चीन को अरुणाचल प्रदेश से दो टूक संदेश, 'अगले दलाई लामा को चुनने में दखल देने की कोशिश ना करे'
तवांग, 24 अक्टूबर: अरुणाचल प्रदेश के तवांग मोनेस्ट्री ने साफ कह दिया है कि अगले दलाई लामा को चुनने में चीन को किसी तरह के दखल देने का कोई अधिकार नहीं है। तवांग मोनेस्ट्री के प्रमुख के मुताबिक खासकर इसलिए भी क्योंकि चीन सरकार धर्म को नहीं मानती और उत्तराधिकार का मामला तिब्बत के लोगों के लिए पूरी तरह से आध्यात्मिक मसला है। चीन के साथ लगी सीमा पर मौजूद यह भारतीय मोनेस्ट्री करीब 350 साल पुरानी है। इसके मठ प्रमुख ग्यांगबुंग रिनपोचे ने यह भी कहा है कि बीजिंग की विस्तारवादी नीति को जवाब देना जरूरी है और भारत सरकार को पड़ोसी देश से लगने वाली वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर कड़ी निगरानी रखनी चाहिए।

'चीन को अगले दलाई लामा पर फैसला लेने का अधिकार नहीं'
तिब्बत की राजधानी ल्हासा के पोटाला पैलेस के बाद दुनिया की सबसे बड़ी मोनेस्ट्री के प्रमुख के मुताबिक मौजूदा दलाई लामा और तिब्बत की जनता के पास ही यह अधिकार है कि वह अपने आध्यात्मिक गुरु के उत्तराधिकारी पर फैसला करें। चीन को इस मामले में दखल देने की कोई जरूरत नहीं है। ग्यांगबुंग रिनपोचे ने पीटीआई को दिए इंटरव्यू में कहा है, 'चीन सरकार को धर्म में विश्वास नहीं है। जिस सरकार को धर्म में भरोसा नहीं है, वह अगले दलाई लामा पर फैसला कैसे कर सकती है। उत्तराधिकार की योजना धर्म और आस्था से जुड़ा मामला है; यह कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं है।' उन्होंने यहां तक कहा कि 'चीन को अगला दलाई लामा चुनने की प्रक्रिया में शामिल होने का अधिकार भी नहीं है। सिर्फ मौजूदा दलाई लामा और उनके अनुयायियों को ही इस मुद्दे पर निर्णय लेने का अधिकार है।'

तिब्बतियों का समर्थन करे भारत- तवांग मठ के प्रमुख
जिस दौर में पूर्वी लद्दाख में एलएसी पर भारत और चीन के बीच एक तरह की तकरार की स्थिति पिछले डेढ़ वर्षों से कायम है और अरुणाचल के उसपार भी चीन लगातार अपनी नापाक हरकतों को अंजाम देने में लगा हुआ है, ऐसे में उस राज्य से भारत के सबसे बड़े बौद्ध मठ के प्रमुख की ओर से चीन के लिए दो टूक बयान खासा मायने रखता है। क्योंकि, चीन की बुरी नजर अरुणाचल प्रदेश पर भी रहती है, जो कि भारत का अभिन्न हिस्सा है। रिनपोचे ने चीन की तिब्बत नीति पर भी खुलकर वार किया है। उन्होंने कहा है कि इस मामले में तिब्बत की विरासत और तिब्बती जनता पर नियंत्रण का चीन का प्रयास और फैसला तिब्बत के लोग कभी स्वीकार नहीं करेंगे। उन्होंने कहा, 'चीन के लिए तिब्बत के लोगों का दिल जीतना मुश्किल होगा। तिब्बत पर चीन कड़ाई से नियंत्रण कर रहा है। बाहर के लोगों को तिब्बतियों से मिलने तक नहीं दिया जाता। कई तरह की पाबंदियां लगा रखी हैं। यह बहुत ही जरूरी है कि भारत जैसे देश तिब्बतियों का समर्थन करें।'

'एलएसी पर कड़ी निगरानी रखे भारत'
1959 से भारत के धर्मशाला में निर्वासन में रह रहे 14वें दलाई लामा के उत्तराधिकारी का मसला इसलिए जोर पकड़ रहा है, क्योंकि इस साल जुलाई में वे 86 साल के हो चुके हैं। चीन इस बात पर दबाव बनाए हुए है कि अगले दलाई लामा का चुनाव चीन के कब्जे वाले क्षेत्र से ही हो, ताकि इस प्रक्रिया में उसे दखल देने का मौका मिल जाए और अपने मुखौटे को इस आध्यात्मिक पद पर बिठा सके। तवांग मोनेस्ट्री के प्रमुख ने भारत को एलएसी पर चीन के आक्रामक तेवरों को देखते कहा है कि उसे अपनी सीमा पर कड़ी निगरानी रखनी होगा। उन्होंने कहा है, 'भारत शांति और समृद्धि में विश्वास रखता है। भारत लड़ाई नहीं करना चाहता या किसी भी देश से नफरत नहीं करता है। जिन देशों के साथ भारत की सीमाएं मिलती हैं, उनके साथ भारत शांति से रहने में विश्वास करता है।' लेकिन, उन्होंने यह भी कहा है कि 'भारत को अपनी सेना पर सख्त निगरानी रखने की जरूरत है। हालांकि, भारत शांति और समृद्धि में विश्वास करता है, उसका नजरिया जमीनी सच्चाई पर आधारित होना चाहिए। तवांह और लद्दाख जैसे क्षेत्र भारत का हिस्सा हैं।'

'चीन की विस्तारवादी नीति का जवाब देना जरूरी'
उन्होंने शी जिनपिंग की सरकार पर सीधा हमला करते हुए यहां तक कह दिया है कि चीन की विस्तारवादी नीति को जवाब देना जरूरी है। चीन पहले दलाई लामा पर अलगावादी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगा चुका है और कह चुका है कि वह तिब्बत को बांटना चाहते हैं। इसलिए वह उन्हें विभाजनकारी शख्सियत मानता है। हालांकि, तिब्बत के आध्यात्मिक नेता कहते हैं कि वह चीन से आजादी नहीं चाहते हैं, लेकिन वह तिब्बत के तीन परंपरागत प्रांतों में रहने वाले तिब्बतियों के लिए सही मायने में स्वायत्तता चाहते हैं। 2010 के बाद से दलाई लामा या उनके प्रतिनिधि और चीन सरकार के अधिकारियों के बीच कोई औपचारिक चर्चा नहीं हुई है।
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