Explainer: कब तक आधे स्टाफ के भरोसे चलेंगे AYUSH? 45% वैकेंसी खाली, रिसर्च पर ताला, स्किल्ड युवा बेरोजगार
Ayush Institutions: भारत सरकार एक तरफ दुनिया भर में 'आयुष' (आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी) का डंका बजा रही है, वहीं दूसरी तरफ इस क्षेत्र की बैकबोन (ढांचे) माने जाने वाले राष्ट्रीय संस्थान खुद 'बीमार' चल रहे हैं। संसद में पेश किए गए सरकारी आंकड़े एक ऐसी भयावह तस्वीर पेश करते हैं, जो हमारी स्वास्थ्य प्रणाली (Health System) और रोजगार (Job) के अवसरों, दोनों के लिए एक खतरे की घंटी है।
मंत्रालय द्वारा संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, देश के 19 स्वायत्त निकायों (Autonomous Bodies) में स्वीकृत कुल 5,553 पदों में से लगभग 2,512 पद खाली पड़े हैं। इसका सीधा मतलब है कि देश का आयुष क्षेत्र लगभग 45% रिक्तियों के साथ यानी अपनी आधी क्षमता पर काम कर रहा है।

- CCRAS (दिल्ली): आयुर्वेद अनुसंधान की इस सबसे बड़ी संस्था में 1,708 पदों में से 903 खाली हैं
- ITRA (जामनगर): यहां हालात और भी बदतर हैं। कुल 60% पद खाली पड़े हैं।
- पूर्वोत्तर भारत: पासीघाट (NEIAFMR) में 90 में से 76 पद रिक्त हैं, जो इस क्षेत्र की उपेक्षा को दर्शाता है।
क्यों यह एक 'हेल्थ इमरजेंसी' है?
जब किसी रिसर्च या शैक्षणिक संस्थान (Educational institutions) में आधे एक्सपर्ट गायब हों, तो उसका सीधा असर आम जनता की सेहत पर पड़ता है:
- अनुसंधान में गिरावट: CCRAS जैसे निकायों में वैज्ञानिकों की कमी का मतलब है कि नई दवाओं और उपचार पद्धतियों पर रिसर्च ठप पड़ जाना।
- सुविधाओं का अभाव: पैरामेडिकल और टेक्निकल स्टाफ की कमी के कारण अस्पतालों में मरीजों को वह गुणवत्तापूर्ण इलाज नहीं मिल पा रहा, जिसका दावा सरकार करती है।
- फैसले कुछ और, जमीनी हकीकत कुछ और: केंद्र में नीतियां तो बन रही हैं, लेकिन जमीनी स्तर (संस्थानों) पर उन्हें लागू करने के लिए हाथ ही मौजूद नहीं हैं।
कुशल युवाओं के साथ हो रहा धोखा
यह संकट केवल प्रशासनिक नहीं है, बल्कि यह उन हजारों डॉक्टर, रिसर्च करने वाले और पैरामेडिक्स के सपनों पर प्रहार है जो वर्षों तक कठिन पढ़ाई करते हैं:
रोजगार के अवसरों का गला घोंटना: 2,500 से अधिक पद खाली होने का मतलब है कि हजारों योग्य युवाओं को एक सम्मानजनक करियर और सरकारी नौकरी से वंचित रखा गया है।
संविदावाद (Contractualism) का जहर: मंत्रालय ने स्वीकार किया है कि वे खाली पदों को भरने के बजाय 'कॉन्ट्रैक्ट' पर काम चला रहे हैं। यह न तो नौकरी की सुरक्षा देता है और ना ही संस्थानों में लंबे समय के लिए विशेषज्ञता (Expertise) विकसित होने देता है।
जवाबदेही का अभाव: कब तक 'अस्थायी' समाधान?
संसदीय समितियों ने बार-बार इन खाली पदों की ओर ध्यान दिलाया है, लेकिन अभी तक नियमित भर्ती के लिए कोई केंद्रीय समयबद्ध योजना (Time-bound plan) सामने नहीं आई है। स्वायत्त निकायों को उनके हाल पर छोड़ देना और संविदा कर्मियों के भरोसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन चलाना एक नुकसानदेह कदम साबित हो सकता है।
यदि भारत को वास्तव में विश्व का 'वेलनेस हब' बनना है, तो केवल विज्ञापनों से काम नहीं चलेगा। आयुष संस्थानों को एक्सपर्ट और युवाओं की एनर्जी से भरना होगा। खाली पड़े ये 45% पद केवल आंकड़े नहीं हैं, ये हमारी चिकित्सा प्रणाली की विफलता और एक पूरी पीढ़ी के कौशल की बर्बादी का प्रमाण हैं।
आयुष मंत्रालय का मुख्य काम क्या है?
आयुष (AYUSH) भारत सरकार का एक विशेष मंत्रालय है, जो देश की प्राचीन और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के संरक्षण और विकास के लिए समर्पित है। इस मंत्रालय का प्राथमिक उद्देश्य पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ना और उन्हें जनता के लिए सुलभ बनाना है।
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