जयललिता-करुणानिधि के बिना तमिलनाडु में होने वाले चुनाव में बीजेपी-AIADMK गठबंधन नहीं कर पाएगा कमाल!
नई दिल्ली: भाजपा ने दक्षिण के राज्य तमिनाडु में अन्नाद्रमुक के साथ आगामी लोकसभा चुनाव के लिए गठबंधन कर दिया है। भाजपा 2019 में सत्ता में वापसी के लिए और महागठबंधन से होने वाले नुकसान की भरपाई ऐसे गठबंधनों के जरिए करना चाहती है। भाजपा-अन्नाद्रमुक के बीच सूबे में गठबंधन की उम्मीदें इसलिए थी क्योंकि एआईएडीएमके राज्य में अपनी सरकार को बचाने के लिए मोदी सरकार पर निर्भर है। गौरतलब है कि जयललिता के नेतृत्व में तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक काफी मजबूत स्थिति में था लेकिन उनकी मौत के बाद एआईडीएमके में हालात काफी बदले में और गुटबाजी भी सामने आई है। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि ये गठबंधन 2019 के चुनाव में कैसा प्रदर्शन करेगा।

डीएमके-कांग्रेस के बीच तमिलनाडु में गठबंधन
तमिलनाडु में लोकसभा की 39 सीटें आती हैं। दक्षिण भारत के इस राज्य में द्रमुक(डीएमके) और कांग्रेस के बीच गठबंधन हो चुकी है। इतना ही नहीं डीएमके नेता स्टालिन ने तो प्रधानमंत्री के रूप में राहुल गांधी की 2019 में उम्मीदवारी की घोषणा भी कर दी है। ऐसे में एआईएडीएमके के पास बीजेपी के तौर पर ही विकल्प बचता है। साल 2016 में जयललिता के निधन के बाद एआईएडीएमके में काफी बवाल हुआ था। अन्नाद्रमुक में वो अब वो क्षमता नहीं है जो जयललिता की अगुवाई में थी। जयललिता के नेतृत्व में पार्टी ने 2014 के चुनाव में बेहतरीन प्रदर्शन किया था और 39 में से 37 सीटें जीती थी। विपक्षी पार्टी कांग्रेस के बाद वो तीसरी सबसे बड़ी पार्टी थी जिसके लोकसभा में सबसे ज्यादा सांसद थे। अब सवाल बना हुआ है कि क्या ऐसा प्रदर्शन दोहराया जाएगा।

रजनीकांत का किसी भी पार्टी को समर्थन से इनकार
सुपरस्टार रजनीकांत ने 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ने से इनकार किया है। इसके अलावा उन्होंने घोषणा कि है कि वो किसी भी राजनातिक पार्टी का समर्थन नहीं करेगे। ऐसे में ये स्पष्ट है कि सूबे में आने वाले लोकसभा चुनाव में लड़ाई बीजेपी-एआईएडीएमके और द्रमुक-कांग्रेस गठबंधन के बीच ही होगी। वहीं दूसरी तरफ ये भी समझना होगा कि एआईएडीएमके का टीटीवी दिनाकरन की अगुवाई वाला दूसरा धड़ा, जो कि जयललिता के निधन के बाद अलग हो गया था। उसकी सत्ताधारी पार्टी के साथ जाने की संभावना कम है. क्योंकि दोनों के बीच संबंध काफी तल्ख हो गए हैं और 2019 के आम चुनाव में एआईएडीएमके और टीटीवी दिनाकरन की पार्टी दोनों ही खुद को फिर से स्थापित करने की कोशिश करेंगी। इस परिदृश्य में सूबे में सत्ताधारी पार्टी का वोट बिखर सकता है, तो यह गठबंधन उसके लिए बहुत मुश्किल होगा। वहीं भाजपा, जिसकी तमिलनाडु में कुछ ही जगहों में उपस्थिति है। बीजेपी की विशेष रूप से पश्चिमी कोयम्बटूर और दक्षिण तमिलनाडु में कन्याकुमारी में
आधार है। हालांकि वो इनमें से किसी भी सीट को अपने दम पर नहीं जीत सकती है और उसे जीत के लिए गठबंधन के वोट के ट्रांसफर होने की जरूरत पडे़गी।

बीजेपी ने 2014 में पीएमके-एमडीएमके साथ किया था गठबंधन
साल 2014 का लोकसभा चुनाव भाजपा ने पीएमके और एमडीएमके जैसी क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गठबंधन कर लड़ा था। इस चुनाव में उसे मात्र 5.5 फीसदी वोट और एक सीट पर सफलता मिली थी। वहीं दूसरी तरफ एआईएडीएमके ने अकेले लड़ते हुए 37 सीटें और 44.3 फीसदी वोट हासिल किए थे। गठबंधन के बिना भारतीय जनता पार्टी तमिलनाडु
में कभी भी एक सीट भी नहीं जीत पाई है। भाजपा ने तमिलनाडु में सबसे ज्यादा सीटें साल 1999 के आम चुनाव में जीती थी, तब भाजपा द्रमुक गठबंधन का हिस्सा थी। अन्नाद्रमुक के साथ भाजपा दो बार गठबंधन करके मैदान में उतर चुकी है। साल 1998 में उसने यहां तीन सीटें जीतीं थी और इस गठबंधन में पीएमके जैसी पार्टियां शामिल थीं। इस गठबंधन ने राज्य की 39 सीटों में से 30 सीटें जीतीं थी। इसके बाद जब दूसरी बार भाजपा ने अन्नाद्रमुक के साथ 2004 में गठबंधन किया था, तब इस गठबंधन को मुंह की खानी पड़ी थी। इस गठबंधन को 39 में से एक भी सीट नहीं मिली थी।

जयललिता और करुणानिधि तीन दशक के बाद नहीं लड़ेंगे चुनाव
भाजपा साल 2004 के लोकसभा चुनाव से पहले द्रमुक के साथ गठबंधन से बाहर चली गई थी और इसे राजनीतिक हलकों में एक विनाशकारी गलती के तौर पर देखा गया था। हालांकि अब परिस्थितियां अलग हैं । तमिलनाडु की राजनीति में तीन दशक बाद पहला चुनाव है, जो जयललिता और करुणानिधि के बिना होंगे। इस परिदृश्य में एआईएडीएमके को जयललिता के निधन और सत्ताविरोधी लहर की सामना करना पडे़गा। ये निश्चित है कि इस चुनाव में उसका वोट शेयर गिरेगा। ये तो नहीं कहा जा सकता है कि ये कितना गिरेगा। अगर 2014
की अपेक्षा ये 10 फीसदी गिरा तो तमिलनाडु में पार्टी को बड़ी हार मिल सकती है। दूसरी तरफ 2G स्पेक्ट्रम घोटाले के पृष्ठभूमि में हुए चुनाव में डीएमके ने 2014 में सबसे खराब प्रदर्शन किया था। उस चुनाव में कांग्रेस से अलग लड़ी थी। डीएमके और कांग्रेस से उम्मीद है कि वो अपने पतन से उभरें और साल 2009 के वोट शेयर, जो लगभग 44 प्रतिशत हासिल करने की कोशिश करें। अगर ऐसा होता है, तो यह अन्नाद्रमुक और भाजपा के लिए मुसीबतें खड़ी करेगा।












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