Bhimrao Ambedkar: दो दिनों तक किसी ने खाना नहीं दिया, छुआछूत का भयंकर दंश झेला, फिर भारत रत्न बने बाबा साहेब
Bhimrao Ambedkar के जीवन में एक ऐसा दिन भी आया जब दो दिनों तक उन्हें किसी ने खाना देना भी मुनासिब नहीं समझा। छुआछूत का भयंकर दंश झेलकर कैसे बाबा साहेब भारत रत्न बने। जानिए भीमराव की लाइफ की प्रेरक कहानी

आजाद हिंदुस्तान में कई ऐसे वाकये हुए हैं, जिनसे गुजरते हुए देश आजादी के 75 साल पूरे कर चुका है। कई ऐसी हस्तियां भी हुई हैं, जिनका अभूतपूर्व योगदान देश के शिल्पकारों के रूप में भी रहा है। इन्हीं में एक हैं बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर।
इतिहास में भारत में कई ऐसी कुरीतियां रही हैं, जिन्हें शर्मनाक कहने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए। बाबा साहेब के निधन के दशकों बाद उनका जिक्र इसलिए क्योंकि ये कहानी कुरीति के भुक्तभोगी बाबा साहेब की है।
इंसानियत की बात करने वाले लोग अक्सर ह्यूमन राइट्स की बातें भी करते हैं। एक कड़वी हकीकत ये भी है कि देश के बड़े हिस्से में भोजन देने तक में जाति का बोलबाला था। इसी दौर में अंबेडकर ने एक ऐसा समय देखा जब उन्हें दो दिनों तक भूखा रहना पड़ा।
दरअसल, छुआछूत का कैसा प्रभाव था इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महाड रोड के बगल से बहने वाली नदी उफान पर थी। बाढ़ के कारण दोनों किनारों का संपर्क कट गया। दो दिनों तक बाढ़ का पानी नहीं उतरा और भीमराव को दो दिनों तक भूखा रहना पड़ा।
अछूत माने जाने वाले लोगों की बस्ती में रहने के कारण भीमराव को सोशल बॉयकॉट के कारण किसी ने भी खाना देना मुनासिब नहीं समझा। उस समय कोई भी अछूत माने जाने वाले शख्स को खाना खिलाने की जहमत नहीं उठाता था।
खास बात ये कि डॉ सविता की आत्मकथा मराठी भाषा में 1990 में प्रकाशित हुई। करीब 50 साल से अंग्रेजी पढ़ा रहे नदीम खान को जब इस किताब की जानकारी मिली तो उन्होंने इसे अंग्रेजी में ट्रांसलेट करने का फैसला लिया।
नदीम दर्जनभर से अधिक मराठी किताबों का अनुवाद कर चुके हैं। इस किताब में सविता के हवाले से लिखी एक बात भीमराव अंबेडकर के प्रति उनकी चिंता और केयर के बारे में बताती है।
बकौल सविता, उनकी नई किताब रिडल्स इन हिन्दुइज्म' उनकी सुरक्षा को खतरे में डाल सकती है। ऐसे में बहुत जरूरी है कि ईमानदार, बुद्धिमान और समर्पित शख्स भीमराव के साथ रहे।












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