मोदी के मंत्रिमंडल में शामिल ना होकर नीतीश ने चली बड़ी चाल
पटना। नीतीश कुमार ने 2020 के चुनावी चौसर पर बहुत पहले चाल चल दी। मोदी मंत्रिपरिषद में शामिल नहीं होने का फैसला, उनकी दूरगामी रणनीति का हिस्सा है। लोकसभा के चुनाव में उनका मकसद पूरा हो चुका है। वे 2 से 16 पर पहुंच गये हैं। अब बिहार विधानसभा चुनाव उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। लोकसभा चुनाव में नीतीश ने अत्यंत पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदाय पर खास फोकस किया था। इसका उन्हें जबर्दस्त फायदा मिला। लोकसभा चुनाव में कामयाबी के बाद नीतीश इस जिताऊ सामाजिक समीकरण को कायम रखना चाहते हैं। लेकिन जब उन्हें लगा कि मोदी कैबिनेट में अत्यंत पिछड़े सांसदों का प्रतिनिधित्व नहीं हो सकेगा तो उन्होंने मंत्रिपरिषद में शामिल होने से इंकार कर दिया। इसके अलावा नीतीश कुमार यह भी बताना चाहते हैं कि बिहार चुनाव में जदयू ही बड़े भाई की भूमिका में होगा। चूंकि भाजपा ने अधिक सीटीं जीती हैं इस लिए नीतीश ने अभी से दबाव बनाना शुरू कर दिया है। जदयू नेता केसी त्यागी ने कहा भी है कैबिनेट प्रकरण का असर 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव पर पड़ेगा।

वोट बैंक कायम रखने की चिंता
2019 के लोकसभा चुनाव में नीतीश ने पिछड़ा और अत्यंत पिछड़ा वर्ग पर सबसे अधिक भरोसा किया था। 17 में से केवल दो सीट ही ऊंची जाति को दिये थे। 15 में पांच उम्मीदवार अत्यंत पिछड़ी जाति के थे। बिहार में पहली बार इस समुदाय के इतने सांसद चुने गये हैं। अत्यंत पिछड़े वर्ग ( कानू, कुम्हार, कहार, धानुक, माली, नोनिया आदि) में करीब सौ से अधिक जातियां हैं जो अब तक चुनावी राजनीति में हाशिये पर थीं। अनुमान के आधार पर इनका सम्मिलित वोट यादवों, कुर्मियों से अधिक है। नीतीश पिछले कई साल इनको एकजुट करने की कोशिश करते रहे हैं। जब नीतीश ने इस समुदाय के पांच उम्मीदवारों को टिकट दिया तो अत्यंत पिछड़ी जातियों ने थोक भाव में उनको वोट दिये। इसी नीति के तहत नीतीश ने यादव और भूमिहार बहुल जहानाबाद की सीट पर चंद्रेश्वर चंद्रवंशी को टिकट दिया था जो जीते भी। झंझारपुर से रामप्रीत मंडल भी ऐसे ही उम्मीदवार थे। चुनाव में जीत के बाद अब नीतीश की जिम्मेवारी थी कि इनके हितों की रक्षा करें।

क्या थी अड़चन ?
नीतीश कुमार ने अमित शाह को 2+1 का फारमूला दिया था। दो कैबिनेट और एक राज्य मंत्री। जदयू भूमिहार समुदाय के ललन सिंह और कुर्मी समुदाय के आरसीपी सिंह को कैबिनेट और संतोष कुशवाहा को राज्यमंत्री बनाना चाहता था। लेकिन अमित शाह ने इस पर असमर्थता जता दी। फिर जदयू की तरफ से 1+2 का फारमूला दिया। यानी एक कैबिनेट और दो राज्यमंत्री। नीतीश, अत्यंत पिछड़ा समुदाय के एक सांसद को जरूर मंत्री बनाना चाहते थे। लेकिन भाजपा केवल एक पद देने पर रजामंद थी। नीतीश के सामने धर्मसंकट था कि किसे मंत्री बनायें और किसी नहीं। अगर अपने खासमखास और कुर्मी समुदाय से आने वाले आरसीपी सिंह को मंत्री बनाते हैं तो अत्यंत पिछड़ी जातियों में असंतोष हो सकता है। अगर किसी एक अत्यंत पिछड़े सांसद को मंत्री बनाते हैं तो कुर्मी और सवर्ण नाराज हो सकते हैं। ऐसे में नीतीश ने सोचा कि मंत्रिपरिषद से ही किनारा करना ही बेहतर है। ऐसे में कम से कम किसी को जवाब तो नहीं देना पड़ेगा। मंत्री पद नहीं लेने के फैसले को जदयू त्याग के रूप में दिखाया ताकि समर्पित वोटरों में अच्छा संदेश जा सके। इस तरह नीतीश ने अपने वोट बैंक को एकजुट रखने के लिए एक मंत्री पद लेने से इंकार कर दिया।

भाजपा को काबू में रखने की मंशा
2019 के चुनाव में भाजपा ने बिहार में सभी 17 सीटों पर जीत हासिल कर शत प्रतिशत कामयाबी हासिल की है। जब कि जदयू को 16 सीटें मिली हैं। केन्द्र में भी भाजपा ने अपने बल पर पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया है। बिहार चुनाव में ताकवर भाजपा कहीं बड़े भाई की भूमिका में न आ जाए, इस लिए नीतीश ने अभी से दबाव बनाना शुरू कर दिया है। इसी के तहत कैबिनेट के मसले पर समझौता नहीं किया गया और खुल कर नाराजगी दिखायी गयी। बिहार एनडीए में नीतीश अपना प्रभुत्व बनाये रखना चाहते हैं। जमीनी हकीकत भी यही है कि नीतीश बिहार में सबसे बड़ा चुनावी चेहरा हैं। बिहार में लालू, नीतीश और भाजपा राजनीति के तीन ध्रुव हैं। दो ध्रुव जिधर रहेंगे, सत्ता उसी की बनेगी। बिहार में नीतीश, भाजपा की मजबूरी हैं। जदयू लोकसभा चुनाव में इस मजबूरी का फायदा उठा चुका है। भाजपा को अपनी पांच जीती हुई सीटें जदयू के लिए छोड़नी पड़ी। 2 सीटों वाले जदयू को 17 सीटें देनी पड़ी। अगर बिहार में भाजपा को सत्ता में रहना है तो उसे नीतीश की बात माननी होगी। नीतीश ने कैबिनेट विवाद को अभी बहुत बड़ा मुद्दा नहीं बनाया है। उन्हें भरोसा है कि केन्द्र सरकार जल्द ही कोई बीच का रास्ता निकाल लेगी। नीतीश ने दो कदम आगे जाने के लिए एक कदम पीछे हटाया है।
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