदान किया था। हालांकि किसी ने भी इस प्रस्ताव के विरोध में मतदान नहीं किया। रूस और चीन जैसे UN के स्थायी सदस्यों ने हालांकि मतदान प्रक्रिया से दूरी जरूर बनाई।

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