Caste Census 2025: जाति जनगणना पर राजनीति का गठजोड़, जानें ये मुद्दा कैसे बन गया सत्ता साधने का दांव?
Caste Census 2025: भारतीय राजनीति में सत्ता की हवा कब, किधर और किस और रुख बदलेगी इस पर कुछ कहा नहीं जा सकता है। 30 अप्रैल 2025 का दिन कुछ इसी तरह बदला, जब पीएम मोदी की केंद्रीय कैबिनेट बैठक में जातिगत जनगणना के लिए ग्रीन सिग्नल दिया गया।
इसके साथ ही भाजपा ने बिहार के आगामी विधानसभा चुनाव 2025 में विपक्ष के अहम चुनावी मुद्दे पर कड़ा प्रहार किया है। दरअसल, बिहार चुनाव को देखते हुए विपक्ष जातिगत सर्वेक्षण के मुद्दे को मजबूती से पकड़ा हुआ था। बुधवार को केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि देश में जातियों की गिनती जनगणना के साथ की जाएगी।

इसके साथ ही राजनीतिक गलियारे में सवाल शुरू हो गए हैं कि जाति सर्वेक्षण के खिलाफ रहने वाली भाजपा आखिर क्यों इस पर राजी हो गई? क्या ये महज चुनावी रणनीति है या भाजपा इस पर लंबी पारी खेलेगी? आईए जानेंगे कैसे जातिगत जनगणना राजनीतिक मुद्दा बना....
Caste Census in India: जाति सर्वेक्षण कैसे बना राजनीतिक मुद्दा?
पिछले महीने ही राहुल गांधी ने कांग्रेस के गुजरात अधिवेशन में भी इस मुद्दे को उठाया था और कहा था कि लोगों को पता होना चाहिए की देश में कितने पिछड़े, आदिवासी, अल्पसंख्यक लोग रहते हैं। ताकि देश के संसाधनों में उनकी हिस्सेदारी लगाई जा सके।
देखिए अगर सरल शब्दों में समझा जाए तो जाति सर्वेक्षण सीधे तौर पर राजनीति की बिसात पर जाति आंकड़ों का खेल है। देश में सालों से जाति को मोहरा बना कर सत्ता साधने की परंपरा चली आ रही है। इसका सबसे बड़ा कारण आरक्षण है।
राजनीतिक विश्लेषकों का माना है कि जातिगत सर्वेक्षण अब महज सामाजिक नहीं, बल्कि पूर्ण रूप से राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। चुनावी रणनीति से लेकर आरक्षण की नीतियों तक, जाति एक ऐसा कारक रही है जिससे सत्ता की गणना की जाती रही है। इसकी सियासत की जमीन तैयार करने में विपक्ष की भूमिका भी काफी अहम रही है। विपक्ष लंबे समय से इस पर प्रखर रुप से हावी रहा है।
जब 1980 के दशक में क्षत्रिय पार्टियां उभरी तब उन्होंने अपनी राजनीतिक धुरी को मजबूत करने के लिए जातियों को साधना शुरू कर दिया। इतना ही नहीं क्षेत्रिय स्तर पर पार्टियों ने निचली जातियों को आरक्षण का लालच देकर अपने पाले में लेने की कोशिश कर दी। चूंकि जातिगत जनगणना का पूरा मामला ही आरक्षण से जुड़ा था इस वहज से इसका उनको काफी फायदा भी मिला।
Caste Census 2025: बिहार चुनाव में BJP की राजनीतिक बिसात
हाल के वर्षों में बिहार, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्यों ने अपनी-अपनी जाति आधारित जनगणनाएँ कराई। बिहार में 2023 में हुए जाति सर्वेक्षण में यह सामने आया कि OBC और अत्यंत पिछड़े वर्ग राज्य की जनसंख्या का 63% से अधिक है।
बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, सर्वे के अनुसार राज्य में अति पिछड़ा वर्ग 27.12 प्रतिशत, अत्यन्त पिछड़ा वर्ग 36.01 प्रतिशत, अनुसूचित जाति 19.65 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति 1.68 प्रतिशत और अनारक्षित यानी सवर्ण 15.52 प्रतिशत हैं। बिहार की चुनावी हवा में जाति का एक बहुत बड़ा फैक्टर है। OBC समुदाय का वहां की राजनीति में गहरी पैठ है यही कारण है कि हर पार्टी अपने स्तर पर जाति को साधने के लिए अपनी गूगली फेंकती रहती है।
भाजपा जो हमेशा से जाति जनगणना के विरोध में थी वो भी आगामी बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में अपने वोट बैंक को साधने के लिए इसका इस्तेमाल करेगी। इसका एक कारण ये भी है कि बिहार में सभी पार्टियां अपने-अपने स्तर पर इस मुद्दे को भूनाने में लगी हुई हैं BJP ने इस फैसले से विपक्ष का एक अहम मुद्दा छीन लिया।
इसका एक प्रमुख कारण ये भी है कि बिहार में बीजेपी के प्रमुख सहयोगी दलों में नीतीश कुमार की जेडीयू और चिराग पासवान की LJP पहले से ही इस मुद्दे की मांग कर चुकी है। चुनावी समय में भाजपा नीतीश कुमार को लेकर कोई संदेह नहीं रखना चाहती है इस मुद्दे को मंजूरी देकर पीएम मोदी ने अपने सहयोगियों को भी खुश कर दिया है।
Caste Census 2025: जाति जनगणना पर राजनीतिक मोड़
मंडल आयोग (1980)
मंडल आयोग की सिफारिशों ने इस मुद्दे को और हवा दी थी। आयोग के अनुसार 27% आरक्षण की व्यवस्था OBC के लिए की गई, लेकिन जातिगत आंकड़ों की कमी ने इस प्रक्रिया को विवादास्पद बना दिया। यह वही क्षण था जब जाति जनगणना एक तीव्र राजनीतिक मुद्दा बनकर उभरी।
SECC 2011
यूपीए सरकार द्वारा सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (Socio-Economic and Caste Census) कराई गई थी, लेकिन इसके आंकड़ों को सार्वजनिक नहीं किया गया। सरकार की ओर से यह कहा गया कि डेटा में तकनीकी त्रुटियां हैं, जबकि आलोचकों ने इसे राजनीतिक कारणों से रोके जाने का आरोप लगाया।












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