बृजेश से बीजेपी को क्या नफा, बसपा को क्या नुकसान?

लखनऊ। आगरा के कोठी मीना बाजार मैदान में बीते दिनों आयोजित बसपा की रैली में मोहन भागवत के बयान पर पलटवार करते हुए जब मायावती ने कहा कि वो हिंदुओं को ज़्यादा बच्चे पैदा करने को तो कह रहे हैं, लेकिन वो मोदी जी से ये भी कहेंगे कि उनके लिए रोज़ी-रोटी सुनिश्चित कराएं।

आखिर क्यों बसपा छोड़ भाजपा में शामिल हो गये बृजेश पाठक

BSP MP Brajesh Pathak joins BJP, Its Good For Bjp and bad For BSP?

दरअसल इस बयान से माया का मतलब सीधा था....भगवान राम को जिस तरह से उन्होंने अपने मसीहे के सींखचे से बाहर रख कर अंबेडकर को फिट किया उससे सवर्ण वर्ग नाराज था। उन्हें मनाने के लिए माया का यह दांव सोची समझी नीति का नतीजा माना गया। लेकिन बसपा नेता बृजेश पाठक द्वारा पार्टी छोड़ने की सुगबुगाहट के साथ ही माया सारी कोशिशों में विफल साबित हुईं।

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सोची समझी नीति है पलायन!

बृजेश पाठक उन्नाव से बीएसपी के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं और उसके बाद पार्टी ने उन्हें राज्यसभा सदस्य बनाया था। बृजेश के द्वारा पार्टी छोड़ने की अटकलें कुछ नई नहीं थीं। लेकिन क़रीब एक हफ़्ते पहले तक ख़ुद पाठक ने उन अटकलों को आधिकारिक तौर पर ख़ारिज किया था। आगरा में आयोजित बसपा की रैली में बृजेश पाठक उसका हिस्सा भी रहे। लेकिन अचानक भाजपा में पलायन सोची समझी नीति के तहत ही रहे।

सवर्णों में लगातार कमजोर पड़ रही बसपा

सूबे में 18 प्रतिशत सवर्ण मतदाता के बीच 12 प्रतिशत ब्राह्मण वर्ग है। इस वर्ग में बृजेश पाठक की भी अच्छी पैठ मानी जाती है। कहने का आशय यह भी है कि कुछ फीसदी ब्राह्मण वर्ग बृजेश के साथ समर्थन में खड़ा नजर आता है। जिसका मतलब साफ है कि इस वर्ग से माया को हाथ धोना पड़ गया है। और जनाधार भी कमजोर हो गया है। हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि नेताओं के बसपा छोड़ने से पार्टी को ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन यह बात महज एक नेता के द्वारा पार्टी छोड़ने पर लागू होती है। लेकिन इस दफे अलग अलग समुदायों के नेताओं ने बसपा को टाटा-बाय कर लिया है। और पार्टी समुदायों के नेताओं के जरिए ही उन्हें जोड़ने का काम करती रही है।

भाजपा को मिली बढ़त

भाजपा.....जिसमें दलबदलुओं की एंट्री जारी है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के मद्देनजर। दलितों को जोड़ने के लिए भाजपा ने स्वामी कार्ड खेला तो सवर्ण वर्ग भाजपा से थोड़ा दूर-दूर नजर आया। लेकिन पार्टी अंदर ही अंदर अपनी रणनीति के तहत बृजेश पाठक को भी तोड़ने में कामयाब हो गई। और सवर्ण वर्ग की नाराजगी को कुछ फीसदी दूर करने का प्रयास किया। मीडिया के द्वारा हाल ही में किए गए सर्वे की बात हो या फिर निजी तौर पर किए गए तमाम आंकलन की। यह साफ तौर पर देखा जा सकता है कि भाजपा बड़े नेताओं की सेंधमारी कर रही है। जिनका अस्तित्व सीट जिताऊ कैंडिडेट के रूप में माना जाता है। जिसकी वजह से भाजपा तेजी से आगे की ओर बढ़त बना रही है।

दलितों पर फोकस्ड बसपा की राजनीति

बसपा की मौजूदा राजनीति पर गर बात की जाए तो यह साफ तौर पर देखा जा सकता है कि बसपा सुप्रीमो मायावती मुख्य रूप से दलित मतदाताओं पर फोकस्ड हैं। जबकि क्षत्रिय मतदाताओं को उन्होंने दयाशंकर मामले के बाद अपने विपक्ष में खुद ब खुद ही खड़ा कर लिया है, वहीं ब्राह्मण राम के नाम पर उनसे मुंह फेरे हुए हैं।

दलित वोट बैंक एकतरफा माया के खाते में जुड़ेगा?

तो सवाल है कि क्या 21 फीसदी दलित वोट बैंक एकतरफा माया के खाते में जुड़ेगा ? शायद बिलकुल भी नहीं क्योंकि इसमें भाजपा काफी दिनों से दांव खेल रही है। तो बसपा के लिहाज से जीत के आसार क्या हैं? इसका जवाब तो चुनाव परिणाम ही तय कर पाएंगे।

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