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Bihar Election 2025: EBC का समर्थन तय करेगा बिहार की सत्ता का रास्ता, 36% आबादी, 112 जातियां

Bihar Election 2025: बिहार में साल के आखिर में विधानसभा होने हैं। बिहार की राजनीति में 'जाति' कितना बड़ा फैक्टर है, ये वहां की राजनीति में दिलचस्पी रखने वाला हर कोई जानता है। चुनाव के नजदीक आते ही सभी रादनीतिक दलों की नजर एक बार फिर से उस सामाजिक वर्ग पर टिकी है जो हर बार सत्ता की चाबी साबित होता है....ये समाजिक वर्ग है ''अत्यंत पिछड़ा वर्ग'' यानी EBC (Extremely Backward Classes)

बिहार की राजनीति में अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) एक बहुत अहम हिस्सा रहा है। राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग 36% हिस्सा EBC समुदायों से आता है और इनकी कुल जातियों की संख्या 112 है। यही वजह है कि सभी प्रमुख पार्टियां अब EBC वोट बैंक को साधने में जुट गई हैं। बिहार में अक्टूबर-नवंबर में होने वाले चुनावों के साथ भाजपा, जेडीयू, कांग्रेस और राजद ईबीसी को वोटबैंक के रूप में बढ़ावा दे रहे हैं। बिहार की राजनीति में उनका कितना प्रभाव है...और कैसे वो चुनाव में किंगमेकर बनेंगे...आइए इनके फैक्टर को समझने की कोशिश करते हैं। उससे पहले ये जानते हैं कि आखिर ईबीसी क्या है?

Bihar Election 2025

🔴 What is EBC: अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) क्या है?

अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) में, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से वंचित जातियों के लोग आते हैं, जो सामान्य अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की तुलना में अधिक हाशिए पर हैं। ईबीसी के पास अक्सर शिक्षा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आर्थिक अवसर और बुनियादी सामाजिक सेवाओं तक पहुंच की कमी होती है। हालांकि ईबीसी एससी या एसटी की तरह एक अलग कैटेगरी नहीं है। वे आम तौर पर ओबीसी कैटेगरी के भीतर एक उप-समूह हैं, जो ओबीसी के बीच सबसे वंचित जातियों की पहचान करने के लिए बनाए गए हैं।

नीतीश सरकार द्वारा गठित महादलित आयोग की रिपोर्ट और अन्य सामाजिक रिसर्च से पता चलता है कि बिहार की कुल आबादी का लगभग 36 प्रतिशत हिस्सा EBC से आता है। यह वर्ग 112 जातियों में बंटा हुआ है, जिनमें से कई जातियां बेहद सीमित संख्या में हैं, लेकिन मिलकर एक बड़ा वोट बैंक बनाती हैं।

🔴 बिहार में कैसे हुई EBC की शुरुआत? पढ़ें इतिहास

बिहार में ईबीसी का जन्म 50 साल से भी पहले हुआ था, उस वक्त तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर थे। कर्पूरी ठाकुर भी एक अत्यंत पिछड़े समुदाय से थे। कर्पूरी ठाकुर ने बिहार में पिछड़ी जातियों की आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक, व्यावसायिक और सरकारी क्षेत्र में भागीदारी को देखते हुए 1971 में 'मुंगेरीलाल आयोग' का गठन किया था। आयोग ने फरवरी 1976 में अपनी रिपोर्ट पेश की। लेकिन जब तक रिपोर्ट आई, बिहार के मुख्यमंत्री कांग्रेस के जगन्नाथ मिश्रा बन चुके थे और उन्होंने उस रिपोर्ट को नजरअंदाज कर दिया और कोई कार्रवाई नहीं की।

'मुंगेरीलाल आयोग' ने अपनी रिपोर्ट में 128 जातियों को आर्थिक, सामाजिक, व्यावसायिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ बताया था। उस वक्त इन जातियों को दो कैटेगरी में बांटा गया था, 34 जातियों को पिछड़ा वर्ग कैटेगरी (OBC) में और 94 जातियों को अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) कैटेगरी में रखा गया था।

जब कर्पूरी ठाकुर 1977 में दूसरी बार मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने 1978 में 'मुंगेरीलाल' आयोग की सिफारिशों को लागू करने की योजना की घोषणा की। सिफारिशों में पिछड़े वर्गों के लिए 8% आरक्षण, अत्यंत पिछड़े वर्गों के लिए 12%, सभी जातियों की महिलाओं के लिए 3% और आर्थिक रूप से पिछड़ी जातियों के लिए 3% आरक्षण शामिल था। हालांकि, बाद में आर्थिक स्थिति के आधार पर आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक घोषित कर दिया था।

