कार्बन मार्केट क्या है और ये कैसे काम करते हैं ? जानिए
भारत में भी वैश्विक आधार पर कार्बन बाजार स्थापित किए जाने का रास्ता साफ हो गया है। यह ग्लोबल वार्मिंग की चिंता को कम करने की दिशा में एक सकात्मक कदम माना जा रहा है। इससे कार्बन उत्सर्जक इकाइयों की जिम्मेदारी बढ़ेगी।

भारत में भी कार्बन बाजार का रास्ता साफ हुआ है। माना जा रहा है कि इससे जलवायु परिवर्तन के लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलेगी। क्योंकि, कार्बन उत्सर्जन में जितनी जिनकी जिम्मेदारी है, उन्हें उसी के हिसाब से इसकी भरपाई भी करनी चाहिए। ग्लोबल वार्मिंग जैसे खतरे से बचने के लिए यह समय की मांग है, जिसपर दुनिया भर के देश सहमत भी हुए हैं। आइए जानते हैं कि कार्बन बाजार क्या हैं ? यह कैसे काम करते हैं ? इससे 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य प्राप्त करने में कैसे सहायता मिल सकती है?

कार्बन बाजार पर चर्चा क्यों है ?
वर्ल्ड बैंक का अनुमान है कि कार्बन ट्रेडिंग से जलवायु लक्ष्य को हासिल करने की लागत में आधा से ज्यादा तक कमी लाई जा सकती है। भारत में कार्बन मार्केट चर्चा में इसलिए आया है, क्योंकि पिछले हफ्ते ही संसद ने ऊर्जा संरक्षण (संशोधन) विधेयक, 2022 संसद से पास किया है। इस विधेयक के माध्यम से ऊर्जा संरक्षण कानून, 2001 में बदलाव किया गया है। संशोधन के बाद सरकार को देश में कार्बन बाजार स्थापित करने और एक कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम को स्पष्ट करने का अधिकार मिल गया है। राज्यसभा से पास हुए इस बिल को भविष्य का ऊर्जा संरक्षण विधेयक बताया जा रहा है।

2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य
ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री सेल्सियस से कम रखने या आदर्श रूप में 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिए चालू दशक में ग्लोबाल ग्रीनहाउस गैस एमिशन (GHG) को 25 से 50% तक कम करने की आवश्यकता है। 2015 के पेरिस समझौते के तहत इसके लिए अबतक करीब 170 देशों ने अपने नेशनली डिटरमाइंड कंट्रीब्यूशंस (NDC) पेश किया है। इनके बीच इसे हर पांच साल में इसे अपडेट करने पर भी सहमति है। एनडीसी इन देशों की ओर से 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने के लिए उनकी जलवायु के प्रति प्रतिबद्धता है। जैसे कि भारत इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए लॉन्ग-टर्म रोड मैप के आधार पर काम कर रहा है।

कार्बन बाजार क्या है ?
नेशनली डिटरमाइंड कंट्रीब्यूशंस (एनडीसी) को प्राप्त करने के लिए कई देशों में एक राहत रणनीति लोकप्रिय हो रही है- इसे ही कार्बन बाजार कहा जाता है। पेरिस समझौते के आर्टिकल 6 में सदस्य देशों के अपने एनडीसी को प्राप्त करने के लिए इंटरनेशनल कार्बन मार्केट के इस्तेमाल का प्रावधान है। कार्बन बाजार कार्बन उत्सर्जन के आधार पर एक कीमत वसूलने का टूल है। इसके लिए एक ट्रेडिंग सिस्टम की स्थापना होती है, जहां कार्बन क्रेडिट या अलाउंस खरीदी या बेची जा सकती है। कार्बन क्रेडिट व्यापार योग्य परमिट की तरह है। यूनाइटेड नेशंस के स्टैंडर्ड के मुताबिक यह एक टन कार्बन डाइऑक्साइड हटने, कम होने या वातावरण से छंटने के तुलनात्मक रूप से तय किया जाता है। जबकि, कार्बन क्रेडिट या अलाउंस संबंधित देश या वहां की सरकारें अपने प्रति टन उत्सर्जन कम करने के लक्ष्य के हिसाब से तय करती हैं।

कार्बन बाजार के प्रति क्या रुझान है ?
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की ओर से इस साल जारी एक विज्ञप्ति के मुताबिक कार्बन मार्केट के प्रति दुनिया भर में दिलचस्पी बढ़ती जा रही है। यानि जिन देशों ने एनडीसी दाखिल किए हैं, उनमें से 83% ने यह इच्छा जताई है कि वह ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन घटाने के लिए इंटरनेशनल मार्केट मेकेनिज्म का उपयोग करना चाहते हैं। दुनिया भर में इसका दायरा बढ़ने से यह काम और ज्यादा सुलभ होने की संभावना है।

कार्बन बाजार किस प्रकार के होते हैं ?
कार्बन बाजार आज की तारीख में दो तरह के होते हैं। एक अनुपालन बाजार और दूसरा स्वैच्चिक बाजार। स्वैच्छिक बाजार में कॉर्पोरेशन, निजी उद्यम या अन्य कार्बन उत्सर्जक हो सकते हैं। यह एक टन CO 2 या उसी तरह के ग्रीनहाउस के बराबर कार्बन क्रेडिट खरीदते हैं। यह कार्बन क्रेडिट उन गतिविधियों से हासिल किया जाता है, जो हवा से CO 2 को कम करता है, जैसे कि वनरोपण जैस कार्यक्रम। जैसे कि उड्डयन क्षेत्र में एयरलाइंस कंपनियां कार्बन क्रेडिट खरीद सकती हैं, जिससे कि उन्होंने जो कार्बन फुटप्रिंट छोड़े हैं, उसके माध्यम से उसकी भरपाई पर अमल किया जा सके।

अनुपालन बाजार
अनुपालन बाजार राष्ट्रीय, क्षेत्रीय या संस्थागत स्तर पर आधिकारिक तौर पर नियामक संगठनों की नीतियों के आधार पर स्थापित होते हैं। आज की तारीख में अनुपालन बाजार एक खास सिद्धांत के आधार पर काम कर रहा है, जिसे 'कैप-एंड-ट्रेड' कहा जाता है। खासकर यूरोपियन यूनियन के देशों में यह बहुत ही लोकप्रिय है। इसके तहत सदस्य देशों ने विभिन्न क्षेत्रों जैसे कि ऊर्जा, तेल, निर्माण, कृषि और वेस्ट मैनेजमेंट के लिए उत्सर्जन की एक सीमा निर्धारित कर रखी है। यह सीमा संबंधित देश के क्लाइमेट टारगेट के अनुसार तय होती है। उत्सर्जन में कमी के साथ इसका मानक भी घटाया जाता है। यहां संबंधित संस्थाओं को साल में उत्सर्जन पैदा करने के बराबर ही सालाना आधार पर अलाउंस या परमिट जारी किया जाता है। जिन कंपनियों ने सीमा से ज्यादा उत्सर्जन किया, उन्हें ज्यादा परमिट खरीदना होता है। लेकिन, अगर कंपनियों ने भविष्य में अपनी उत्सर्जन सीमाओं को नियंत्रण में रखा है तो वह अपनी परमिट आगे भी इस्तेमाल कर सकते हैं।












Click it and Unblock the Notifications