• search
क्विक अलर्ट के लिए
अभी सब्सक्राइव करें  
क्विक अलर्ट के लिए
नोटिफिकेशन ऑन करें  
For Daily Alerts

बस्तरः जहां विकास शब्द विस्थापन का पैग़ाम लेकर आता है

By सलमान रावी, बस्तर से
बस्तरः जहां विकास शब्द विस्थापना का पैग़ाम लेकर आता है
BBC
बस्तरः जहां विकास शब्द विस्थापना का पैग़ाम लेकर आता है

छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग को कभी भारत का सबसे बड़ा ज़िला होने का गौरव हासिल था. मगर इसमें से सात अलग-अलग जिलों को बनाया गया ताकि सरकारी योजनाएं सुदूर इलाक़ों तक पहुंच सके.

समय के साथ साथ, जंगलों और खनिज संपदा की इस धरती पर बड़ी कंपनियों की रूचि बढ़ने लगी और इस संभाग के दक्षिणी और उत्तरी इलाकों में लौहअयस्क और बॉक्साइट सहित खनिज का खनन शुरू हो गया.

कई कंपनियों ने अपने उद्योग चलाने के लिए सरकार की मदद से ज़मीन का अधिग्रहण शुरू किया तो यहाँ के आदिवासियों और प्रशासन के बीच संघर्ष की बुनियाद पड़ने लगी.

इस संघर्ष में लोगों के साथ खड़े होने के नाम पर माओवादी भी आदिवासी बहुल इस इलाके में अपनी पैठ जमाते चले गए. माओवादियों और सुरक्षा बलों के संघर्ष के बीच पिसना भी बस्तर के लोगों के नियति बन गयी. फिर दौर आया विस्थापन और पलायन का.

जगदलपुर ज़िले के लोहांडीगुड़ा के लोगों को भी अपनी ज़मीन के लिए 12 सालों तक संघर्ष करना पड़ा. हिंसक झड़पों और आन्दोलन के बाद आख़िरकार उन्हें जीत मिली और अधिग्रहित की गयी उनकी ज़मीन उन्हें वापस दे दी गयी.

इस फ़ैसले को मौजूदा राज्य सरकार ऐतिहासिक मानती है.

बस्तरः जहां विकास शब्द विस्थापना का पैग़ाम लेकर आता है
BBC
बस्तरः जहां विकास शब्द विस्थापना का पैग़ाम लेकर आता है

शोषण और दोहन का दौर

खनिज के दोहन से पहले बस्तर में व्यापारी यहाँ के वनों से होनेवाली उपज के लिए आने शुरू हुए. जंगलों में तेंदू पत्ते की नीलामी से लेकर, चिरोंजी, काजू, महुआ और इमली के लिए व्यापारी यहाँ आने लगे.

यहाँ पैदा होने वाली इमली पूरे भारत में सबसे खट्टी मानी जाती है.

बस्तर को दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी इमली की मंडी के रूप में पहचान भी मिली. कारण, यहाँ पैदा होने वाली इमली की गुणवत्ता.

जल्द ही वनों से होनेवाली उपज और खनिज संपदा धीरे धीरे यहाँ के आदिवासियों के लिए समस्या बनने लगे क्योंकि इनकी वजह से शुरू हुआ बस्तर में आदिवासियों के शोषण का दौर.

प्रचुर मात्रा में पाए जाने वाले लोह अयस्क, बॉक्साइट और खनिज संपदा के कारण बड़े निजी और सरकारी उद्योगों की नज़र बस्तर पर पड़ी.

जानकारों का कहना है कि प्राकृतिक संपदा और वनोपज के बाद खनिज सम्पदा के दोहन का दौर शुरू हुआ.

बस्तरः जहां विकास शब्द विस्थापना का पैग़ाम लेकर आता है
BBC
बस्तरः जहां विकास शब्द विस्थापना का पैग़ाम लेकर आता है

ज़मीन का अधिग्रहण और विरोध

लेकिन यहाँ के आदिवासियों का मानना है कि जंगलों पर उनका स्वाभाविक अधिकार है क्योंकि वो पूरी तरह से जंगल पर ही निर्भर हैं. उनका तर्क है कि अगर बड़ी कम्पनियां यहाँ आएँगी तो उससे उनका अस्तित्व संकट में पड़ सकता है.

बस्तर के आदिवासियों के लिए ये जल, जंगल और ज़मीन की लड़ाई बनती चली गयी. कई सालों तक लोगों ने अपनी ज़मीन को बचाने के लिए जमकर संघर्ष किया. कई बार संघर्ष हिंसक बन गए जिसमें कई लोग मारे भी गए.

