बाबा बागेश्वर के कुर्बानी वाले बयान पर मचा घमासान, AMU प्रोफेसर बोले, 'आज बकरीद कल नमाज को बताएंगे गलत'
Bakrid 2025 Controversy Qurbani Ban: बकरीद 2025 को लेकर धार्मिक और सामाजिक बहसें तेज हो गई हैं। इस बार विवाद की वजह बनी है बकरीद की कुर्बानी जिस पर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। दरअसल बाबा बागेश्वर धाम धीरेंद्र शास्त्री की ओर से कुर्बानी पर दिए एक बयान से इस बहस की शरूआत हुई।
धीरेंद्र शास्त्री ने बकरीद पर जानवरों की कुर्बानी को 'जीव हिंसा' करार दिया। धीरेंद्र शास्त्री के इस बयान पर अब अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) के थियोलॉजी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रिहान अख्तर ने कड़ा जवाब दिया है।

बाबा बागेश्वर के बयान पर प्रोफेसर अख्तर का पलटवार
धीरेंद्र शास्त्री ने हाल ही में कहा, "जीव हिंसा किसी भी धर्म में उचित नहीं मानी जा सकती। हम बलि प्रथा के पक्ष में नहीं हैं और बकरीद पर दी जाने वाली कुर्बानी के भी समर्थन में नहीं हैं। जब हम किसी को जीवन नहीं दे सकते, तो हमें उसे मारने का अधिकार भी नहीं है। यह प्रथा प्राचीन परिस्थितियों की देन रही होगी, लेकिन आज इसके और भी विकल्प मौजूद हैं।"
उनका यह बयान सोशल मीडिया और धार्मिक मंचों पर तेजी से वायरल हुआ, जिसे लेकर मुस्लिम समुदाय के कई लोगों ने नाराजगी जताई है। इस पर एएमयू प्रोफेसर रिहान अख्तर ने पलटवार किया है जिसमें कहा है कल को नमाज और रोजे पर भी सवाल उठाएंगे? तो क्या हम उसे भी छोड़ देंगे।
डॉ. रिहान अख्तर एएमयू के इस्लामिक स्टडीज विभाग के प्रोफेसर हैं। उन्होंने बाबा बागेश्वर के बयान को धार्मिक हस्तक्षेप और सांप्रदायिकता फैलाने वाला करार दिया। उन्होंने कहा, "आज बकरीद की कुर्बानी को लेकर बयान दे रहे हैं, कल को नमाज, रोजा और जकात पर भी सवाल उठाएंगे? क्या अब देश की धार्मिक परंपराएं सिर्फ एक मत से तय होंगी?"
प्रोफेसर अख्तर ने कहा कि हज के मौके पर लाखों बकरों की कुर्बानी दी जाती है। यह इस्लामी परंपरा और आस्था का अभिन्न हिस्सा है। कुर्बानी न करने से हज अधूरा माना जाता है। कोई भी व्यक्ति इस धार्मिक कर्तव्य को हल्के में नहीं ले सकता।
प्रशासनिक नियमों का पालन अनिवार्य: प्रोफेसर अख्तर
रिहान अख्तर ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार द्वारा जो दिशा-निर्देश दिए जाते हैं, जैसे प्रतिबंधित पशुओं की कुर्बानी पर रोक, उनका पालन करना हर नागरिक का दायित्व है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी धर्म की मूल परंपरा पर ही सवाल उठाया जाए। उन्होंने कहा कि समाज में सह-अस्तित्व तभी संभव है जब हम एक-दूसरे की मान्यताओं का सम्मान करें, न कि उन्हें विवाद का विषय बनाएं।
धर्म, परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन की जरूरत
बकरीद को इस्लाम धर्म में त्याग और समर्पण का प्रतीक माना जाता है, जिसमें जानवर की कुर्बानी एक धार्मिक परंपरा के तौर पर दिया जाता है। वहीं आधुनिक समाज में पशु अधिकार और पर्यावरण को लेकर बढ़ती चिंताएं भी एक अहम मुद्दा बन चुकी हैं। इस बहस ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या धार्मिक स्वतंत्रता और आधुनिक सामाजिक चेतना के बीच कोई संतुलन संभव है? और क्या इस संतुलन की आड़ में किसी विशेष धर्म को निशाना बनाना न्यायसंगत है?












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