पूर्वांचल के इस बाहुबली की पत्‍नी ने थामा BJP का दामन, यूपी की राजनीति में खलबली

नोएडा। पूर्वांचल के बाहुबली और बहुजन समाज पार्टी से 2009 में जौनपुर से सांसद रहे धनंजय सिंह एक फिर चर्चा में आ गए हैं। उनकी पत्‍नी श्रीकला रेड्डी रविवार को हैदराबाद में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गईं। श्रीकला के बीजेपी में शामिल होने के बाद से जौनपुर में अब सियासत गरमा गई है। श्रीकला रेड्डी तेलंगाना की राजनीति में पहले से सक्रिय हैं। श्रीकला रेड्डी रविवार को हैदराबाद में भाजपा में शामिल हुईं। पार्टी के कार्यवाहक अध्यक्ष जेपी नड्डा के समक्ष समर्थकों सहित समारोह पूर्वक भगवा दामन थामे जाने के सियासी मायने भी तलाशे जाने लगे हैं। उनके साथ टीडीपी तथा अन्य पार्टी के करीब पांच दर्जन नेता भाजपा में शामिल हुए।

निप्पो समूह घराने की बेटी है श्रीकला रेड्डी

निप्पो समूह घराने की बेटी है श्रीकला रेड्डी

श्रीकला रेड्डी निप्पो समूह (निप्‍पो बैटरी) घराने की बेटी हैं। श्रीकला रेड्डी के पिता तेलंगाना के हूजूरनगर से निर्दलीय विधायक रहे हैं। हूजूरनगर तेलंगाना के सुर्यापेट जिले का तीसरा सबसे बड़ा कस्बा है। धनंजय सिंह ने 2017 में श्रीकला से तीसरी शादी रचाई थी। शाही अंदाज में हुई यह शादी सुर्खियों में रही थी। 2009 में बसपा के टिकट पर जौनपुर से सांसद रहे धनंजय सिंह बाद में मायावती से रिश्ते खराब होने पर बसपा से निष्कासित कर दिए गए थे।

श्रीकला धनंजय की तीसरी पत्नी

श्रीकला धनंजय की तीसरी पत्नी

श्रीकला रेड्डी धनंजय की तीसरी पत्नी हैं। इनकी शादी करीब दो साल पहले हुई थी। इससे पहले धनंजय की शादी डॉ जागृति सिंह से करीब आठ साल पहले हुई थी, किंतु आपसी सहमति न बन पाने के कारण दोनो एक दूसरे से दूर हो गए। विधायक बनने के बाद इनकी पहली शादी डोभी के चांदेपुर की मूल निवासी मीनाक्षी के साथ हुई थी। उनका डेढ़ साल बाद ही निधन हो गया था।

धनंजय सिंह का सियासी सफर

धनंजय सिंह का सियासी सफर

बहरहाल, इतिहास पलट कर देखें तो धनंजय सिंह 27 साल की उम्र में 2002 में रारी (अब मल्हनी) विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव जीतकर सबको चौंका चुके हैं। वह दोबारा इसी सीट पर जदयू के टिकट से जीते। फिर धनंजय सिंह बसपा में शामिल हुए। 2009 में वह बसपा के टिकट पर जीत दर्ज कर जौनपुर से सांसद हुए। इससे पहले, तीन दशक तक जौनपुर की लोकसभा सीट से बसपा नहीं जीत पाई थी। बसपा में रहते हुए धनंजय सिंह मायावती को सीधे चुनौती दे बैठे थे। तब पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र को लेकर उन्होंने आवाज बुलंद की। इसके बाद मायावती ने उन्हें 2011 में पार्टी से निकाल दिया था। बसपा से अलग होने के बाद भी धनंजय सिंह अपने समर्थकों के दम पर राजनीति में खुद को असरदार बनाए रहे। जौनपुर से 2014 का निर्दलीय लोकसभा चुनाव लड़े मगर हार गए। 2017 में धनंजय सिंह मल्हनी सीट से निषाद पार्टी के बैनर से विधानसभा चुनाव लड़े थे। तब दूसरे स्थान पर रहे थे। हालांकि 2019 का लोकसभा चुनाव वह नहीं लड़े।

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