बस्तरः जहां विकास शब्द विस्थापना का पैग़ाम लेकर आता है
BBC
बस्तरः जहां विकास शब्द विस्थापना का पैग़ाम लेकर आता है

वर्ष 2005 में छत्तीसगढ़ की सरकार ने टाटा कंपनी के साथ जगदलपुर जिले के लोहांडीगुड़ा में नए स्टील प्लांट लगाने के लिए एमओयू पर हस्ताक्षर किये.

राज्य सरकार और टाटा के समझौते के बाद लोहांडीगुड़ा में स्टील प्लांट के लिए ज़मीन के अधिग्रहण का नोटिस जारी किया गया.

कुल दस गाँव इससे प्रभावित हुए. 19 हज़ार 500 करोड़ रुपए की लागत वाले प्रस्तावित स्टील प्लांट के लिए 1765 हेक्टेयर ज़मीन का अधिग्रहण राज्य सरकार ने करना शुरू कर दिया.

मगर इलाके के लोगों ने ज़मीन अधिग्रहण का विरोध करना शुरू कर दिया. उनका कहना था कि स्टील प्लांट के लिए जो ज़मीन ली जा रही है वो पूरी तरह से उपजाऊ है.

विकास और विस्थापन एक जैसे ही शब्द
BBC
विकास और विस्थापन एक जैसे ही शब्द

सरकार पर आरोप

ठकरागुड़ा पंचायत के सरपंच हिडमा राम मंडावी बताते हैं कि चूँकि ये इलाक़ा संविधान की पांचवीं अनुसूची में आता है इसलिए कोई भी उद्योग बिना ग्राम सभा की सहमति के नहीं लगाया जा सकता.

मगर उन्होंने सरकारी अधिकारियों पर फ़र्ज़ी तरीक़े से काग़ज़ों में ही ग्राम सभाएं आयोजित करने का आरोप लगाया.

वो कहते हैं, "हमलोगों ने निवेदन किया कि टाटा का प्लांट यहां नहीं लगाना है. इसके बाद दूसरे दिन पेपर में आया कि प्लांट लगाया जाएगा, इससे गांव का विकास होगा. दोनों तरफ़ से झगड़ा हुआ तो हमारे लोगों को भी मारा गया. उस समय कई घायल भी हुए, मेरे सिर में चोट लगी थी."

लोहांडीगुड़ा के लोग संघर्ष के दौरान सरकारी महकमे द्वारा की गयी कार्रवाई से आज भी दुखी हैं. लोगों का कहना है कि उन्हें विकास का वो मॉडल बिलकुल नहीं चाहिए जो उन्हें अपनी ज़मीन और संस्कृति से बेदख़ल कर दे.

मासो राम कश्यप के लिए उनका जमीन ही उनके लिए सबकुछ है.
BBC
मासो राम कश्यप के लिए उनका जमीन ही उनके लिए सबकुछ है.

इन्ही में से एक हैं धुरागांव के मासो राम कश्यप. वो कहते हैं, "खून दूंगा, जान दूंगा. ज़मीन नहीं दूंगा. जनता बोला. सरकार तो हमारा बाप है, ज़मीं हमारा माँ है बोल के जनता बोला. ज़मीन में मारूंगा, ज़मीन में जियूँगा. ज़मीन को नहीं छोडूंगा."

सिर्फ लोहांडीगुड़ा ही नहीं, बस्तर में रहने वाले ज़्यादातर आदिवासियों को लगने लगा है कि विकास और विस्थापन एक जैसे ही शब्द हैं.

बढ़ रहे विरोध की वजह से राज्य सरकार लोहांडीगुड़ा में ज़मीन का अधिग्रहण तो कर पायी लेकिन, हालात को देखते हुए टाटा को लगा कि इस जगह पर उनकी परियोजना शुरू नहीं की जा सकती.

इसलिए साल 2016 में राज्य सरकार और टाटा के बीच किया गया समझौता खत्म हो गया. हालांकि टाटा ने ज़मीन के एवज़ में सरकार को अच्छी ख़ासी रक़म दी थी.

बस्तर
BBC
बस्तर

विरोध का नतीजा

मगर लोहांडीगुड़ा के लोगों के घाव अब भी हरे हैं. धुरागांव के रहने वाले मन्न कश्यप को ज़मीन अधिग्रहण का विरोध करना महंगा पड़ा और उन्हें दो साल जेल में बिताने पड़े.

