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'हमारी आंखों के सामने लड़कियां गिरी, हमें लौटने की इजाजत नहीं', बेंगलुरु भगदड़ में फंसे लोगों का आंखों देखी

Bengaluru Stampede News: रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु (RCB) के IPL जीत के बाद बेंगलुरु का एम चिन्नास्वामी स्टेडियम जश्न का रंगमंच बनना था, लेकिन 4 जून को यहां जो हुआ, उसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। एक चूक ने जश्न को मातम में बदल दिया। एक पल में तालियां थीं, अगले ही पल चीखें।

जब विराट कोहली और उनकी टीम को सम्मान देने के लिए हजारों फैंस स्टेडियम की ओर उमड़े, तो किसी को अंदाजा नहीं था कि ये जीत इतनी भारी पड़ जाएगी। ANI के मुताबिक, भीड़ के दबाव से भगदड़ मची, जिसमें 11 लोगों की मौत हो गई और 40 से ज्यादा घायल हो गए।

RCB victory celebration

'हम वापस जाना चाहते थे, लेकिन...'

भीड़ उमड़ पड़ी थी। स्टेडियम के गेट पर हर कोई विराट कोहली की एक झलक पाने को बेताब था। स्टेडियम के बाहर खड़े एक फैन ने कहा - 'अंदर सीटें फुल थीं, पुलिस न तो अंदर जाने दे रही थी, न बाहर निकलने की इजाज़त। गेट पर भीड़ थी, अगर खुलते तो सैलाब अंदर घुस पड़ता।' भगदड़ से ठीक पहले एक बच्चा भी बेहोश हो गया, लेकिन अफरातफरी में किसी को उसकी सुध नहीं थी।

11 की मौत, 40 घायल-RCB की जीत का कड़वा सच

एक बच्चे के बेहोश होने की खबर पहले आई और फिर भगदड़ की। लोग गिरते गए, चीखते गए-लेकिन किसी की सुनवाई नहीं हुई। एक चश्मदीद ने बताया कि एक लड़की उसके सामने गिरी, लेकिन इतनी भीड़ थी कि कोई उसे उठाने तक नहीं आ सका। यह हादसा उस वक्त हुआ जब टीम का विधानसभा में सम्मान चल रहा था, और स्टेडियम में एक और कार्यक्रम की तैयारी हो रही थी।

राजनीति गरमाई, संवेदनाएं ठंडी पड़ीं

कर्नाटक के डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार ने घटना को 'दुखद' बताया और कहा-'गर्व होना चाहिए, लेकिन जान से बड़ा कुछ नहीं।' BCCI ने मृतकों और घायलों के लिए सहायता का वादा किया। लेकिन विपक्ष ने सरकार पर आरोप लगाया कि बिना तैयारी के रैली की गई, जिससे यह त्रासदी हुई।

क्या इस जश्न की कोई तैयारी नहीं थी?

पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी (हरदनहल्ली देवगौड़ा कुमारस्वामी) ने भी सवाल उठाए - 'बिना प्लानिंग, बिना गाइडलाइंस, लाखों की भीड़ को कैसे संभालोगे?' क्या यह जीत इतनी भारी थी कि प्रशासन उसकी जिम्मेदारी नहीं उठा सका?

क्या जश्न इतना जरूरी था?

IPL ट्रॉफी जीतना RCB के लिए एक सपना था। लेकिन इस सपने की कीमत 11 घरों ने अपनी खुशियां खोकर चुकाई है। क्या इस जश्न को और सुरक्षित, और सुव्यवस्थित तरीके से नहीं मनाया जा सकता था? क्या शोहरत की चमक में मानवता की बुनियादी जिम्मेदारियां धुंधली पड़ गईं? आज बेंगलुरु में जश्न नहीं, सन्नाटा है। और हर वो आंख जो RCB के लिए चमक रही थी, अब सवाल कर रही है - 'क्या इस खुशी की कीमत हमारी जान थी?'

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