गे सेक्स पर आर्मी चीफ जनरल रावत का बयान-सेना में यह सब नहीं चलेगा
नई दिल्ली। इंडियन आर्मी चीफ जनरल बिपिन रावत ने साफ कर दिया है कि सेना में गे सेक्स या फिर समलैंगिकता के लिए कोई जगह नहीं है। जनरल रावत गुरुवार को सालाना प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोल रहे थे और यहीं पर उन्होंने यह बयान दिया है। इसके साथ ही उन्होंने एडल्ट्री पर भी बयान से रेड सिग्नल दिया है। आपको बता दें कि पिछले वर्ष इन दोनों ही मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट की ओर से एतिहासिक फैसला दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने आर्टिकल 377 के तहत समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया था। जनरल रावत से समलैंगिता को लेकर सवाल पूछा गया था और उन्होंने अपने जवाब से साफ कर दिया है कि सेना का रुख किसी भी कीमत पर नहीं बदलेगा। सेना में किसी भी तरह से समलैंगिकों को जगह नहीं मिल सकती है, उनके जवाब से तो कम से कम यही लगता है। यह भी पढ़ें- जनरल रावत ने तालिबान के साथ वार्ता का किया समर्थन

कानून से ऊपर नहीं है सेना
जनरल रावत ने सालाना प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक ऐसा बयान दिया है जिस पर विवाद हो सकता है। जनरल रावत ने कहा है कि इंडियन आर्मी कानून से ऊपर नहीं है। लेकिन सेना में समलैंगिकों के लिए कोई जगह नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले वर्ष समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया है। सेना प्रमुख ने कहा, 'हम लोगों के यहां ये नहीं चलेगा।' उन्होंने इस बात को स्वीकार के सेना कानूने से ऊपर तो नहीं है मगर इस बात पर भी राजी हुए कि संविधान इस तरह की स्वतंत्रता देता है।

हम ऐसा नहीं होने देंगे
जनरल रावत ने कहा , 'सेना में यह नहीं होने देंगे।' उन्होंने यह भी कहा कि होमोसेक्सुअैलिटी के लिए सेना का अपना कानून है। जनरल रावत के शब्दों में, 'हम न तो आधुनिक हैं और न ही पश्चिमी सभ्यता जैसे। एलजीबीटी जैसे इश्यू हमें स्वीकार नहीं हैं।' सेना प्रमुख ने कहा कि सेना में इस तरह के मुद्दों को आर्मी एक्ट के तहत रखकर निबटा जाएगा। आर्मी चीफ ने साफ कर दिया है कि सेना रुढ़िवादी है। जनरल रावत ने इस मुद्दे पर आगे कहा, 'कुछ ऐसे अधिकार और सुविधाएं हैं जो आम नागरिकों के लिए हैं जवानों के लिए नहीं। कुछ चीजें हमारे लिए अलग होती हैं। '

'हम रुढ़िवादी हैं, प्लीज'
जनरल रावत को जब एडल्ट्री पर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बारे में बताया गया तो इस पर भी उनका जवाब बड़ा हैरान करने वाला था। जनरल रावत ने कहा, 'सेना बहुत ही रुढ़िवादी है। हम सेना में इसे जगह नहीं दे सकते हैं।' पिछले वर्ष सितंबर में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की एक बेंच ने आईपीसी के सेक्शन 377 के तहत समलैंगिकता को अपराध से बाहर कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि इसे अपराध के दायरे में रखने से समानता के अधिकार का उल्लंघन होता है। एडल्ट्री पर भी सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इससे महिला की पहचान पर प्रश्न चिन्ह लगता है और साथ ही साथ यह असंवैधानिक है। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक एडल्ट्री का विरोध करने का मतलब महिलाओं को पति के गुलाम के तौर पर समझना है।
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