वो बताते हैं, "हमलोग पुलिस के साथ बात कर रहे थे तो वो बोले तुम कौन हो? हमलोग कुछ नहीं हैं. ज़मीन के हक के लिए लड़ रहे हैं. डरा रहे थे तो मैं बोला, साहब आप भी नौकरी के लिए पीछे पड़े हो, पैसे के लिए भी पीछे पड़े हो. हम भी धरती के लिए पीछे पड़े हैं. ये हमारी माँ है. हम इसी में जन्मे हैं और इसी में मरते हैं. फिर भी वो नहीं माने. जहाँ भी हम धरने पर बैठते थे वो डंडा लेकर भगा देते थे."

कांग्रेस ने पिछले विधानसभा के चुनावों में किसानों की ज़मीन वापस देने का वादा किया था और इसे चुनावी मुद्दा भी बनाया था.

पार्टी को इसका चुनावी लाभ मिला और राज्य में कांग्रेस ने सरकार बना ली.

बस्तरः जहां विकास शब्द विस्थापना का पैग़ाम लेकर आता है
BBC
बस्तरः जहां विकास शब्द विस्थापना का पैग़ाम लेकर आता है

सरकार बनते ही कांग्रेस ने किसानों से ली गयी ज़मीन के पट्टे वापस लौटा दिए. कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने लोहांडीगुड़ा के धुरागांव में आयोजित एक सभा में ग्रामीणों को उनकी ज़मीन के काग़ज़ वापस लौटाए.

कांग्रेस के स्थानीय विधायक दीपक बैज कहते हैं कि बस्तर मे मौजूद खनिज सम्पदा का फ़ायदा स्थानीय लोगों को नहीं मिल रहा है और औद्योगिकीकरण में लोगों की भागेदारी भी नहीं है. इसलिए लोगों का इतना विरोध देखने को मिला है.

बीबीसी से बात करते हुए दीपक बैज कहते हैं, "हमारे बस्तर में खनिज संपदा की कोई कमी नहीं है और बड़े उद्योग घराने हमारे खनिज संपदा को लूटना चाहते हैं. हमको बस वहाँ पे चपरासी बना देंगे, और खनिज संपदा का फायदा वो उठाएंगे."

बस्तरः जहां विकास शब्द विस्थापना का पैग़ाम लेकर आता है
BBC
बस्तरः जहां विकास शब्द विस्थापना का पैग़ाम लेकर आता है

रोजगार

बस्तर संभाग में ही दो प्रस्तावित लौह अयस्क के खदानों से जुड़ी परियोजनाएं भी ठंडे बस्ते में है. ये परियोजनाएं दंतेवाडा जिले के लिए प्रस्तावित थीं, जहाँ लौह अयस्क की खदानों का आवंटन दो बड़े औद्योगिक घरानों को किया जाना था.

हालांकि जानकार कहते हैं कि टाटा के स्टील प्लांट के नहीं लगने से एक ग़लत संदेश गया है क्योंकि बस्तर में रोज़गार का बड़ा अभाव है. वर्ल्ड बैंक के आंकड़ों के हिसाब से बस्तर संभाग की 60 प्रतिशत आबादी ग़रीबी रेखा के नीचे है और इस इलाके में रोज़गार के संसाधन भी नहीं हैं.

वरिष्ठ पत्रकार मनीष गुप्ता कहते हैं कि टाटा के जाने से बस्तर में जो 'इंडस्ट्रियलाइज़ैशन' की संभावनाएं थीं वो अब ख़त्म हो गयी हैं.

गुप्ता ने कहा, "इस क्षेत्र के लोगों को रोज़गार के लिए जो एक अवसर उत्पन्न होता, उससे भी क्षेत्र को वंचित कर दिया गया. ये बहुत बड़ा नुकसान है, छत्तीसगढ़ के साथ साथ बस्तर का भी बहुत बड़ा नुक़सान है."

आदिवासी बहुल बस्तर के इलाके में रहने वाले लोग अपनी ज़मीन और संस्कृति को बचाने के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं. उनका मानना है कि विकास शब्द ही उनके लिए विस्थापन का पैग़ाम लेकर आता है.

BBC Hindi
देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
English summary
Bastar where the word development takes place with displacement
तुरंत पाएं न्यूज अपडेट
Enable
x
Notification Settings X
Time Settings
Done
Clear Notification X
Do you want to clear all the notifications from your inbox?
Settings X
X