RIP Buta Singh: पंजाब से राजनीति शुरू करने वाले बूटा सिंह को इस वजह से राजस्थान में करनी पड़ी थी एंट्री
Buta Singh Passes Away: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री बूटा सिंह का शनिवार को निधन हो गया। वो उम्र संबंधित कई बीमारियों से परेशान थे। जिस वजह से दिल्ली स्थित एम्स में उनका इलाज चल रहा था, वहीं पर उन्होंने अंतिम सांस ली। बूटा सिंह को गांधी परिवार का काफी करीबी माना जाता था। जिस वजह से उन्होंने बतौर गृह, कृषि, खेल, रेल समेत कई मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली। साथ ही जब-जब बूटा सिंह का राजनीतिक करियर खतरे में पड़ा तो गांधी परिवार उनकी मदद को सामने आया।

ब्लू स्टार के बाद बदले हालात
वैसे तो बूटा सिंह का जन्म पंजाब के जालंधर जिले के मुस्तफापुर गांव में 21 मार्च 1934 को हुआ था। अपने राजनीतिक करियर की शुरूआत भी उन्होंने पंजाब से ही की। इसी बीच 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ऑपरेशन ब्लू स्टार शुरू करवा दिया। इसके बाद उनकी हत्या भी हो गई। पंजाब में हालात अब कांग्रेस के लिए सही नहीं थे। बूटा सिंह को पता था कि सिखों की नाराजगी की वजह से उनका पंजाब से जीतना मुश्किल है।
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राजीव गांधी ने निकाला रास्ता
इंदिरा गांधी के बाद राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बने। बूटा सिंह उनके भी करीबियों में से एक थे। बूटा सिंह को देश में एक ऐसी सुरक्षित सीट की तलाश थी, जहां से वो आसानी से जीत सकें। जब ये बात राजीव गांधी को पता चली तो उन्होंने कांग्रेस के दूसरे नेताओं के साथ बातकर इस मुश्किल का हल निकाला। साथ ही बूटा सिंह को राजस्थान की जालोर-सिरोही सीट से चुनाव लड़वाने का फैसला लिया, जो कांग्रेस का गढ़ कही जाती थी। इससे पहले के चुनाव बूटा सिंह ने पंजाब के रोपड और हरियाणा के साधना सीट से लड़ा था, ऐसे में उनकी एंट्री से सभी हैरान थे।

नहीं छोड़ा राजस्थान का साथ
बूटा सिंह 1984 में चुनाव तो जीत गए लेकिन उसके बाद वो बीजेपी के भंवरजाल में फंस गए, जब 1989 में कैलाश मेघवाल को उनके सामने उतार दिया। मेघवाल की भी राजनीतिक पकड़ उस इलाके में मजबूत थी, ऐसे में उन्होंने कड़ी लड़ाई के बाद बूटा सिंह को मात दे दी। इसके बाद भी बूटा सिंह ने राजस्थान को नहीं छोड़ा। 1991 में जालौर सीट से उन्होंने बाजी मार ली। फिर वो 1999 में सिरोह से सांसदी का चुनाव जीते। इसके बाद धीरे-धीरे बूट सिंह का राजनीतिक करियर खत्म हो रहा था, तो सोनिया गांधी ने उनकी मदद की और उन्हें बिहार का राज्यपाल बनवा दिया।












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