बिहार जातिगत गणना के आंकड़ों पर क्यों नहीं किया जा सकता है भरोसा? जातिगत सर्वे के डेटा से समझिए पूरा खेल
Caste census In Bihar: केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने जब से ये घोषणा की है कि देश में अगली जनगणना में जातियों की भी गिनती होगी, तब से बिहार सरकार द्वारा 2023 में जारी जातिगत गणना के आंकड़ों पर चर्चा तेज हो गई है। जाति जनगणना पर मोदी सरकार के फैसले के बाद राष्ट्रीय जनता दल के नेता और बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने इसका क्रेडिट लेते हुए कहा कि 'सरकार को अब हमारी बातें माननी पड़ी है। जब इसके नतीजे सामने आएंगे तो हम ये मांग करेंगे कि पूरे देश के विधानसभा चुनावों में पिछड़े और अति पिछड़ों के लिए भी सीटें आरक्षित की जाएं।' तेजस्वी यादव मांग है कि 'जितनी आबादी, उतनी भागीदारी'
तेजस्वी यादव और विपक्षी दलों की इन मांग के बीच बिहार के जातिगत सर्वेक्षण के आंकड़ों की विश्वसनीयता पर फिर से सवाल उठने लगे हैं। जातिगत सर्वेक्षण के डेटा, खासकर यादव जाति के आंकड़ों को लेकर कई सवाल खड़े किए जा रहे हैं। ओबीसी उप-वर्गीकरण की चर्चा के बीच ही आरजेडी ने दबाव डालकर उस वक्त जाति सर्वे कराया था। आरजेडी ने उस वक्त ये दलील दी थी कि उप-वर्गीकरण से सभी जातियों को आरक्षण का उचित लाभ मिल सकता है। लेकिन आंकड़ों में उन्होंने यादव जाति के उप-वर्गीकरण को एक साथ दिखाया। ऐसे में आइए समझने की कोशिश करते हैं कि जातिगत गणना के आंकड़ों पर क्यों भरोसा नहीं किया जा सकता है?

बिहार जातिगत सर्वेक्षण: अविश्वास की प्रमुख वजहें
बिहार में यादवों की संख्या पर क्यों उठे सवाल?
2 अक्टूबर 2023 को नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली महागठबंधन सरकार ने जातीय जनगणना की सर्वे रिपोर्ट जारी की थी। उस वक्त बिहार में आरजेडी और कांग्रेस नीतीश कुमार की सरकार का हिस्सा थी। तेजस्वी यादव ने बिहार में जातीय जनगणना करवाने का पूरा क्रेडिट लिया था। पहले तो आरजेडी ने जातियों के उप-वर्गीकरण की मांग को लेकर जाति सर्वे का दबाव बनाया था। लेकिन अब रिपोर्ट आई तो उसमें यादवों को बिहार की सबसे बड़ी जातियों में से एक बताया गया। इस रिपोर्ट में नीतीश सरकार ने कुल 215 जातियों का आंकड़ा जारी किया था। इसमें यादव 14.2666 फीसदी थे। रिपोर्ट में बाकी सभी जाति के उप-जातियों की संख्या बताई गई थी। लेकिन यादवों की उप-जातियों जैसे ग्वाला, अहिर, गोरा, घासी, मेहर, सदगोप, लक्ष्मी नारायण गोला...सभी की जनसंख्या को एक ही बताई गई थी।
इसके बाद 9 नवंबर 2023 को विधानसभा में बिहार आरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2023 पारित किया गया था। नए कानून के आधार पर आरक्षण का दायरा 50% से बढ़ाकर 65% कर दिया गया था। हालांकि बाद में पटना हाई कोर्ट ने आरक्षण का दायरा 50% से 65% करने को गैर संवैधानिक बता कर रोक लगा दी थी। पटना हाई कोर्ट के फैसले को बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी लेकिन फिलहाल ये मामला लंबित है।
यादव जाति को आमतौर पर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) का कोर वोट बैंक माना जाता है। अगर किसी भी तरह से यादवों की संख्या बढ़ती है तो इससे उनकी राजनीतिक ताकत और आरक्षण में हिस्सेदारी को बड़ा फायदा होता है। कुछ विश्लेषक मानते हैं कि यह आंकड़ा सामाजिक संतुलन को तोड़ने का प्रयास हो सकता है।
इस लूप होल से साफ समझा जा सकता है कि जातिगत सर्वेक्षण के आंकड़ों को राजनीतिक लाभ के लिए अपने पक्ष में किया जा सकता है। जातिगत सर्वेक्षण कभी-कभी राजनीतिक हितों से प्रभावित हो सकते हैं। सत्ता में मौजूद दल अपने हितों के अनुसार आंकड़ों में हेरफेर कर सकते हैं ताकि उन्हें चुनावी लाभ मिल सके। खुद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी बिहार के जातिगत सर्वेक्षण को फर्जी बताया था।
ऐसे में अगर रोहिणी आयोग की रिपोर्ट सामने आती है तो बिहार में आरक्षण की स्थिति कुछ और हो सकती है। मोदी सरकार ने 2017 में रोहिणी आयोग का गठन किया था। रोहिणी आयोग की जिम्मेदारी ओबीसी के उप-वर्गीकरण का सुझाव देना था। ताकि कोटे के अंदर कोटा तैयार हो सके और ओबीसी के सभी जातियों को समान रूप से आरक्षण का लाभ मिल सके। अभी तक ये देखा गया है कि ओबीसी में शामिल कुछ प्रभावशाली और दबंग जातियां ही इसका फायदा उठाती हैं। आयोग ने 2023 में ही अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी थी, जिसे अब तक सार्वजनिक नहीं किया गया है।
बिहार जातिगत सर्वेक्षण 2023 के आंकड़े?
- यादव- 14. 2666%
- मुसलमान- 17. 7088%
- कुर्मी- 2.8785%
- कुशवाहा- 4.2120 %
- ब्राह्मण- 3.6575 %
- भूमिहार- 2.8683 %
- राजपूत- 3.4505 %
- मुसहर- 3.0872 %
- मल्लाह- 2.6086 %
- बनिया- 2.3155 %
- कायस्थ- 0.60 %
इसके अलावा भी जातिगत सर्वेक्षण पर भरोसा ना करने की कई वजह हैं
🔴 डेटा संग्रहण की सीमाएं: जातिगत सर्वेक्षण के दौरान इस्तेमाल की गई विधियां (जैसे सैंपलिंग तकनीक, प्रश्न पूछने का तरीका) अगर वैज्ञानिक नहीं हैं या ठीक से लागू नहीं की गईं, तो आंकड़े गलत या अधूरे हो सकते हैं।
🔴 स्व-घोषित जानकारी पर भी सवाल: जातिगत जानकारी अक्सर व्यक्ति द्वारा खुद दी जाती है। कई बार लोग अपनी जाति को छुपाते हैं, बदल देते हैं या भ्रमित जानकारी देते हैं, जिससे आंकड़ों की शुद्धता पर सवाल उठते हैं।
🔴 भ्रष्टाचार और प्रशासनिक खामियां: सर्वेक्षण में लगे अधिकारी या एजेंसियां कभी-कभी लापरवाही करती हैं या भ्रष्टाचार के कारण गलत रिपोर्टिंग कर देती हैं, जिससे आंकड़े भरोसेमंद नहीं रहते।
🔴 अपारदर्शिता और निगरानी की कमी: अगर सर्वेक्षण प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है और उसकी निगरानी स्वतंत्र एजेंसियों द्वारा नहीं की जाती, तो लोगों को आंकड़ों की सच्चाई पर संदेह होता है।












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