Bengal election:क्या मिथुन चक्रवर्ती खोल पाएंगे BJP की किस्मत का ताला ?

कोलकाता: बंगाल में ममता बनर्जी के बंगाली बनाम बाहरी एजेंडे की काट के लिए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के शब्दों में भाजपा को भी एक 'धरतीपुत्र' की जरूरत थी, जो कि मुख्यमंत्री की लोकप्रियता के मुकाबले प्रदेश की जमीन पर ठहर सके। टीएमसी बीजेपी पर यही तंज भी कसती थी कि उसके पास उनकी सुप्रीमो की तरह का कोई चेहरा नहीं है। रविवार को कोलकाता के मशबूर ब्रिगेड ग्राउंड में भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और वहां मौजूद समर्थकों के सैलाब को लगा कि मिथुन चक्रवर्ती के रूप में उन्हें बंगाल का वह 'धरतीपुत्र' मिल गया है। यह प्रदेश का वो चेहरा है जो बॉलीवुड की स्क्रीन पर भी अपनी माटी का छाप छोड़ चुका है और राज्य के लोगों के दिलों में भी अपने लिए जगह कायम किए हुए है। हालांकि, बीजेपी ने उन्हें मुख्यमंत्री का उम्मीदवार तो नहीं बनाया है, लेकिन पार्टी को लगता है कि सत्ताधारी पार्टी के सामने उसे जो सबसे बड़ी कमी खल रही थी, वह अब दूर हो सकती है। खुद मिथुन दा ने भी 10 मिनट के भाषण में ही जो टोन सेट किया है, उससे पार्टी के रणनीतिकारों के हौसले बुलंद लग रहे हैं।

मिथुन के रूप में भाजपा को मिला ममता के हर सवाल का जवाब ?

मिथुन के रूप में भाजपा को मिला ममता के हर सवाल का जवाब ?

रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंच पर पहुंचने से कुछ समय पहले जब बीजेपी की ओर से औपचारिक तौर पर मिथुन के पार्टी में शामिल होने की घोषणा की गई, उस समय ग्राउंड में मोदी को सुनने आई भीड़ का उत्साह लगभग उसी मुताबिक था, जिसका पार्टी के नेताओं को भरोसा था। 70 वर्षीय मिथुन जैसे ही मंच पर पहुंचे, उनकी एक झलक पाने के लिए दर्शक उतावले हो उठे। वो उसी बंगाली गेटअप में पहुंचे थे, जिसकी भाजपा को बहुत ज्यादा दरकार थी। माना जा रहा है कि चक्रवर्ती बीजेपी पर ममता और उनकी पार्टी की ओर से लगाए जाने वाले तमाम आरोपों के एकमात्र जवाब बनकर उभर सकते हैं। वह जिस बंगाली बनाम बाहरी की बात करती हैं, बंगाली संस्कृति की दुहाई देती हैं और जिस बंगाली लोकाचार की चर्चा करती हैं, भाजपा के नजरिए से मिथुन दा वो सब पूरा कर सकते हैं।

ममता की सादगी वाली राजनीति के लिए सही जवाब हो सकते हैं मिथुन

ममता की सादगी वाली राजनीति के लिए सही जवाब हो सकते हैं मिथुन

उनके बीजेपी में शामिल होने से भले ही वहां पार्टी की जीत सुनिश्चित ना भी हो रही हो, लेकिन इतना तो तय हो गया है कि अगर अब टीएमसी सुप्रीमो फ्रंट फुट पर खेलने की कोशिश करेंगी तो उन्हें बांग्ला जुबान में ही गुगली झेलने के लिए भी तैयार रहना होगा। क्योंकि, अगर वो मास लीडर हैं, तो मिथुन ने पांच दशकों में समाज के हर वर्ग में अपना एक फैन फॉलोइंग खड़ा किया है। अगर मुख्यमंत्री ने अपनी सादगी के दम पर एक खास जनाधार कायम किया है तो मिथुन दा सही मायने में रियल से लेकर रील तक में उसे जीया है और जीकर दिखाया भी है। वो आज भी उत्तर कोलकाता के साधारण से घर में अपने जन्म की बात गर्व से बताते हैं। भगवा ध्वज थामते ही उन्होंने दीदी का नाम लिए बिना उनपर ऐसी जगह चोट करना शुरू किया है, जिसे वो चुनावों के दौरान शायद ही नजरअंदाज कर पाएंगी। मसलन, मिथुन ने कहा,'हम ऐसी जगह में रहते थे कि एड्रेस में लिखना पड़ता था कि जोराबगान पुलिस स्टेशन के पीछे, ताकि पोस्टमैन को हमारा घर खोजने में कोई दिक्कत ना हो।' हवाई चप्पल पहनकर राजनीति करने वाली टीएमसी चीफ को इस सुपर स्टार का चुनावी तंज बहुत बड़ा झटका दे सकता है।

'मिथुनदा' खोल पाएंगे भाजपा की किस्मत का ताला ?

'मिथुनदा' खोल पाएंगे भाजपा की किस्मत का ताला ?

यही वजह है कि 2014 में उन्हें राज्यसभा भेजने वाली तृणमूल कांग्रेस की नजर में अब मिथुन का कोई सियासी वजूद नहीं रह गया है। पार्टी सांसद सौगत रॉय ने ब्रिगेड रैली में उनके कोबरा सांप वाले बयान (मैं असल कोबरा हूं...एक ही दंश में काम तमाम कर दूंगा) के बाद कहा कि, 'लोगों में उनकी कोई विश्वसनीयता, कोई सम्मान और कोई प्रभाव नहीं बचा था।' लेकिन, भगवा कैंप का नजरिया पूरी तरह से अलग है। पार्टी के एक नेता ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा है, 'वह ऐसी भाषा में बात करते हैं, जो लोग आसानी से समझ सकते हैं। बिना ज्यादा राजनीतिक हुए, उन्होंने ऐसा सियासी संदेश दिया है, जिसे ना तो नजरअंदाज किया जा सकता है और ना ही उसका जवाब दिया सकता है।' उनके मुताबिक,'मिथुनादा अब हमारे साथ हैं, बंगाल का एक कामयाब बेटा, जिसने राज्य और देश को गौरवांवित किया है....बीजेपी सभी तरह के संकीर्ण प्रांतीय और विभाजनकारी बातों पर विराम लगा देगी, जिसपर तृणमूल कांग्रेस अबतक खेल रही है।'

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