1990 के दशक में, जब मंडल आयोग की सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय स्तर पर ओबीसी के लिए 27% आरक्षण दिया गया तो जाति-आधारित सकारात्मक कार्रवाई पर बिहार की सरकार का फिर ध्यान गया। बिहार में मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव (1990-1997) के तहत, ओबीसी के लिए आरक्षण 12% से बढ़ाकर 14% कर दिया गया था, लेकिन इस समय पूरी तरह से आर्थिक ईबीसी श्रेणी का कोई जिक्र नहीं किया गया था। 2019 में, 103वें संविधान संशोधन के तहत, एससी/एसटी/ओबीसी कोटा के तहत नहीं आने वालों के लिए पूरे भारत में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के लिए 10% आरक्षण शुरू किया गया था।

🔴 EBC Bihar Castes Classified : बिहार में ईबीसी की कौन-कौन सी जातियां?

बिहार सरकार ने 2 अक्टूबर 2023 को राज्य के जाति-आधारित सर्वेक्षण के परिणाम जारी किए थे, जिसमें कहा गया कि बिहार की कुल आबादी का 36% ईबीसी कैटेगरी से है और इसमें कुल 112 जातियां शामिल हैं।

ईबीसी में चार जातियां- तेली, मल्लाह, कानू और धानुक की आबादी 2% से ज्यादा है। मुस्लिम जातियों में, जुलाहा एकमात्र ऐसी जाति है, जिसकी आबादी 3.5% है। सात अन्य जातियां नोनिया, चंद्रवंशी, नाई, बरहाई, धुनिया (मुस्लिम), कुम्हार और कुंजरा (मुस्लिम), इन सभी जातियों की जनसंख्या 2% से कम है। इन 12 के अलावा शेष 100 ईबीसी जातियों में से किसी की भी कुल जनसंख्या में 1% से ज्यादा नहीं है।

असल में आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव ही थे, जिन्होंने सबसे पहले ईबीसी के महत्व को महसूस किया क्योंकि उनकी संचयी संख्या यादवों (जाति जनगणना के अनुसार जनसंख्या का 14.27%) और मुसलमानों (लगभग 17%) जैसे किसी भी व्यक्तिगत प्रमुख समूह की तुलना में बहुत अधिक है।

नोट: बिहार में जातियों की संख्या कितनी है, इसकी पूरी जानकारी आप नीचे दिए गए लिंक पर जाकर देख सकते हैं (ये बिहार जातिगत सर्वेक्षण के आंकड़े हैं। हालांकि इसकी विश्वसनीयता पर कई सवाल भी उठाए गए हैं। )

https://drive.google.com/file/d/11t7MY9aeVcWXzdhQ-RY3KANieRvTGBXC/view?usp=sharing

🔴 EBC का राजनीतिक महत्व क्यों है? कौन सी पार्टी को कितना सपोर्ट

चूंकि EBC हर विधानसभा क्षेत्र में मौजूद हैं, इनका वोट पूरे राज्य में प्रभाव डालता है। कई सीटों पर इनका मत प्रतिशत 40% से भी अधिक है, जिससे वे सीधे तौर पर नतीजों प्रभावित कर सकते हैं। हाल के चुनावों में यह देखा गया है कि EBC समुदाय अक्सर किसी एक पार्टी की ओर झुकाव दिखाते हैं। अगर कोई दल EBC वर्ग को एकजुट कर लेता है, तो चुनावी गणित काफी हद तक तय हो जाता है।

EBC न तो पूरी तरह से OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) में आते हैं और न ही दलित वर्ग में। ये दोनों वर्गों के बीच की राजनीतिक और सामाजिक कड़ी हैं। इसलिए इन पर पकड़ बनाना दलों के लिए सामूहिक समर्थन जुटाने का रास्ता बन जाता है।

जनता दल (यूनाइटेड) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की गठबंधन सरकार ने EBC के लिए कई योजनाएं चलाई हैं। नीतीश कुमार ने EBC के लिए अलग से 'अत्यंत पिछड़ा वर्ग आयोग' की स्थापना की थी, जिसे इस वर्ग से उन्हें मजबूत समर्थन मिला है।

वहीं राजद ने भी EBC में अपना जनाधार बढ़ाने की लगातार कोशिशें की हैं। हाल के स्थानीय निकाय चुनावों में EBC वर्ग का झुकाव कई जगहों पर राजद की ओर भी देखा गया है, खासकर युवाओं में।

जदयू और बीजेपी फिर से EBC वर्ग को अपनी ओर खींचने के लिए आर्थिक और शैक्षणिक योजनाओं पर जोर दे रहे हैं। वहीं राजद और कांग्रेस इस वर्ग को आरक्षण और सामाजिक सम्मान के मुद्दों पर साधने की कोशिश कर रहे हैं।

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