2024 से पहले I.N.D.I.A.का विधानसभा चुनावों में होगा लिटमस टेस्ट, कितना बड़ा दिल दिखा पाएगी कांग्रेस?
28 विपक्षी दलों के इंडिया (इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव एलायंस) ब्लॉक की पहली परीक्षा नवंबर में होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में ही होने वाली है। इस पांच राज्यों में दो- राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकारें हैं और वह वहां अपनी सरकारें बचाने की कोशिश कर रही है।
मध्य प्रदेश, तेलंगाना और मिजोरम में पार्टी मौजूदा सत्ताधारी दलों को चुनावों में हराकर वापस गद्दी हथियाना चाहती है। इस तरह से देखें तो इंडिया ब्लॉक में इन पांचों राज्यों में सिर्फ कांग्रेस की ही हार-जीत तय होनी है; और इसके अलावा इसकी किसी भी सहयोगी पार्टियों का बड़ा दांव इन राज्यों में नहीं लगा हुआ है।

कांग्रेस पर इंडिया ब्लॉक में एकता का संदेश देने की जिम्मेदारी
लेकिन, तथ्य यह है कि इंडिया ब्लॉक में शामिल कुछ दलों, जैसे कि समाजवादी पार्टी, सीपीआई, सीपीएम और यहां तक कि आम आदमी पार्टी भी इन पांच राज्यों में सेकुछ राज्यों में भाग्य आजमाना चाहती हैं। ऐसे में इंडिया ब्लॉक की सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते कांग्रेस की जिम्मेदारी बढ़ गई है कि वह 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले किस तरह से गठबंधन में एकता का संदेश वोटरों को दे पाती है।
सीटों पर तालमेल को लेकर बातचीत के मिल रहे हैं संकेत
इनमें से सपा और आम आदमी पार्टी राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में चुनावी किस्मत आजमाना चाहती हैं, तो सीपीआई-सीपीएम की इनके अलावा तेलंगाना की भी कुछ सीटों पर नजरें अटकी हुई हैं। कांग्रेस के साथ इंडिया ब्लॉक के इन दलों की अंदर ही अंदर सीटों पर आपसी तालमेल के लिए कुछ न कुछ बातचीत जरूर चल रही है, जिसका संकेत सोमवार को दिल्ली के सीएम और एएपी के संयोजक अरविंद केजरीवाल खुद दे चुके हैं।
सहयोगियों के लिए कुछ सीटें छोड़ सकती है कांग्रेस
केजरीवाल ने विधानसभा चुनाव में इंडिया ब्लॉक के इकट्ठे लड़ने के सवाल पर कहा था कि 'जो भी होगा, उसकी जानकारी दी जाएगी।' जानकारी के मुताबिक सीपीएम-सीपीआई 'गठबंधन धर्म' के तहत तेलंगाना, एमपी, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कुछ सीटों की उम्मीद कर रही हैं। सूत्रों का कहना है कि इनमें से तेलंगाना में बात काफी आगे बढ़ चुकी है और संभावना है कि कांग्रेस इन दोनों पार्टियों के लिए दो-दो सीटें छोड़ने का फैसला ले।
सपा की एमपी में मजबूत दावेदारी
इसी तरह से सपा की दावेदारी मध्य प्रदेश में ज्यादा बनती है। 2018 के चुनाव में वह राज्य में 1 सीट जीती थी और 5 पर बीजेपी के बाद दूसरे नंबर पर रही थी। माना जा रहा है कि पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव इस बार भी 20 सीटों पर टिकट देने की सोच रहे हैं। इनकी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने टीओआई से बातचीत में बताया है कि, 'एमपी में सीट-बंटवारे को लेकर हमारा दावा हमारी पिछली परफॉर्मेंस के आधार पर वास्तविकता से पैदा हुआ है। हालांकि, हम इस तरह की कोई मांग नहीं रखेंगे, जिससे इंडिया पार्टियों के आपस में आना किसी तरह से प्रभावित हो।'
सभी दल अलग-अलग इरादे से लड़ेंगे चुनाव
विधानसभा चुनावों में इंडिया ब्लॉक की इन पार्टियों का उतरना, अपने-अपने राजनीतिक मकसद पूरा करने के लिए है। जैसे सीपीआई से राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा छिन छुका है और वह उसे पाने के लिए अब काफी परेशान है। अभी कांग्रेस और भाजपा के अलावा सीपीएम, बीएसपी और एएपी को ही नेशनल पार्टी का दर्जा हासिल है।
देश में सीपीएम का ग्राफ भी तेजी से नीचे गिरता जा रहा है और ले-देकर केरल ने ही उसकी सियासी हैसियत बनाए रखा है। वहीं आम आदमी पार्टी बीजेपी, कांग्रेस के बाद खुद को पैन-इंडिया पार्टी के तौर पर स्थापित करने में जुटी हुई है। जबकि, समाजवादी पार्टी लंबे समय से हिंदी भाषी राज्यों में अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी रही है। इन सभी दलों को अभी उम्मीद है कि इन पांचों राज्यों में कांग्रेस के एक प्रमुख दल के रूप में चुनाव लड़ने का फायदा सीटों पर तालमेल हो जाने पर उन्हें भी मिल सकता है।
कांग्रेस के सामने दो बड़े सवाल
अब गेंद कांग्रेस के पाले में है, जिसके सामने दो बड़े सवाल हैं। एक तो इंडिया ब्लॉक में राहुल गांधी के नेतृत्व की दावेदारी मजबूत करने के लिए उसे इन पांचों राज्यों में बेहतरीन प्रदर्शन करना होगा यानी ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतकर दिखाना पड़ेगा।
दूसरा लोकसभा चुनावों से पहले हर हाल में विधानसभा चुनावों में इंडिया ब्लॉक के जूनियर पार्टनरों को साथ लेकर चलना होगा। क्योंकि, अगर इन दलों में वोट कटवा का रोल निभाया तो इंडिया ब्लॉक की दूसरी पार्टियों के नेताओं को गठबंधन की लीडरशिप के रोल में अपना दावा मजूबत करने का मौका मिल जाएगा।
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