दिल्ली में जो सीट AAP ने छीनी,वहां BJP उम्मीदवार को एक राउंड में मिले महज 5 वोट
नई दिल्ली-दिल्ली में कई मुस्लिम बहुल सीटों पर इस बार रिकॉर्ड वोटिंग दर्ज की गई है। अब उन सीटों पर वोटिंग पैटर्न को लेकर नए-नए तथ्य सामने आ रहे हैं। हमने भी ऐसी ही कुछ सीटों पर मतगणना की राउंड के हिसाब से विश्लेषण की कोशिश की है, जिसमें हमें कुछ चौंकाने वाले आकड़े मिले हैं। वैसे तो हम ऐसी ज्यादातर सीटों की बात करेंगे, लेकिन हमारा पहला फोकस उत्तर-पूर्वी दिल्ली की मुस्तफाबाद सीट पर होगा। क्योंकि, यह सीट पिछली बार बीजेपी के पास थी, लेकिन इस बार उसपर आम आदमी पार्टी ने कब्जा कर लिया है। आप चौंक जाएंगे कि मुस्तफाबाद समेत कई मुस्लिम बहुल सीटों पर भाजपा को कई राउंड में दहाई अंकों में वोट मिले हैं, लेकिन मुस्तफाबाद में एक राउंड ऐसा भी गुजरा है, जिसमें बीजेपी को सात हजार से ज्यादा डाले गए वोटों में से सिर्फ 5 वोट से ही संतोष करना पड़ा

मुस्लिम बहुल कुछ सीटों पर सबसे ज्यादा वोटिंग
दिल्ली में भाजपा 6 फीसदी से भी ज्यादा वोट शेयर में इजाफे के बाद भी उसे सीटों में उस हिसाब से तब्दील क्यों नहीं कर पाई, इसको लेकर विश्लेषणों का दौर अभी जारी रहेगा। लेकिन, तथ्य ये है कि दिल्ली के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में इस बार अप्रत्याशित मतदान हुआ है। सीलमपुर, मुस्तफाबाद और मटिया महल जैसी सीटों में रिकॉर्ड वोटिंग दर्ज हुई है। सीलमपुर में सबसे ज्यादा 71.4 फीसदी, मुस्तफाबाद में 70.56 फीसदी और पुरानी दिल्ली की मटिया महल सीट पर रिकॉर्ड 70.33 फीसदी वोटिंग हुई है। ये तीनों सीटें उन इलाकों में हैं, जो नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ हिंसक प्रदर्शनों की चपेट में आई थीं। एक तथ्य ये भी है कि मुस्तफाबाद सीट 2015 में भाजपा के खाते में गई थी, लेकिन इसबार वहां झाड़ू चल गई है। दिलचस्प बात ये है कि मुस्तफाबाद सीट पर बीजेपी के सीटिंग उम्मीदवार जगदीश प्रधान मतगणना के 11वें राउंड तक लगातार बढ़त बनाए रहे, लेकिन 12वें राउंड के बाद उनकी कहानी पलटनी शुरू हो गई।

मुस्तफाबाद में 23वें राउंड में भाजपा को मिले सिर्फ 5 वोट
अगर दिल्ली की मुस्लिम बहुल मुस्तफाबाद में हुई मतगणना के हर राउंड के हिसाब से विश्लेषण करें तो अनुमान लगाना मुश्किल नहीं की राजधानी में भाजपा के साथ हुआ क्या है। अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी दिल्ली में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में जो कायापलट का दावा करती है, उसका कोई बहुत बड़ा गवाह कम से कम मुस्तफाबाद इलाके को ठहराना आसान नहीं है। लेकिन, फिर वहां क्या हुआ कि बीजेपी के सीटिंग विधायक जगदीश प्रधान को 11 राउंड तक दो से तीन गुना के अंतर से बढ़त बनाने के बाद 12वें राउंड से एक-एक वोट के लाले पड़ गए। दूसरी तरफ उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी और आम आदमी पार्टी के चुने गए विधायक हाजी यूनुस के लिए वोटों से ईवीएम ठसा-ठस भर दिए गए। जरा गौर फरमाइयेगा। मसलन, 19 वें राउंड में पड़े 8362 वोट में से यूनुस को 7904 वोट मिलते हैं, जबकि प्रधान को महज 36 वोट। लगभग इसी तरह के अंतर के साथ 20वें राउंड में 29, 21वें में 35 और 23वें राउंड में सिर्फ 5 वोट। जबकि, इस राउंड में कुल 7165 वोट डाले गए और हाजी यूनुस के खाते में 6878 वोट गए।

