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'भारत एक खोज' जैसे धारावाहिकों के दिग्गज संगीतकार वनराज भाटिया का निधन, शोक में डूबा बॉलीवुड

नई दिल्‍ली, 7 मई: कोरोना महामारी में बॉलीवुड की कई जानी मानी हस्तियों ने हमेशा के लिए हमसे जुदा हो गई। वहीं बॉलीवुड से एक और निधन की खबर सामने आई है। जाने-माने संगीतकार पद्म श्री वनराज भाटिया का शुक्रवार को 93 वर्ष की आयु में निधन हो गया। संगीतकार वनराज पिछले कई दिनों से बीमार थी और आर्थिक तंगी से जूझ रहे है।

vanraj

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ महीनों में उनका स्वास्थ्य और बिगड़ गया, और वो अपने घर में ही थे और अंत में शुक्रवार को हमेशा के लिए दुनिया को छोड़ कर चले गए। महान संगीतकार वनराज भाटिया ने 1988 में गोविंद निहलानी की फिल्म तमस और 2012 में पद्म श्री के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीत का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता था।

स्‍मति ईरानी ने दी श्रृद्धांजलि
केंद्रीय कपड़ा मंत्री और पूर्व अभिनेता स्मृति ईरानी ने वनराज भाटिया के निधन पर ट्वीट करते हुए लिखा, "वनराज भाटिया के निधन के बारे में जानकर हैरान हूं। वागले की दुनिया, जाने भी दो यारों समेत कई धारावाहिकों में शानदार संगीत के रूप में वो अपनी यादें हमारे बीच छोड़ गए हैं। ओम शांति।

एक्‍टर फरहान अख्‍तर ने लिखी ये पोस्‍ट
बॉलीवुड एक्‍टर फरहान अख्तर ने लिखा, "आरआईपी हैशटेगवनराज भाटिया, उनके द्वारा बनाए गए कई अन्य शानदार संगीत कार्यों के अलावा, मैं 'तमस' की थीम को विशेष रूप से याद करता हूं, जो पीड़ा से भरी चीख के साथ शुरू हुई. ये किसी को भी आराम पहुंचा सकती है और किसी का भी दिल तोड़ सकती है."

वनराज भाटिया का करियर
बता दें 31 मई, 1927 को मुंबई में जन्मे भाटिया ने लंदन में रॉयल अकादमी ऑफ़ म्यूज़िक और पेरिस कंज़र्वेटरी में पश्चिमी शास्त्रीय संगीत का अध्ययन किया। वह 1959 में भारत लौट आए और दिल्ली विश्वविद्यालय में पश्चिमी संगीतशास्त्र में रीडर के रूप में काम करना शुरू किया। वह भगवद गीता और अनंत जैसे एल्बमों के साथ आध्यात्मिक संगीत के अग्रदूतों में से एक थे। उन्‍होंने 7000 से अधिक विज्ञापन जिंगल दिए। 1972 में, भाटिया ने अपनी पहली श्याम बेनेगल फिल्म, अंकुर के लिए बैगग्राउंड म्‍यूजिक की रचना की।

वनराज भाटिया ने इन फिल्‍मों से बनाई अपनी पहचान
संगीतकार पद्म श्री वनराज भाटिया सत्तर और अस्सी के दशक में कला सिनेमा को नायाब संगीत दिया जो हमेशा लोगों के बीच में लोकप्रिय रहेगा। सत्तर और अस्सी के दशक में 'अंकुर', 'मंथन', 'भूमिका', 'जाने भी दो यारो', 'मोहन जोशी हाजिर हो' और '36 चौरंगी लेन' जैसी फिल्मों के साथ ही टीवी शो 'वागले की दुनिया' और 'बनेगी अपनी बात' से वनराज ने अपनी पहचान बनाई थी लेकिन टेलीविजन के लिए उनकी सबसे प्रतिष्ठित रचनाएँ भारत एक ख़ोज थीं।

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