सीलमपुर में भी ऐसे मौके आए
अगर मुस्लिम बहुल सीलमपुर में इस बार की वोटिंग ट्रेंड को देखें तो पहले तीन राउंड तक भाजपा के कौशल कुमार मिश्रा और आम आदमी पार्टी के अब्दुल रहमान में अच्छी टक्कर रही। पांचवें राउंड में तो मिश्रा ने 7764 वोटों में से 4099 वोट पा लिया और 'आप' के विधायक रहमान को सिर्फ 2732 वोटों से ही संतोष करना पड़ा। छठे राउंड से अचानक मुस्तफाबाद वाला हाल होना शुरू हो गया और बीजेपी उम्मीदवार को 8256 वोट में से मजह 60 और 'आप' के प्रत्याशी को 5637 मिले। इसी तरह बीजेपी प्रत्याशी को 8वें में 44, 9वें में 41 वोट मिले। हम यहां बीजेपी को मिले सिर्फ दहाई या एक अंक वाले वोटों का जिक्र कर रहे हैं, तीन अंकों को अपने विश्लेषण में शामिल भी नहीं किया है। सीलमपुर में 10वें राउंड से भाजपा ने अचानक वापसी की और रहमान पर भारी पड़ती दिखी, लेकिन तब तक सीट उसके हाथ से निकल चुकी थी।

शाहीन बाग वाली ओखला सीट पर क्या हुआ?
अलबत्ता ओखला विधानसभा सीट पर इस बार वोटिंग का प्रतिशत घटा है, लेकिन आम आदमी पार्टी के मौजूदा विधायक अमातुल्लाह खान की जीत का अंतर बहुत बड़ा रहा है। यहां भी कम से कम 6 राउंड ऐसे आए जब भाजपा उम्मीदवार ब्रह्म सिंह दहाई अंक में ही सिमट गए, जबकि अमातुल्लाह को इनमें से हर दौर में 7 हजार से 9 हजार के बीच वोट पड़े। छठे राउंड में तो ब्रह्म सिंह को सिर्फ 16 वोट ही मिले, जबकि उसमें 'आप' 7343 वोट मिले। 13वें राउंड में ऐसा भी मौका आया जब दोनों दलों को करीब-करीब बराबर वोट मिले और 17वें राउंड से कहानी बीजेपी के पक्ष में पलट गई, जिसमें वह आप के उम्मीदवार से 3 से 4 हजार वोटों से आगे चली, लेकिन अमानतुल्लाह का वोट किसी भी राउंड में 4 अंकों से नीचे नहीं गिरा। हमने अपने रिसर्च के दौरान ये भी पाया है कि कभी भी ऐसा मौका नहीं आया कि इन मुस्लिम बहुल सीटों पर कभी भी आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार का वोट दहाई अंकों में पहुंचा हो, शायद चार अंकों से कम कभी नहीं।

चांदनी चौक और बल्लीमारान में भी ऐसे मौके आए
दो और ऐसी मुस्लिम बहुल सीटे देखनें को मिली हैं, जहां किसी न किसी राउंड में भाजपा उम्मीदवार को शर्मनाक दहाई अंकों में सिमटना पड़ा। चांदनी चौक में पार्टी प्रत्याशी सुमन कुमार गुप्ता को पहले ही राउंड में सिर्फ 20 वोट मिले, जबकि कुल वोट उस राउंड में 6205 डाले गए। इनमें से 5997 केजरीवाल की पार्टी के प्रत्याशी प्रह्लाद सिंह साहनी के खाते में गए। ऐसे ही बगल की बल्लीमारान सीट पर 8वें राउंड में बीजेपी उम्मीदवार लता को महज 65 वोट हासिल हुए और आम आदमी पार्टी के जीतने वाले उम्मीदवार इमरान हुसैन 6291 वोट लेने में सफल हो गए। इस राउंड में यहां कुल 6800 डाले गए।

भाजपा के खिलाफ हुआ ध्रुवीकरण!
मुस्लिम बहुल सीट होने के बावजूद 2015 में भारतीय जनता पार्टी मुस्तफाबाद जीत गई थी। इस बार आधी मतगणना तक लगा कि वह अपना प्रदर्शन दोहरा लेगी। लेकिन, परिणाम सबके सामने है, आम आदमी पार्टी ने यह सीट बीजेपी से छीन ली है। इसलिए ये कहना कि आम आदमी पार्टी के काम के दावों का बीजेपी मुकाबला नहीं कर सकी, तथ्य को थोड़ा एकतरफा देखना होगा। मुस्लिम बहुल सीटों में भाजपा प्रत्याशियों के खिलाफ हुई जोरदार वोटिंग से यह स्पष्ट लगता है कि केजरीवाल की भारी जीत में उनके काम के नारों के साथ-साथ उसमें धर्म का करामाती तड़का भी लगा है, जिससे बीजेपी वोट बढ़ाकर (राष्ट्रवाद और हिंदुत्व को उठाकर) भी निढाल पड़ी है और कांग्रेस तो सीन से ही गायब हो गई है।
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